विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १८९ कांपे-सेवा-वस भये कनौड़े, कह्यौ पवनसुत आउ । देवें को न कछू रिनियाँ हौँ धनिक तू पत्र लिखाउ ॥७॥ अपनाये सुग्रीव बिभीषन, तिन न तज्यो छल-छाउ ! भरत-सभा सनमानि सराहत, होत न हृदय अघाउ ॥८॥ निज करुना करतूति भगत पर, चपत चलत चरचाउ । सकृत प्रनाम प्रनत जस वरनत, सुनत कहत फिरि गाउ ॥९॥ समुझि समुझि गुनग्राम राम के, उर अनुराग बढ़ाउ । तुलसिदास अनयास रामपद पइहै प्रेम-पसाउ ॥१०॥ शब्दार्थ—खेहर = धूल, राख । रिसौहैं = क्रोधित । काउ = किसीने । अनट = अनीति । अपाउ = अपाय, हानि । भव = शिवजी । ताउ = ताव, क्रोध । समाउ = शक्ति, सहिष्णुता । कनौड़े = उपकृत । छाउ = छाया । चपत = संकुचित । सकृत = एक बार । पसाउ = प्रसन्नता । भावार्थ—सीतापति रामचन्द्रका शील और स्वभाव सुनकर भी जिस आदमीका मन प्रमुदित नहीं होता, जिसका शरीर पुलकायमान नहीं होता, जिसकी आँखोंमें आँसू नहीं आ जाते, वह धूल फाँकता है. (अर्थात् उस मनुष्य- का जीवन निस्तत्त्व है) ॥१॥ बचपनसे ही पिता, माता, भाई, गुरु, सेवक, मन्त्री और सखा (मित्र) कहते हैं कि रामचन्द्रजीका चन्द्रमाके समान मुख स्वप्नमें भी किसीने क्रोधित नहीं देखा ॥२॥ उनके साथ जो उनके तीनों भाई और अन्यान्य बालक प्रतिदिन खेलते थे, उनकी अनीति और हानिको वह बचाते रहते थे और जीतनेपर भी हार मानकर उन्हें पुचकारते-दुलारते तथा स्वयं दाव देते और दूसरोंसे दिलाते थे ॥३॥ उनके पवित्र चरणोंका स्पर्श होते ही पाषाणमूर्त्ति अहल्या शापके दुःखसे मुक्त हो गयी। किन्तु उसे सद्गति देनेका तो उनके मनमें कुछ भी हर्ष न हुआ, हाँ, इस बातका पछतावा अवश्य हुआ कि मैंने ऋषि-पत्नीको पैरसे छू दिया ॥४॥ शिव-धन्वा तोड़कर राजाओंका मान भंग करनेपर परशुरामजी तावमें आ गये; किन्तु श्रीरामजीने उनका अपराध क्षमा करके और स्वयं भी उनके पैरोंपर गिरकर लक्ष्मणजीके कटु वाक्यको क्षमा कराया । भला इतनी सहिष्णुता किसमें है ? ॥५॥ दशरथने कहा राज्य देनेके लिए, और स्त्रीके वशमें होकर दिया वन; इसी बातकी ग्लानिमें