विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१९० विनय-पत्रिका वह मर भी गये। (वन देनेवाली) ऐसी बुरी माता (कैकयी) का मन भी आप इस प्रकार रखते आये (यानी कैकयीकी रुचिके अनुकूल काम करते आये) जैसे कोई अपने शरीरके मर्मस्थानके बुरे घावकी रक्षा करे ॥६॥ बन्दर (हनुमान्जी) की सेवापर मुग्ध होकर आप उपकृत हुए और बोले, 'हे पवन- कुमार ! यहाँ आ, मेरे पास तुझे देने योग्य कुछ भी नहीं है; हाँ, इस बातका तू मुझसे सनद लिखा ले कि मैं तेरा ऋणी हूँ और तू मेरा धनी (महाजन) है' ॥७॥ सुग्रीव और विभीषणको अपना लेनेपर भी उन लोगोंने छलकी छाया नहीं छोड़ी। (फिर भी आप उन्हें अपनाये ही रह गये) और भरतजीकी सभामें उन दोनोंकी ससम्मान सराहना करते हुए आपका हृदय तृप्त ही नहीं होता था ॥८॥ भक्तोंपर आपने जो-जो कृपा और उपकार किये हैं, उनकी तो चर्चा चलते ही आप संकुचित या लज्जित हो जाते हैं, पर जो एक बार भी आपको प्रणाम करता है और शरणमें आ जाता है, उसका आप यश बखानते हैं और (दूसरोंसे उसका यश) सुनकर भी कहते हैं कि 'फिर कहो' ॥९॥ ऐसे श्रीरामजीकी गुणा- वली समझ-समझकर (प्रत्येक मनुष्यको) अपने हृदयमें प्रेम बढ़ाना चाहिये। तुलसीदास कहते हैं कि इससे तू अनायास ही श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमानन्द पा जायगा ॥१०॥ विशेष १—'खेलत संग······दोउ'—भरतजीने भी यही कहा है— 'हारेउ खेल जितावहु मोहीं।' २—'अपन। ये······छल छा'—टीकाकारोंने इसका अर्थ इस प्रकार किया है:—'सुग्रीवने अपने सहोदर बालिकी स्त्री ताराको और विभीषणने अपने भाई रावणकी स्त्री मन्दोदरीको रख लिया था। यही छलकी छाया है।' किन्तु विचार- णीय बात तो यह है कि यदि उन दोनोंने अपने-अपने भाईकी स्त्रीको रख लिया था तो इसमें उन्होंने रामजीके साथ कौनसा छल किया ? क्योंकि यह तो उनका चारित्रिक दोष कहा जा सकता है, छल नहीं। वास्तवमें इसका अर्थ यह है कि जिस समय रामजी अवधपुरीमें आकर भरतसे मिले हैं, उस समय अपूर्व भ्रातृमिलन देखकर थोड़ी देरके लिए सुग्रीव और विभीषणके हृदयमें
विनय-पत्रिका १९१ यह भाव पैदा हुआ कि हाय ! रामजी स्वयं तो इस प्रकार अपने भाईसे मिल रहे हैं और उधर इन्होंने हम लोगोंको फुसलाकर हमारे भाईका वध किया। हम लोग भी कैसे अभागे हैं कि अपनेसे ही अपने लायक (!) भाईका वध शत्रुके हाथसे करा डाला। तात्पर्य कि यह बात असह्य है और रामजीसे बदला लेने योग्य है। बस यही सुग्रीव और विभीषणका छल है। यह कथा वाल्मीकीय रामायणमें लिखी है। अथवा 'छल छाउ' का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि रामजीने तो सुग्रीव और विभीषणको अपना लिया, पर उन लोगोंने कपट-भाव नहीं छोड़ा। अर्थात् उनके भीतर तो भाईकी स्त्रीके साथ अगम्यागमनरूप महापाप करने एवं ऐश्वर्यभोग करनेकी प्रबल वासना थी और ऊपरसे उन दोनोंने कुछ और ही बात कही। उदाहरणार्थ सुग्रीवने रामजीसे कहा था कि— सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहौं सेवकाई ॥ इसी प्रकार विभीषणने भी कहा था कि— 'उर कछु प्रथम वासना रही। प्रभु-पद-प्रीति-सरित सो बही ॥' किन्तु पीछे दोनोंने ही अपनी बातोंपर ध्यान नहीं दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि सुग्रीव और विभीषणके मनमें तो सुखोपभोगकी लालसा थी, पर उन दोनोंने रामजीसे बनावटी बात कही थी। भला यह अन्तर्यामी भगवान्के साथ छल नहीं तो और क्या है ! श्रीरामजीने उनका यह कपटभाव जानते रहनेपर भी शरणमें आनेके कारण उन दोनोंको अपना लिया और फिर कभी नहीं छोड़ा। ३—'अपनाये······हृदय अघाउ'—इसका अर्थ वियोगी हरिजीने इस प्रकार किया है—'यद्यपि सुग्रीव और विभीषणने अपना कपटभाव नहीं छोड़ा, पर आपने उन्हें अपने शरणमें ले ही लिया। और भरतजीकी तो सभामें सदा प्रशंसा करते रहते हैं, प्रशंसा करते-करते तृप्ति ही नहीं होती।' इस अर्थसे एक तो यह भाव प्रकट होता है कि सुग्रीव और विभीषणका कपटभाव प्रकट होनेके बाद रामजीने उन्हें अपनाया था और दूसरा भाव यह प्रकट होता है कि भरतकी प्रशंसा करनेमें रामजी सन्तुष्ट नहीं होते। किन्तु यथार्थतः ऐसा नहीं है। उन दोनोंने भगवान्के अपनानेके बाद अपने कपटभावका परिचय दिया
