विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० विनय-पत्रिका वह मर भी गये। (वन देनेवाली) ऐसी बुरी माता (कैकयी) का मन भी आप इस प्रकार रखते आये (यानी कैकयीकी रुचिके अनुकूल काम करते आये) जैसे कोई अपने शरीरके मर्मस्थानके बुरे घावकी रक्षा करे ॥६॥ बन्दर (हनुमान्जी) की सेवापर मुग्ध होकर आप उपकृत हुए और बोले, 'हे पवन- कुमार ! यहाँ आ, मेरे पास तुझे देने योग्य कुछ भी नहीं है; हाँ, इस बातका तू मुझसे सनद लिखा ले कि मैं तेरा ऋणी हूँ और तू मेरा धनी (महाजन) है' ॥७॥ सुग्रीव और विभीषणको अपना लेनेपर भी उन लोगोंने छलकी छाया नहीं छोड़ी। (फिर भी आप उन्हें अपनाये ही रह गये) और भरतजीकी सभामें उन दोनोंकी ससम्मान सराहना करते हुए आपका हृदय तृप्त ही नहीं होता था ॥८॥ भक्तोंपर आपने जो-जो कृपा और उपकार किये हैं, उनकी तो चर्चा चलते ही आप संकुचित या लज्जित हो जाते हैं, पर जो एक बार भी आपको प्रणाम करता है और शरणमें आ जाता है, उसका आप यश बखानते हैं और (दूसरोंसे उसका यश) सुनकर भी कहते हैं कि 'फिर कहो' ॥९॥ ऐसे श्रीरामजीकी गुणा- वली समझ-समझकर (प्रत्येक मनुष्यको) अपने हृदयमें प्रेम बढ़ाना चाहिये। तुलसीदास कहते हैं कि इससे तू अनायास ही श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमानन्द पा जायगा ॥१०॥ विशेष १—'खेलत संग······दोउ'—भरतजीने भी यही कहा है— 'हारेउ खेल जितावहु मोहीं।' २—'अपन। ये······छल छा'—टीकाकारोंने इसका अर्थ इस प्रकार किया है:—'सुग्रीवने अपने सहोदर बालिकी स्त्री ताराको और विभीषणने अपने भाई रावणकी स्त्री मन्दोदरीको रख लिया था। यही छलकी छाया है।' किन्तु विचार- णीय बात तो यह है कि यदि उन दोनोंने अपने-अपने भाईकी स्त्रीको रख लिया था तो इसमें उन्होंने रामजीके साथ कौनसा छल किया ? क्योंकि यह तो उनका चारित्रिक दोष कहा जा सकता है, छल नहीं। वास्तवमें इसका अर्थ यह है कि जिस समय रामजी अवधपुरीमें आकर भरतसे मिले हैं, उस समय अपूर्व भ्रातृमिलन देखकर थोड़ी देरके लिए सुग्रीव और विभीषणके हृदयमें