विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ विनय-पत्रिका था; किन्तु उनका कपटभाव होनेपर भी रामजी उन्हें अपनाये ही रह गये— छोड़ा नहीं। दूसरी बात यह कि यदि श्रीरामजी 'भरतजीकी प्रशंसा करते रहते हैं', तो इसमें रामजीकी कौन-सी विशेषता है ? क्योंकि भरतजी तो प्रशंसा योग्य थे ही। अतः वियोगी हरिजीका अर्थ गोस्वामीजीके भावके सर्वथा विरुद्ध और असंगत है। रामजी अपने प्रिय भाई भरतकी प्रशंसा नहीं करते बल्कि भरत-सभामें भरतजीसे सुग्रीव और विभीषणकी प्रशंसा करते हैं। यहाँ ग्रन्थ- कारका यही भाव है। देखिये न, गोस्वामीजीने रामायणमें लिखा भी है:— जेहि अव बधेउ व्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली ॥ सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहु सो न राम हिय हेरी ॥ ते भरतहिं भेंटत सनमाने। राजसभा रघुवीर बखाने ॥ ( १०१ ) जाउँ कहाँ तजि चरन तिहारे । काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे ॥१॥ कौने देव बराइ बिरद-हित, हठि हठि अधम उधारे । खग, मृग, व्याध, पषान, विटप जड़, जवन कवन सुर तारे ॥२॥ देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब, माया विबस बिचारे । तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे ॥३॥ शब्दार्थ—कौने = किस । बराइ = चुनकर । कवन = किस । भावार्थ—हे नाथ ! मैं आपके चरणोंको छोड़कर कहा जाऊँ ? संसारमें ‘पतित-पावन' नाम किसका है ? दीनजन किसे बहुत प्यारे हैं ? ॥१॥ किस देवताने अपने ब्रानेकी लाज रखनेके लिए जबर्दस्ती कर करके अधमोंको चुनकर उनका उद्धार किया है ? पक्षी (जटायु), मृग (मारीच), व्याध (वाल्मीकि), पाषाण (अहल्या), जड़वृक्ष (यमलार्जुन) और यवनको किस देवताने तारा ? ॥२॥ देवता, दैत्य, मुनि, नाग और मनुष्य ये सब बेचारे मायाके अधीन हैं। अब हे प्रभो ! यह तुलसीदास अपनेको उन लोगोंके हाथोंमें क्यों सौंपे, अपना स्वाभिमान क्यों खो दे ॥३॥