१९२ विनय-पत्रिका था; किन्तु उनका कपटभाव होनेपर भी रामजी उन्हें अपनाये ही रह गये— छोड़ा नहीं। दूसरी बात यह कि यदि श्रीरामजी 'भरतजीकी प्रशंसा करते रहते हैं', तो इसमें रामजीकी कौन-सी विशेषता है ? क्योंकि भरतजी तो प्रशंसा योग्य थे ही। अतः वियोगी हरिजीका अर्थ गोस्वामीजीके भावके सर्वथा विरुद्ध और असंगत है। रामजी अपने प्रिय भाई भरतकी प्रशंसा नहीं करते बल्कि भरत-सभामें भरतजीसे सुग्रीव और विभीषणकी प्रशंसा करते हैं। यहाँ ग्रन्थ- कारका यही भाव है। देखिये न, गोस्वामीजीने रामायणमें लिखा भी है:— जेहि अव बधेउ व्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली ॥ सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहु सो न राम हिय हेरी ॥ ते भरतहिं भेंटत सनमाने। राजसभा रघुवीर बखाने ॥ ( १०१ ) जाउँ कहाँ तजि चरन तिहारे । काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे ॥१॥ कौने देव बराइ बिरद-हित, हठि हठि अधम उधारे । खग, मृग, व्याध, पषान, विटप जड़, जवन कवन सुर तारे ॥२॥ देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब, माया विबस बिचारे । तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे ॥३॥ शब्दार्थ—कौने = किस । बराइ = चुनकर । कवन = किस । भावार्थ—हे नाथ ! मैं आपके चरणोंको छोड़कर कहा जाऊँ ? संसारमें ‘पतित-पावन' नाम किसका है ? दीनजन किसे बहुत प्यारे हैं ? ॥१॥ किस देवताने अपने ब्रानेकी लाज रखनेके लिए जबर्दस्ती कर करके अधमोंको चुनकर उनका उद्धार किया है ? पक्षी (जटायु), मृग (मारीच), व्याध (वाल्मीकि), पाषाण (अहल्या), जड़वृक्ष (यमलार्जुन) और यवनको किस देवताने तारा ? ॥२॥ देवता, दैत्य, मुनि, नाग और मनुष्य ये सब बेचारे मायाके अधीन हैं। अब हे प्रभो ! यह तुलसीदास अपनेको उन लोगोंके हाथोंमें क्यों सौंपे, अपना स्वाभिमान क्यों खो दे ॥३॥
विनय-पत्रिका १९३ विशेष १—'मृग'—रावणका मामा मारीच कपटी मृग बनकर भगवान्के सामने आया था। भगवान्ने उसे मारकर मुक्त कर दिया था। गोस्वामीजीने राम- चरितमानसमें लिखा है— अन्तर प्रेम तासु पहिचानी। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि भवानी ॥ ( १०२ ) हरि ! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों। साधन-धाम बिबुध-दुरलभ तनु, मोहिं कृपा करि दीन्हों ॥१॥ कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके, एक एक उपकार । तदपि नाथ कछु और माँगिहौं, दीजै परम उदार ॥२॥ बिषय-वारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कवहूँ पल एक । ताते सहौं विपति अति दारुन, जनमत जोनि अनेक ॥३॥ कृपा-डोरि बंसी पद-अंकुस, परम प्रेम मृदु चारो। येहि विधि वेधि हरहु दुख मेरो, कौतुक राम तिहारो ॥४॥ हैं श्रुति-विदित उपाय सकल सुर, केहि केहि दीन निहोरै । तुलसिदास येहि जीव मोह-रजु, जोइ बाँध्यो सोइ छोरै ॥५॥ शब्दार्थ—मीन = मछली। बंसी = मछली फँसानेकी काँटिया। भावार्थ—हे हरे ! आपने बड़ा अनुग्रह किया। आपने कृपा करके मुझे साधनोंका स्थान, देवताओंके लिए दुर्लभ (मनुष्य) शरीर दे दिया ॥१॥ आपका एक एक उपकार करोड़ों मुखसे नहीं कहा जा सकता; फिर भी हे नाथ ! मैं कुछ और माँगूँगा। आप परम उदार हैं, वह मुझे दीजिये ॥२॥ मेरा मनरूपी मीन विषयरूपी जलसे कभी एक पलके लिए भी अलग नहीं होता। इससे मैं अनेक योनियोंमें जन्म लेकर अत्यन्त दारुण कष्ट सहन करता हूँ ॥३॥ (इस मनमच्छको पकड़नेके लिए) हे रामजी ! अपनी कृपाकी डोरी और अपने चरण- चिह्न अंकुशको कँटिया बनाइये। उस बंसीमें परम प्रेम रूपी कोमल चारा लगा दीजिये। इस प्रकार (मनरूपी मछलीको) बेधकर मेरा दुःख दूर कीजिये। इसमें आपका कौतुक भी होगा ॥४॥ यों तो वेदोंमें बहुत-से उपाय (संयम, जप, तप १३
१९४ विनय-पत्रिका आदि) विदित हैं और सब देवता भी प्रसिद्ध हैं, किन्तु यह दीन किस-किसका निहोरा करे ? तुलसीदास कहते हैं कि जिसने इस जीवको मोह-रूपी रस्सीमें बाँध रखा है, वही इसे छोड़ सकता है ॥५॥ विशेष १—गोस्वामीजीने इस पदमें बड़ा ही अपूर्व और अलौकिक रूपक बाँधकर सरकारकी सेवामें अपनी माँग पेश की है। इसमें विरक्ति और अनुरक्तिका सजीव सिद्धान्त है। मनको मीन बनाया है और विषयोंको जल; जिस प्रकार मछलियोंमें चंचलता होती है, उसी प्रकार मन भी अत्यन्त चंचल है। जिस प्रकार जलका बहाव स्वाभाविक ही अधोगामी होता है, उसी प्रकार विषय- वासनाका परिणाम भी अधोगामी है। जिस प्रकार मछली एक क्षणके लिए भी जलसे पृथक् नहीं होना चाहती, उसी प्रकार मन भी विषयोंको नहीं छोड़ना चाहता। [ १०३ ] यह विनती रघुबीर गुसाईं । और आस-विश्वास-भरोसो, हरौ जीव-जड़ताई ॥१॥ चहौं न सुगति, सुमति, सम्पति, कछु, रिधि-सिधि, बिपुल बड़ाई । हेतु-रहित अनुराग राम-पद बढ़ै अनुदिन अधिकाई ॥२॥ कुटिल करम लै जाइ मोहिं जहँ जहँ अपनी बरिआई । तहँ तहँ जनि छिन छोह छाँड़ियो, कमठ-अण्ड की नाई ॥३॥ या जग में जहँ लगि या तनु की प्रीति प्रतीति सगाई । ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों होहिं सिमिट इक ठाई ॥४॥ शब्दार्थ—हेतु-रहित = कारणरहित, निष्काम । बरिआई = जबर्दस्ती । कमठ = कछुआ सगाई = नाता, सम्बन्ध । भावार्थ—हे रघुबीर स्वामी ! मेरी यही विनती है कि आप इस जीवकी जड़ता और दूसरोंका आशा-भरोसा तथा विश्वास दूर कर दीजिये ॥१॥ मैं मुक्ति, सुबुद्धि, सम्पत्ति, ऋद्धि-सिद्धि तथा बहुत बड़ाई आदि कुछ भी नहीं चाहता । हे रामजी ! (सिर्फ इतनी ही कामना है कि) आपके चरणोंमें मेरा
