भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 205

१९४ विनय-पत्रिका आदि) विदित हैं और सब देवता भी प्रसिद्ध हैं, किन्तु यह दीन किस-किसका निहोरा करे ? तुलसीदास कहते हैं कि जिसने इस जीवको मोह-रूपी रस्सीमें बाँध रखा है, वही इसे छोड़ सकता है ॥५॥ विशेष १—गोस्वामीजीने इस पदमें बड़ा ही अपूर्व और अलौकिक रूपक बाँधकर सरकारकी सेवामें अपनी माँग पेश की है। इसमें विरक्ति और अनुरक्तिका सजीव सिद्धान्त है। मनको मीन बनाया है और विषयोंको जल; जिस प्रकार मछलियोंमें चंचलता होती है, उसी प्रकार मन भी अत्यन्त चंचल है। जिस प्रकार जलका बहाव स्वाभाविक ही अधोगामी होता है, उसी प्रकार विषय- वासनाका परिणाम भी अधोगामी है। जिस प्रकार मछली एक क्षणके लिए भी जलसे पृथक् नहीं होना चाहती, उसी प्रकार मन भी विषयोंको नहीं छोड़ना चाहता। [ १०३ ] यह विनती रघुबीर गुसाईं । और आस-विश्वास-भरोसो, हरौ जीव-जड़ताई ॥१॥ चहौं न सुगति, सुमति, सम्पति, कछु, रिधि-सिधि, बिपुल बड़ाई । हेतु-रहित अनुराग राम-पद बढ़ै अनुदिन अधिकाई ॥२॥ कुटिल करम लै जाइ मोहिं जहँ जहँ अपनी बरिआई । तहँ तहँ जनि छिन छोह छाँड़ियो, कमठ-अण्ड की नाई ॥३॥ या जग में जहँ लगि या तनु की प्रीति प्रतीति सगाई । ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों होहिं सिमिट इक ठाई ॥४॥ शब्दार्थ—हेतु-रहित = कारणरहित, निष्काम । बरिआई = जबर्दस्ती । कमठ = कछुआ सगाई = नाता, सम्बन्ध । भावार्थ—हे रघुबीर स्वामी ! मेरी यही विनती है कि आप इस जीवकी जड़ता और दूसरोंका आशा-भरोसा तथा विश्वास दूर कर दीजिये ॥१॥ मैं मुक्ति, सुबुद्धि, सम्पत्ति, ऋद्धि-सिद्धि तथा बहुत बड़ाई आदि कुछ भी नहीं चाहता । हे रामजी ! (सिर्फ इतनी ही कामना है कि) आपके चरणोंमें मेरा