विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १९३ विशेष १—'मृग'—रावणका मामा मारीच कपटी मृग बनकर भगवान्के सामने आया था। भगवान्ने उसे मारकर मुक्त कर दिया था। गोस्वामीजीने राम- चरितमानसमें लिखा है— अन्तर प्रेम तासु पहिचानी। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि भवानी ॥ ( १०२ ) हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों। साधन-धाम बिबुध-दुरलभ तनु, मोहिं कृपा करि दीन्हों ॥१॥ कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके, एक एक उपकार । तदपि नाथ कछु और माँगिहौं, दीजै परम उदार ॥२॥ बिषय-वारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कवहूँ पल एक । ताते सहौं विपति अति दारुन, जनमत जोनि अनेक ॥३॥ कृपा-डोरि बंसी पद-अंकुस, परम प्रेम मृदु चारो। येहि विधि वेधि हरहु दुख मेरो, कौतुक राम तिहारो ॥४॥ हैं श्रुति-विदित उपाय सकल सुर, केहि केहि दीन निहोरै । तुलसिदास येहि जीव मोह-रजु, जोइ बाँध्यो सोइ छोरै ॥५॥ शब्दार्थ—मीन = मछली। बंसी = मछली फँसानेकी काँटिया। भावार्थ—हे हरे ! आपने बड़ा अनुग्रह किया। आपने कृपा करके मुझे साधनोंका स्थान, देवताओंके लिए दुर्लभ (मनुष्य) शरीर दे दिया ॥१॥ आपका एक एक उपकार करोड़ों मुखसे नहीं कहा जा सकता; फिर भी हे नाथ ! मैं कुछ और माँगूँगा। आप परम उदार हैं, वह मुझे दीजिये ॥२॥ मेरा मनरूपी मीन विषयरूपी जलसे कभी एक पलके लिए भी अलग नहीं होता। इससे मैं अनेक योनियोंमें जन्म लेकर अत्यन्त दारुण कष्ट सहन करता हूँ ॥३॥ (इस मनमच्छको पकड़नेके लिए) हे रामजी ! अपनी कृपाकी डोरी और अपने चरण- चिह्न अंकुशको कँटिया बनाइये। उस बंसीमें परम प्रेम रूपी कोमल चारा लगा दीजिये। इस प्रकार (मनरूपी मछलीको) बेधकर मेरा दुःख दूर कीजिये। इसमें आपका कौतुक भी होगा ॥४॥ यों तो वेदोंमें बहुत-से उपाय (संयम, जप, तप १३