निष्काम प्रेम दिनोंदिन अधिकसे अधिक बढ़ता जाय ॥२॥ मुझे यह बुरा कर्म जहाँ-जहाँ (जिस-जिस योनिमें) अपनी जबर्दस्तीसे ले जाय, वहाँ-वहाँ आप वैसे ही क्षणभरके लिए भी अपनी कृपा न हटाइयेगा, जैसे कछुआ अपने अण्डेको नहीं छोड़ता ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि इस संसारमें जहाँतक इस शरीरका प्रेम, विश्वास और नाता है, वह सब एक जगह सिमटकर केवल परमात्मासे ही हो ॥४॥ [ १०४ ] जानकी-जीवन की बलि जैहौं । चित कहै रामसीय-पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहौं ॥१॥ उपजी उर प्रतीति सपनेहुँ सुख, प्रभु-पद-विमुख न पैहौं । मन-समेत या तनके वासिन्ह, इहै सिखावन दैहौं ॥२॥ श्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहौं । रोकिहौं नयन बिलोकत औरहिं, सीस ईस ही नैहौं ॥३॥ नातो-नेह नाथसों करि सब नातो-नेह बहैहौं । यह छर भार ताहि तुलसी जग जाको दास कहैहौं ॥४॥ शब्दार्थ—नैहौं = प्रणाम करूँगा। छर = भारी। भार = बोझा। भावार्थ—मैं श्रीजानकीनाथपर बलि जाऊँगा (अपनेको निछावर कर दूँगा)। मेरा मन कह रहा है कि श्रीसीतारामजीके चरणोंको छोड़कर अब मैं चलायमान होकर कहीं न जाऊँगा ॥१॥ मेरे हृदयमें यह विश्वास उत्पन्न हो गया है कि भगवान्के चरणोंसे विमुख होनेपर मुझे स्वप्नमें भी सुख न मिलेगा। मनके सहित इस शरीरके अन्य निवासियों—(इन्द्रियों) को मैं यही उपदेश दूँगा कि ॥२॥ न तो मैं अपने कानोंसे (रामजीकी कथा छोड़कर) किसी औरकी कथा सुनूँगा, और न जिह्वासे किसी दूसरेका गुणगान करूँगा। और किसीकी ओर देखनेसे नेत्रोंको रोकूँगा, केवल अपने इष्टदेव-(श्रीरामजी) को ही सिर नवाऊँगा ॥३॥ अपने स्वामीसे स्नेह-सम्बन्ध जोड़कर और तमाम स्नेह-सम्बन्धोंको बहा दूँगा। तुलसीदास कहते हैं कि मैं इस संसारमें जिसका दास कहाऊँगा, उसीको अपना यह भारी बोझा सौंप दूँगा ॥४॥
११६ विनय-पत्रिका [ १०५ ] अबलौं नसानी, अब न नसैहौं । राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं ॥१॥ पायेउँ नाम चारु चिन्तामनि, उर कर ते न खसैहौं । स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं ॥२॥ परवस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं । मन मधुकर पनकै तुलसी रघुपति-पद कमल बसैहौं ॥३॥ शब्दार्थ—नसानी = व्यर्थ समय नष्ट हुआ । सिरानी = बीत गयी । डसैहौं = बिछौना बिछाऊँगा । खसैहौं = गिराऊँगा । भावार्थ—अबतक तो मेरा समय व्यर्थ नष्ट हुआ, पर अब मैं अपना जीवन न बिगाडूँगा । रामजीकी कृपासे संसार-रूपी रात्रि बीत चुकी है, अब जागनेपर (विरक्तिका भाव उत्पन्न होनेपर) फिर (सोनेके लिए) बिछौना न बिछाऊँगा (मायामें न फँसूगा) ॥१॥ मैं रामनाम रूपी सुन्दर चिन्तामणि पा गया हूँ, अब उसे हृदय-रूपी हाथसे न गिराऊँगा । श्रीरामजीके पवित्र और सुन्दर साँवले रूपकी कसौटीपर अपने चित्त-रूपी सोनेको कसूँगा ॥२॥ अबतक मुझे परवश जानकर ये इन्द्रियाँ मुझपर हँसती रहीं, किन्तु अब मैं अपने वशमें होकर अपनी हँसी न कराऊँगा । तात्पर्य, अब मैं मन और इन्द्रियोंके वशमें नहीं हूँ, ये मुझे विषयोंकी ओर खींचकर न ले जा सकेंगी । तुलसीदास कहते हैं कि अब मैं प्रण करके अपने मन-रूपी भ्रमरको भगवच्चरणारविन्दमें टिकाऊँगा ॥३॥ विशेष १—'स्यामरूप......कसौटी'—भगवान्का शरीर श्याम है और कसौटी, जिसपर सोना कसा जाता है—उसका रंग भी श्याम है । इसलिए यह उपमा सर्वथा सार्थक है । २—'परबस......हँसैहौं'—सब इन्द्रियाँ मनके अधीन हैं और मन जीव- के अधीन है । किन्तु इन्द्रियोंकी विषयासक्तिसे जीव ही इन्द्रियोंके अधीन हो जाता है । जब जीव इन्द्रियोंपर अधिकार कर लेता है, वे स्वेच्छानुसार कुमार्ग- पर जाने नहीं पातीं, तब जीवको स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाती है । यों तो जीव
