विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १९१ यह भाव पैदा हुआ कि हाय ! रामजी स्वयं तो इस प्रकार अपने भाईसे मिल रहे हैं और उधर इन्होंने हम लोगोंको फुसलाकर हमारे भाईका वध किया। हम लोग भी कैसे अभागे हैं कि अपनेसे ही अपने लायक (!) भाईका वध शत्रुके हाथसे करा डाला। तात्पर्य कि यह बात असह्य है और रामजीसे बदला लेने योग्य है। बस यही सुग्रीव और विभीषणका छल है। यह कथा वाल्मीकीय रामायणमें लिखी है। अथवा 'छल छाउ' का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि रामजीने तो सुग्रीव और विभीषणको अपना लिया, पर उन लोगोंने कपट-भाव नहीं छोड़ा। अर्थात् उनके भीतर तो भाईकी स्त्रीके साथ अगम्यागमनरूप महापाप करने एवं ऐश्वर्यभोग करनेकी प्रबल वासना थी और ऊपरसे उन दोनोंने कुछ और ही बात कही। उदाहरणार्थ सुग्रीवने रामजीसे कहा था कि— सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहौं सेवकाई ॥ इसी प्रकार विभीषणने भी कहा था कि— 'उर कछु प्रथम वासना रही। प्रभु-पद-प्रीति-सरित सो बही ॥' किन्तु पीछे दोनोंने ही अपनी बातोंपर ध्यान नहीं दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि सुग्रीव और विभीषणके मनमें तो सुखोपभोगकी लालसा थी, पर उन दोनोंने रामजीसे बनावटी बात कही थी। भला यह अन्तर्यामी भगवान्के साथ छल नहीं तो और क्या है ! श्रीरामजीने उनका यह कपटभाव जानते रहनेपर भी शरणमें आनेके कारण उन दोनोंको अपना लिया और फिर कभी नहीं छोड़ा। ३—'अपनाये······हृदय अघाउ'—इसका अर्थ वियोगी हरिजीने इस प्रकार किया है—'यद्यपि सुग्रीव और विभीषणने अपना कपटभाव नहीं छोड़ा, पर आपने उन्हें अपने शरणमें ले ही लिया। और भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं, प्रशंसा करते-करते तृप्ति ही नहीं होती।' इस अर्थसे एक तो यह भाव प्रकट होता है कि सुग्रीव और विभीषणका कपटभाव प्रकट होनेके बाद रामजीने उन्हें अपनाया था और दूसरा भाव यह प्रकट होता है कि भरतकी प्रशंसा करनेमें रामजी सन्तुष्ट नहीं होते। किन्तु यथार्थतः ऐसा नहीं है। उन दोनोंने भगवान्के अपनानेके बाद अपने कपटभावका परिचय दिया