विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १९७ स्वतन्त्र नित्य-मुक्त है ही (गोस्वामीजीने भी लिखा है—‘ईस्वर अंस जीव अविनासी । सहज अमल चेतन सुखरासी), किन्तु जबतक वह जितेन्द्रिय नहीं हो जाता, तबतक स्वतन्त्र रहनेपर भी परतन्त्र बना रहता है । ३—१०४ वें और १०५ वें पदोंमें महाकवि तुलसीदासजीने परमात्माके सामने अपना कलेजा निकालकर रख दिया है । बहुत सुन्दर ! राग रामकली ( १०६ ) महाराज रामादखो धन्य सोई । गरुअ, गुनरासि, सर्वग्य, सुकृती, सूर, सील-निधि, साधु तेहि सम न कोई ॥१॥ उपल-केवट-कीस-भालु-निसाचर-सबरि- गीध सम-दम-दया-दान-हीने । नाम लिय राम किय परम पावन सकल, नर तरत तिनके गुनगान कीने ॥२॥ व्याध अपराध की साध राखी कहा, पिंगलै कौन मति भगति भेई । कौन धौं सोमजाजी अजामिल अधम, कौन गजराज धौं बाजपेयी ॥३॥ पांडु-सुत, गोपिका, विदुर, कुबरी, सबहिं, सुद्ध किय सुद्धता लेस कैसो । प्रेम लखि कुस्त किये आपने तिनहुँ को, सुजस संसार हरिहर को जैसो ॥४॥ कोल, खस, भील, जवनादि खल राम कहि, नीच है ऊँच पद को न पायो । दीन-दुख-दवन श्रीरघन करुना-भवन, पतित-पावन विरद वेद गायो ॥५॥