विनय-पत्रिका १९७ स्वतन्त्र नित्य-मुक्त है ही (गोस्वामीजीने भी लिखा है—‘ईस्वर अंस जीव अविनासी । सहज अमल चेतन सुखरासी), किन्तु जबतक वह जितेन्द्रिय नहीं हो जाता, तबतक स्वतन्त्र रहनेपर भी परतन्त्र बना रहता है । ३—१०४ वें और १०५ वें पदोंमें महाकवि तुलसीदासजीने परमात्माके सामने अपना कलेजा निकालकर रख दिया है । बहुत सुन्दर ! राग रामकली ( १०६ ) महाराज रामादखो धन्य सोई । गरुअ, गुनरासि, सर्वग्य, सुकृती, सूर, सील-निधि, साधु तेहि सम न कोई ॥१॥ उपल-केवट-कीस-भालु-निसाचर-सबरि- गीध सम-दम-दया-दान-हीने । नाम लिय राम किय परम पावन सकल, नर तरत तिनके गुनगान कीने ॥२॥ व्याध अपराध की साध राखी कहा, पिंगलै कौन मति भगति भेई । कौन धौं सोमजाजी अजामिल अधम, कौन गजराज धौं बाजपेयी ॥३॥ पांडु-सुत, गोपिका, विदुर, कुबरी, सबहिं, सुद्ध किय सुद्धता लेस कैसो । प्रेम लखि कुस्त किये आपने तिनहुँ को, सुजस संसार हरिहर को जैसो ॥४॥ कोल, खस, भील, जवनादि खल राम कहि, नीच है ऊँच पद को न पायो । दीन-दुख-दवन श्रीरघन करुना-भवन, पतित-पावन विरद वेद गायो ॥५॥
१९८ विनय-पत्रिका मंदमति, कुटिल, खल-तिलक तुलसी सरिस, भो न तिहुँलोक तिहुँकाल कोऊ। नाम की कानि पहिचानि जन आपनो, ग्रसित कलि-ब्याल राख्यो सरन सोऊ ॥६॥ शब्दार्थ-रामादरथो = (राम + आदरथो) रामने आदर किया। गरुअ = गम्भीर। उपल = पाषाण (अहिल्या)। कीस = बन्दर। भेई = सींची हुई, भींगी हुई। सोमजाजी = सोमयज्ञ करनेवाला। बाजपेयी = अश्वमेध यज्ञ करनेवाला। खस = जाति-विशेष। सरिस = समान। भो = हुआ। कानि = लज्जा। भावार्थ-जिसका भगवान् श्रीरामजीने आदर किया, वही धन्य है! (जिसका रामजी आदर करते हैं) उसके समान गम्भीर, गुणराशि, सर्वज्ञ, पुण्य- वान्, वीर, अत्यन्त सुशील और साधु दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ (देखिये न) अहल्या, निषाद, वानर, भालू, राक्षस, शबरी, जटायु आदि शम, दम, दया और दान आदि गुणोंसे हीन थे, किन्तु नाम लेनेसे ही श्रीरामजीने इन सबको इतना परम पवित्र कर दिया कि उनका गुणगान करनेसे मनुष्य तर जाता है ॥२॥ व्याधने अपराध करनेमें कौन-सी साध बाकी रख छोड़ी थी (क्या उठा रखा था)? अथवा पिंगला नाम्नी वेश्याकी ही बुद्धि कौन-सी भक्तिसे सींची (भींगी) हुई थी? अधम अजामिलने कब सोमयज्ञ किया था, और गजेन्द्र कौन-सा अश्वमेध यज्ञ करनेवाला था? ॥३॥ पांडवों, गोपियों, विदुर और कुबरी आदिको, जिन्हें इस बातका रंचमात्र भी ज्ञान न था कि शुद्धता क्या वस्तु है- आपने पवित्र कर दिया। हे श्रीकृष्णजी! आपने प्रेम देखकर इन्हें भी अपना लिया। उसीका यह परिणाम है कि संसारमें उनका सुन्दर यश विष्णु और शिवकी तरह छा रहा है ॥४॥ कोल, खस, भील, यवन आदि खलोंमें ऐसा कौन है जिसने राम-नाम उच्चारण करके नीच होनेपर भी ऊँचा पद नहीं पाया? दीनोंका दुःख दूर करनेवाले, तथा करुणाके स्थान लक्ष्मीपति श्रीरामजीका पतितोंको पवित्र करना ही बाना है-ऐसा वेदोंने कहा है ॥५॥ तुलसीदासके समान मन्द-बुद्धि, कुटिल और खल-शिरोमणि तीनों लोकमें और तीनों कालमें कोई नहीं हुआ; फिर भी अपने नामका लिहाज करके तथा अपना दास जानकर कलिकाल-रूपी सर्पसे ग्रसित इस तुलसीदासको भी श्रीरामजीने अपनी शरणमें रख लिया ॥६॥
विनय-पत्रिका १९१ विशेष १—'उपल'—अहिल्या; ४३ पदके 'विशेष'में देखिये। २—'केवट'—वन-यात्राके समय गंगा-तटपर पहुँचकर भगवान्ने केवटसे नाव माँगी थी। उसने प्रेम-विह्वल होकर कहा था:— इहि घाटते थोरिक दूरि अहै कटि लौं जलु थाह देखाइहौं जू। परसे पग धूरि तरै तरनी घरनी घर क्यों समुझाइहौं जू ॥ तुलसी अवलम्ब न और कछू लरिका केहि भाँति जियाइहौं जू। बरु मारिय मोहि बिना पग धोये हौं नाथ न नाव चढ़ाइहौं जू ॥ ३—'सबरी'—शबरी नामकी भीलनीको मतंग ऋषिकी सेवा करते-करते ईश्वर-भक्ति हो गयी थी। जब श्रीरामजी उसके स्थानपर पहुँचे, तब उसने चख-चखकर जूठे बेर भगवान्को खिलाये। उसे भगवान्ने नवधा भक्तिका उपदेश देकर मुक्त कर दिया था। नवधा भक्तिका लक्षण यह है:— आचारो विनयो विद्या प्रतिष्ठा तीर्थदर्शनम् । निष्ठा वृत्तिस्तपोदानं नवधा कुललक्षणम् ॥ ४—'गीध'—जटायु; ४३ पदके 'विशेष'में देखिये। ५—'पिंगला'—९४ पदके 'विशेष'में देखिये। ६—'भेई' शब्दका अर्थ श्रीवियोगी हरिने 'लगाई' लिखा है; किन्तु वास्तवमें इस शब्दका अर्थ है 'सींचा' भिगोया या तर किया । ७—गजराज—८३ पदके विशेषमें देखिये । ८—'बिदुर'—दासीपुत्र थे। वह श्रीकृष्ण भगवान्के अनन्य भक्त थे। इसीसे हस्तिनापुरमें जानेपर भगवान् कौरवोंके घर न जाकर विदुरके ही अतिथि हुए थे। जिस समय भगवान् वहाँ पहुँचे, उस समय विदुर घरमें नहीं थे। उनकी स्त्रीने ही श्रीकृष्णका सत्कार किया। वह केले लेकर प्रभुजीको खिलाने बैठी; पर प्रेममें विभोर होनेके कारण केलोंको छीलकर नीचे गिराने लगी और छिलके भगवान्के हाथोंमें देने लगी। प्रेमके भूखे भगवान् प्रसन्न होकर उन छिलकोंको ही खाने लगे।—विदुरके साथ भगवान्का सख्य भाव था। ९—'कुबरी'—कंसकी दासी थी। कंसको मारकर लौटते समय भगवान् इसके अतिथि बने थे। यह भगवान्की परम भक्त थी।
