भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 207

११६ विनय-पत्रिका [ १०५ ] अबलौं नसानी, अब न नसैहौं । राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं ॥१॥ पायेउँ नाम चारु चिन्तामनि, उर कर ते न खसैहौं । स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं ॥२॥ परवस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं । मन मधुकर पनकै तुलसी रघुपति-पद कमल बसैहौं ॥३॥ शब्दार्थ—नसानी = व्यर्थ समय नष्ट हुआ । सिरानी = बीत गयी । डसैहौं = बिछौना बिछाऊँगा । खसैहौं = गिराऊँगा । भावार्थ—अबतक तो मेरा समय व्यर्थ नष्ट हुआ, पर अब मैं अपना जीवन न बिगाडूँगा । रामजीकी कृपासे संसार-रूपी रात्रि बीत चुकी है, अब जागनेपर (विरक्तिका भाव उत्पन्न होनेपर) फिर (सोनेके लिए) बिछौना न बिछाऊँगा (मायामें न फँसूगा) ॥१॥ मैं रामनाम रूपी सुन्दर चिन्तामणि पा गया हूँ, अब उसे हृदय-रूपी हाथसे न गिराऊँगा । श्रीरामजीके पवित्र और सुन्दर साँवले रूपकी कसौटीपर अपने चित्त-रूपी सोनेको कसूँगा ॥२॥ अबतक मुझे परवश जानकर ये इन्द्रियाँ मुझपर हँसती रहीं, किन्तु अब मैं अपने वशमें होकर अपनी हँसी न कराऊँगा । तात्पर्य, अब मैं मन और इन्द्रियोंके वशमें नहीं हूँ, ये मुझे विषयोंकी ओर खींचकर न ले जा सकेंगी । तुलसीदास कहते हैं कि अब मैं प्रण करके अपने मन-रूपी भ्रमरको भगवच्चरणारविन्दमें टिकाऊँगा ॥३॥ विशेष १—'स्यामरूप......कसौटी'—भगवान्‌का शरीर श्याम है और कसौटी, जिसपर सोना कसा जाता है—उसका रंग भी श्याम है । इसलिए यह उपमा सर्वथा सार्थक है । २—'परबस......हँसैहौं'—सब इन्द्रियाँ मनके अधीन हैं और मन जीव- के अधीन है । किन्तु इन्द्रियोंकी विषयासक्तिसे जीव ही इन्द्रियोंके अधीन हो जाता है । जब जीव इन्द्रियोंपर अधिकार कर लेता है, वे स्वेच्छानुसार कुमार्ग- पर जाने नहीं पातीं, तब जीवको स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाती है । यों तो जीव