५. श्री रामचन्द्र जी की स्तुति व विनय निवेदन
२०० विनय-पत्रिका राग विहाग बिलावल [ १०७ ] है नीको मेरो देवता कोसलपति राम । सुभग सरोरुह लोचन, सुठि सुन्दर स्याम ॥१॥ सिय-समेत सोहत सदा छवि अमित अनंग । भुज विसाल सर धनु धरे, कटि चारु निषंग ॥२॥ वलि-पूजा चाहत नहीं, चाहत एक प्रीति । सुमिरत ही मानै भलो, पावन सब रीति ॥३॥ देहि सकल सुख, दुख दहै, आरत-जन-बन्धु । गुन गहि, अघ-औगुन हरै, अस करुनासिन्धु ॥४॥ देस-काल-पूरन सदा वद वेद पुरान । सबको प्रभु, सबमें बसै, सबकी गति जान ॥५॥ को करि कोटिक कामना, पूजै बहु देव । तुलसिदास तेहि सेइये, संकर जेहि सेव ॥६॥ शब्दार्थ—नीको = अच्छे । निषंग = तरकस । भलो = अच्छा मानते हैं, प्रसन्न होते हैं । औगुन = दोष । बद = कहते हैं । भावार्थ—कोशलाधीश श्रीरामजी मेरे अच्छे देवता हैं। उनके सुन्दर नेत्र कमलके समान हैं और मनोहर श्याम शरीर बड़ा ही लावण्यमय है ॥१॥ वह अनेक कामदेवोंके समान शोभावाले हैं और सदैव महारानीजीके साथ शोभित रहते हैं। अपनी विशाल भुजाओंमें धनुष बाण लिये रहते हैं और कमरमें सुन्दर तरकस बाँधे हुए हैं ॥२॥ वह बलि और पूजा नहीं चाहते; चाहते हैं, केवल प्रेम। स्मरण करते ही वह प्रसन्न हो जाते तथा सबको पवित्र भी कर देते हैं ॥३॥ वह दुःखोंका नाश करके हर तरहका सुख देनेवाले हैं और दीन-जनोंके बन्धु हैं। वह ऐसे करुणा-सागर हैं कि गुणोंको ग्रहण करते और पाप तथा दुर्गुणोंको हर लेते हैं ॥४॥ वेदों और पुराणोंका कथन है कि देश और काल सदैव उन्हींसे परिपूर्ण रहते हैं, वह सबके स्वामी हैं, सबमें निवास करते हैं और सबकी गति जाननेवाले हैं ॥५॥ करोड़ों तरहकी कामनाओंसे प्रेरित होकर बहुत-से देवताओं-
विनय-पत्रिका २०१ को कौन पूजने जाय। तुलसीदास कहते हैं कि उन्हीं श्रीरामजीकी सेवा करनी चाहिये जिनकी पूजा शिवजी किया करते हैं ॥६॥ विशेष १—'नीको'—श्रीवियोगी हरिजीने 'नीको' शब्दका अर्थ 'सर्वश्रेष्ठ' किया है। (१०८) बीर महा अवराधिये, साधे सिधि होय। सकल काम पूरन करै, जानै सब कोय ॥१॥ बेगि, विलंब न कीजिये लीजै उपदेस। बीज मंत्र जपिये सोई, जो जपत महेस ॥२॥ प्रेम-वारि-तरपन भलो, घृत सहज सनेहु। संसय-समिध, अगिनि छमा, ममता-बलि देहु॥३॥ अघ-उचाटि, मन बस करै, मारै मद-मार। आकरषै सुख-संपदा-संतोष-विचार ॥४॥ जिन्ह यहि भाँति भजन कियो, मिले रघुपति ताहि। तुलसिदास प्रभु पथ चढ़्यो, जौ लेहु निवाहि ॥५॥ शब्दार्थ—बीजमंत्र = मूलमंत्र। समिध = हवनकी लकड़ी। अघ = पाप। उचाटि = छ महाप्रयोगोंमें उच्चाटन एक प्रयोग है। मार = कामदेव। भावार्थ—महावीर श्रीरामजीकी आराधना कीजिये, क्योंकि उन्हें साध लेनेसे सब काम सिद्ध हो जाता है। यह बात सब लोग जानते हैं कि वह सब काम पूरा कर देते हैं ॥१॥ बस, अब देर न कीजिये, शीघ्र उपदेश लीजिये, और वही मूलमंत्र जपिये, जिसे शिवजी जपते हैं ॥२॥ (मन्त्रजपकी विधि कहते हैं) प्रेमरूपी जलसे तर्पण करना उत्तम है। यहाँ स्वाभाविक स्नेहरूपी घी है, संशय (इस कार्यसे सिद्धि होगी या नहीं, इस प्रकारका भाव) ही समिध है और क्षमा ही अग्नि है। (वीरकी आराधनामें बलि चाहिये, अतः कहते हैं कि) उसमें ममताकी बलि दो ॥३॥ (इस प्रकार सब कार्य करके) पापोंका उच्चाटन करके मनको वशमें करना चाहिये, अहंकार और कामदेवका मारण तथा सन्तोष और विचाररूपी सुख-सम्पत्तिका आकर्षण करना चाहिये ॥४॥ जिन लोगोंने इस प्रकार
भजन किया, उन्हें श्रीरघुनाथजी मिले हैं। अब हे प्रभो ! तुलसीदास आपके पथपर चढ़ा है, यदि आप निवाह लें (तो वह आपतक पहुँच जायगा) ॥५॥ विशेष १—'लीजै उपदेस'—उपदेस देना गुरुका कार्य है। वास्तवमें बिना गुरुके भवसागरसे पार होना असम्भव है। गोस्वामीजीने कहा भी है :— बिनुगुरु भव-निधि तरै न कोई। जौ बिरंचि संकर सम होई ॥ किन्तु गुरु वही है, जो अज्ञानान्धकारको दूर करे। देखिये:— गुकारस्त्वन्धकारस्यादुकारस्तं निरोधकः । अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥ ( १०९ ) कस न करहु करुना हरे ! दुख हरन सुरारि । त्रिविधताप-संदेह-सोक-संसय-भय-हारि ॥१॥ इक कलिकाल-जनित मल, मतिमंद, मलिन-मन । तेहि पर प्रभु नहिं कर सँभार, केहि भाँति जियै जन ॥२॥ सब प्रकार समरथ प्रभो, मैं सब विधि दीन । यह जिय जानि द्रवौ नहीं, मैं करम विहीन ॥३॥ भ्रमत अनेक जोनि रघुपति, पति आन न मोरे । दुख-सुख सहौं, रहौं सदा सरनागत तोरे ॥४॥ तो सम देव न कोउ कृपालु, समुझौं मन माहीं । तुलसिदास हरि तोषिये, सो साधन नाहीं ॥५॥ शब्दार्थ—सँभार = रक्षा । आन = दूसरा । तोषिये = सन्तोष दीजिये । भावार्थ—हे हरे ! हे सुरारे !! आप तो दुःखोंके हरनेवाले हैं, फिर मुझपर कृपा क्यों नहीं करते ? आप तीनों तापोंका तथा सन्देह, शोक, संशय और भयका हरण करनेवाले हैं ॥१॥ एक तो कलिकाल-जनित पापोंसे यों ही बुद्धि मन्द हो गयी है तथा मन मलिन हो गया है, तिसपर हे प्रभो ! आप मेरा सम्भार भी नहीं करते, (अब आप ही बतावें कि) यह दास किस प्रकार जिये ॥२॥ हे प्रभो ! आप सब तरहसे सामर्थ्यवान् हैं और मैं सब तरहसे दीन हूँ। क्या आप
विनय-पत्रिका २०३ अपने दिलमें यह जानकर मुझपर नहीं पिघल रहे हैं कि मैं कर्म-हीन (भाग्य-हीन) हूँ ? ॥३॥ हे रघुनाथजी ! मैं अनेक योनियोंमें भ्रम रहा हूँ, मेरे लिए दूसरा कोई स्वामी नहीं है। इसीसे मैं दुःख-सुख सहता हुआ सदा आपकी शरणमें आकर रहता हूँ ॥४॥ आपके समान कृपालु दूसरा कोई भी देवता नहीं है, यह मैं अपने मनमें खूब समझ रहा हूँ। किन्तु हे नाथ ! आप तुलसीदासको सन्तोष दीजिये, क्योंकि (मेरे पास) वह साधन नहीं है जिससे आप प्रसन्न होते हैं। अर्थात् तुलसी- दास भाग्य और उपाय दोनोंसे रहित है, आप ही उसका कल्याण करें ॥५॥ ( ११० ) कहु केहि कहिय कृपानिधे ! भव-जनित विपति अति । इंद्रिय सकल विकल सदा, निज निज सुभाउ रति ॥१॥ जे सुख-संपति, सरग नरक संतत सँग लागी । हरि ! परिहरि सोइ जतन करत मन मोर अभागी ॥२॥ मैं अति दीन, दयालु देव सुनि मन अनुरागे । जो न द्रवहु रघुवीर धीर, दुख काहे न लागे ॥३॥ जद्यपि मैं अपराध-सदन, दुख-समन मुरारे । तुलसिदास कहँ आस इहैं बहु पतित उधारे ॥४॥ शब्दार्थ—विकल = व्याकुल। मोर = मेरा। भावार्थ—हे कृपानिधे ! कहिये, संसार-जनित भारी विपत्तियोंको मैं किससे कहूँ ? सब इन्द्रियाँ अपने-अपने स्वभावकी प्रीतिमें सदा विकल रहती हैं ॥१॥ हे हरे ! मेरा अभागा मन भी आपको छोड़कर वही यत्न कर रहा है जिससे सुख-सम्पत्ति, स्वर्ग-नरकका बखेड़ा सदैव साथ लगा रहे ॥२॥ मैं अत्यन्त दीन हूँ। देव (श्रीरामजी) दयालु हैं, यह सुनकर मनमें प्रसन्नता हुई। हे धैर्यवान् श्रीरघुनाथजी ! यदि आप द्रवीभूत न होंगे तो भला मुझे दुःख कैसे न होगा ? ॥३॥ यद्यपि मैं अपराधोंका घर हूँ, पर हे मुरारे ! आप तो दुःखोंका शमन करनेवाले हैं न ! तुलसीदासको यही भरोसा है कि आपने बहुत-से पतितों- को तार दिया है (इसलिए तुलसीदासको भी तारेंगे) ॥४॥
२०४ विनय-पत्रिका १११ ) केसव ! कहि न जाइ का कहिये । देखत तब रचना विचित्र हरि ! समुझि मनहिं मन रहिये ॥१॥ सून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे । धोये मिटै न मरै भीति दुख, पाइय इहि तनु हेरे ॥२॥ रविकर-नीर बसै अति दारुन मकर रूप तेहि माहीं । बदन-हीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं ॥३॥ कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै । तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै ॥४॥ शब्दार्थ—चितेरे = चित्रकार । हेरे = ढूँढ़नेसे । रविकर-नीर = ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यकी किरणोंसे मरुभूमि पर जो जलका भ्रम होता है, उसीको 'रविकर-नीर' कहा गया है। इसे मृगतृष्णा या मृगज ल भी कहते हैं । बदन = मुख । आपन = अपनेको, आत्माको । : भावार्थ—हे केशव ! कहा नहीं जाता, क्या कहूँ ? हे हरे ! आपकी इस विचित्र रचनाको देखकर मन ही मन समझकर रह जाता हूँ (कुछ कहते नहीं बनता) ॥१॥ इस संसाररूपी चित्रको अशरीरी (अव्यक्त, निराकार ब्रह्मरूपी) चित्रकारने शून्य (माया अथवा आकाशरूपी) दीवारपर बिना रंगके (संकल्प- से ही) बनाया है। (इस मायाचित्रका रंग) धोनेसे नहीं मिटता और इसे मरनेका भय और दुःख होता है। (तात्पर्य, जड़ चित्रका रंग धोनेसे मिट जाता है; पर यह पांचभौतिक चित्र धोनेसे नहीं मिटता; जड़ चित्रको मरनेका भय और दुःख नहीं होता, पर इस पांचभौतिक शरीर-रूपी चित्रको मरणका दुःख और भय बना रहता है)। यह सब विचित्रता कहाँ दिखलाई पड़ती है, इसके लिए ग्रंथकारका कथन है कि इसी शरीरमें ढूँढ़नेसे (यह सब विचित्रता) मिलती है ॥२॥ (अब दूसरी विचित्रता कहते हैं) मरीचिकामें अत्यन्त भयानक मगररूपी तृष्णा रहती है, जोकि मुख-हीन है (यानी उस मगरके मुँह नहीं है) । किन्तु जो भी वहाँ जल पीने जाता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चैतन्य, उसे वह ग्रस लेती है। भाव यह है कि, यह संसार मृगजलके समान है और इसमें मगररूप निराकार काल निवास करता है। उसके मुख नहीं है, पर वह
विनय-पत्रिका २०५ सबको (जल पीनेके लिए जानेवाले लोगोंको) खा जाता है। या यों कहिये कि मृगजल-तुल्य भ्रममय संसारमें मगररूपी रूप-रसादि पाँचों विषय बसते हैं, जो लोग इनमें सुख मानकर फँस जाते हैं, वे खाली हाथ कालके मुखमें चले जाते हैं ॥३॥ कोई तो कहता है कि (यह संसार) सत्य है, कोई कहता है कि झूठा (मिथ्या) है, और कोई इन दोनोंको ही प्रबल मानता है; यानी यह सत्य भी है और मिथ्या भी (अर्थात् पूर्वमीमांसावाले कर्मवादी सत्य मानते हैं और उत्तरमीमांसावाले अद्वैतवेदान्ती मिथ्या मानते हैं, और सांख्यशास्त्रके आचार्य दोनों-(सत्य और मिथ्या) को ही जगत्का कारणरूप सत्य मानते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि जो मनुष्य इन तीनों भ्रमोंको त्याग देता है वही अपनेको पहचानता है (उसे ही आत्मज्ञान होता है) ॥४॥ विशेष १-गोस्वामीजीने इस पदमें बहुत ही गम्भीर दार्शनिक भाव व्यक्त किया है। मननशील पाठक ही इसके असली अर्थकी गहराईतक पहुँच सकते हैं। २-'रविकर-नीर...माहीं'-का भाव यह है कि जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यकी किरणोंको जल समझकर मृग उन किरणोंके पीछे दौड़ता है और जल न पाकर प्यासा ही मर जाता है, उसी प्रकार इस भ्रमात्मक संसारमें सुख समझकर लिप्त रहनेवालोंको बिना सुखका कालरूपी अथवा रूप-रसादि विषयरूपी मगर निगल जाता है। एक अर्थ इसका यह भी हो सकता है कि इस मिथ्या संसार- सरोवरमें शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध ही रविकर-नीर है और उसमें मगररूप काल रहता है। जो लोग उस विषयरसको पीनेके लिए जाते हैं, उन्हें मगर निगल जाता है। मृगजल और विषयरसका जोड़ भी ठीक जँचता है। ५९ वें पदमें गोस्वामीजीने 'रूपादि सब सर्प' लिखकर पंच विषयोंको ही कालरूप सर्प बनाया है। ( ११२ ) केशव ! कारन कौन गुसाईं । जेहि अपराध असाधु जानि मोहिं तजेउ अग्य की नाईं ॥१॥ परम पुनीत सन्त कोमल-चित, तिनहिं तुमहिं बनि आई । तौ कत विप्र, ब्याध, गनिकहिं तारेहु, कछु रही सगाई ? ॥२॥
२०६ विनय-पत्रिका काल, करम, गति अगति जीव की, सब हरि ! हाथ तुम्हारे । सोइ कछु करहु, हरहु ममता प्रभु ! फिरउँ न तुम्हहिं बिसारे ॥३॥ जौ तुम तजहु, भजौं न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे । मन-बच-करम नरक-सुरपुर जहाँ तहँ रघुवीर निहोरे ॥४॥ जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सौं करौं ढिठाई । तुलसिदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई ॥५॥ शब्दार्थ—असाधु = दुष्ट । अग्य = अज्ञ, मूर्ख । बनि आई = पटती है । विप्र = अजा- मिल । निहोरे = विनय । सीदत = शिथिल होता जाता है । भावार्थ—हे केशव ! हे स्वामी ! कौन-सा कारण है जिस अपराधसे आपने मुझे दुष्ट जानकर अज्ञकी तरह छोड़ दिया ? ॥१॥ (यदि यह कहा जाय कि) जो परम पवित्र और कोमल चित्तवाले सन्त हैं, उन्हींसे आपकी पटती है, तो फिर आपने अजामिल, व्याध और गणिकाको क्यों तार दिया ? क्या उनसे आपका कुछ रिश्ता था ? ॥२॥ हे हरे ! जीवका काल (नाशकर्त्ता), कर्म (जो विश्व-ब्रह्माण्डको बाँधे हुए हैं), गति (स्वर्गादिकी प्राप्ति) और अगति (नरककी प्राप्ति) सब आपके ही हाथ है । अतः हे प्रभो ! मेरी ममता दूर करके कुछ ऐसा उपाय करिये, जिससे मैं आपको भूलकर भटकता न फिरूँ ॥३॥ हे प्रभो ! यदि आप मुझे छोड़ देंगे, तो भी मैं दूसरेको न भजूँगा, यही मेरे प्रणका प्रमाण है । हे रघुनाथजी ! मन, वचन और कर्मसे नरक या देवलोकमें जहाँ कहीं आप भेजेंगे, वहाँ आपकाही निहोरा करता रहूँगा ॥४॥ हे नाथ ! यद्यपि यह जो आपसे ऐसी ढिठाई कर रहा हूँ, वह उचित कार्य नहीं हो रहा है; किन्तु तुलसी- दास रातदिन (कलिकालसे) शिथिल होता जा रहा है, तिसपर वह आपकी निष्ठुरता भी देख रहा है; अर्थात् एक तो वह यों ही कष्ट भोग रहा है दूसरे आपकी निष्ठुरता उसे और भी अधिक सता रही है ॥५॥ विशेष १—इस पदमें गोस्वामीजीने पहले तो 'कछु रही सगाई' कहकर प्रभुजीको खूब खरी-खोटी सुनायी है, पीछे उसे अनुचित समझकर दीनता प्रकट की है । २—'व्याध गनिकहिं'—९४ पदके 'विशेष'में देखिये ।
विनय-पत्रिका २०७ ( ११३ ) माधव ! अब न द्रवहु केहि लेखे । प्रनतपाल पन तोर, मोर पन जियउँ कमल-पद देखे ॥१॥ जब लगि मैं न दीन, दयालु तैं, मैं न दास, तैं स्वामी । तब लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहिं, जद्यपि अंतरजामी ॥२॥ तैं उदार, मैं कृपन, पतित मैं, तैं पुनीत श्रुति गावै । बहुत नात रघुनाथ ! तोहिं मोहिं, अब न तजे बनि आवै ॥३॥ जनक-जननि, गुरु-बंधु, सुहृद-पति, सब प्रकार हितकारी । द्वैतरूप तम-कूप परौं नहिं, अस कछु जतन विचारी ॥४॥ सुनु अदभ्र करुना वारिजलोचन मोचन भय भारी । तुलसिदास प्रभु ! तब प्रकास बिनु, संसय टरै न टारी ॥५॥ शब्दार्थ—जनक = पिता । जननि = माता । सुहृद = मित्र । द्वैत = यहाँ मैं-मेराको द्वैत कहा है ।; अदभ्र = अत्यधिक, असीम । भावार्थ—हे माधव ! अब आप किस कारणसे कृपा नहीं कर रहे हैं ? आपकी तो शरणागतोंका पालन करनेकी प्रतिज्ञा है, और आपके चरणारविन्दों- को देख-देखकर जीनेकी प्रतिज्ञा मेरी है ॥१॥ जबतक मैं दीन नहीं बना था और आप दयालु नहीं हुए थे, मैं सेवक नहीं हुआ था और आप स्वामी नहीं हुए थे, तबतक मैंने जो कष्ट सहन किया था, उसे आपसे नहीं कहा था—यद्यपि आप अन्तर्यामी हैं, (घटघटके भीतरका हाल जाननेवाले हैं) ॥२॥ आप उदार हैं, मैं कृपण हूँ; मैं पापी हूँ और आप पवित्र हैं, ऐसा वेदोंने कहा है । हे रघु- नाथजी ! आपमें और मुझमें बहुत-से रिश्ते हैं, अब मुझे छोड़नेसे काम नहीं चल सकता ॥३॥ आप मेरे पिता, माता, गुरु, भाई, मित्र, स्वामी और सब प्रकारसे हितकारी हैं । इसलिए कुछ ऐसा उपाय सोचिये, जिससे मैं द्वैतरूपी अन्धकूपमें न पहूँ । हे कमलनेत्र ! आपकी असीम करुणा संसारके भारी भयको दूर करने- वाली है । हे प्रभो ! बिना आपके प्रकाशके तुलसीदासका संशय (अज्ञानान्धकार) टाले नहीं टल सकता ।
२०८ विनय-पत्रिका ( ११४ ) माधव ! मो समान जग माहीं। सब विधि हीन, मलीन, दीन अति, लीन विषय कोउ नाहीं ॥१॥ तुम सम हेतु-रहित कृपालु आरत-हित ईस न त्यागी । मैं दुख-सोक-विकल कृपालु ! केहि कारन दया न लागी ॥२॥ नाहिं न कछु औगुन तुम्हार, अपराध मोर मैं माना। ग्यान-भवन तनु दियेहु नाथ, सोउ पाय न मैं प्रभु जाना ॥३॥ बेनु करील, श्रीखंड बसंतहि दूषन मृषा लगावै । सार-रहित हत-भाग्य सुरभि, पल्लव सो कहु किमि पावै ॥४॥ सब प्रकार मैं कठिन, मृदुल हरि, दृढ़ विचार जिय मोरे । तुलसिदास प्रभु मोह-स्रंखला, छुटिहि तुम्हारे छोरे ॥५॥ शब्दार्थ- हेतुरहित = निष्काम । बेनु = बाँस । श्रीखंड = चन्दन । सुरभि = सुगन्ध । पल्लव = पत्तियाँ । मृदुल = कोमल । भावार्थ- हे माधव ! इस संसारमें मुझसा, सब प्रकारसे हीन, मलिन, अत्यन्त दीन और विषयासक्त दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ और आपके समान निष्काम कृपा करनेवाला, दुखियोंका हितू और परम त्यागी स्वामी दूसरा कोई नहीं है। मैं दुःख और शोकसे इतना विकल हूँ, फिर भी हे परम कृपालु ! किस कारणसे आपको मुझपर दया नहीं आयी ? ॥२॥ किन्तु इसमें आपका कुछ दोष नहीं है, यह सब मेरा ही अपराध है- इसे मैं मानता हूँ। हे नाथ ! (वह अपराध यही है कि) आपने तो मुझे ज्ञानका आगार (मनुष्य) शरीर दिया, पर उसे भी पाकर मैंने आपको नहीं पहचाना ॥३॥ सार-हीन बाँस चन्दनको और हतभाग करील वसन्त ऋतुको व्यर्थ ही दोष देते हैं। भला कहो तो सही, चन्दन सारहीन बाँसको कैसे सुगंध प्रदान कर सकता है और करीलको (जिसमें पत्ते होते ही नहीं), वसन्त ऋतु द्वारा पत्ते किस प्रकार प्राप्त हो सकते हैं ? ॥४॥ हे प्रभो, मेरे हृदयका यह दृढ़ विचार है कि मैं हर तरहसे कठोर हूँ, और आप कोमल हैं। हे प्रभो ! तुलसीदासकी मोह-श्रृंखला आपके ही छोड़नेसे छूटेगी ॥५॥
विनय-पत्रिका ११५ ) माधव ! मोह-फाँस१ क्यों टूटै । बाहर कोटि उपाय करिय, अभ्यन्तर ग्रन्थि न छूटै ॥१॥ घृत पूरन कराह अंतरगत ससि प्रतिबिंब दिखावै । ईंधन अनल लगाइ कलप सत, औटत नास न पावै ॥२॥ तरु-कोटर महँ बस बिहंग तरु काटै मरै न जैसे । साधन करिय विचार-हीन मन शुद्ध होइ नहिं तैसे ॥३॥ अंतर मलिन विषय मन अति, तन पावन करिय पखारे । मरइ न उरग अनेक जतन बलमीकि विविध विधि मारे ॥४॥ तुलसिदास हरि-गुरु करुना बिनु विमल विवेक न होई । बिनु बिबेक संसार-घोर-निधि पार न पावै कोई ॥५॥ शब्दार्थ—ग्रंथि = गाँठ। प्रतिबिम्ब = छाया। कोटर = खोड़र, छेद। विचार = सत्- असत्का विचार, आत्मज्ञान । बलमीकि = बिल । भावार्थ—हे माधव ! मेरा यह मोहका फन्दा क्यों कर टूटेगा ? बाहरसे करोड़ों उपाय क्यों न किये जायँ, उनसे भीतरकी गाँठ नहीं छूट सकती ॥१॥ घीसे भरे हुए कड़ाहमें जो चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है, उसका सौ कल्पतक ईंधन और आग लगाकर औटानेसे नाश नहीं हो सकता (जबतक कड़ाहमें जरा भी घी रहेगा, तबतक वह प्रतिबिम्ब ज्योंका त्यों बना रहेगा) इसी प्रकार जबतक मोह रहेगा, तबतक आवागमनकी फाँसी भी बनी रहेगी ॥२॥ जैसे वृक्षके कोटरमें रहनेवाला पक्षी वृक्षके काटनेसे नहीं मर सकता, वैसे ही (बाहरी) साधनोंसे (सत्-असत्) विचार-शून्य मन शुद्ध नहीं हो सकता ॥३॥ जिस प्रकार साँपके बिलपर अनेक प्रकारसे मारने अथवा नाना उपाय करनेसे उसके भीतरका सर्प नहीं मरता, उसी प्रकार शरीरको बाहरसे धोकर पवित्र या स्वच्छ करनेसे विषयोंके कारण मलिन हुआ मन ज्योंका त्यों मलिन ही रह जाता है—पवित्र नहीं होता ॥४॥ हे तुलसीदास ! बिना भगवान् और गुरुकी १. पाठान्तर—'पास' । १४