विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ विनय-पत्रिका मंदमति, कुटिल, खल-तिलक तुलसी सरिस, भो न तिहुँलोक तिहुँकाल कोऊ। नाम की कानि पहिचानि जन आपनो, ग्रसित कलि-ब्याल राख्यो सरन सोऊ ॥६॥ शब्दार्थ-रामादरथो = (राम + आदरथो) रामने आदर किया। गरुअ = गम्भीर। उपल = पाषाण (अहिल्या)। कीस = बन्दर। भेई = सींची हुई, भींगी हुई। सोमजाजी = सोमयज्ञ करनेवाला। बाजपेयी = अश्वमेध यज्ञ करनेवाला। खस = जाति-विशेष। सरिस = समान। भो = हुआ। कानि = लज्जा। भावार्थ-जिसका भगवान् श्रीरामजीने आदर किया, वही धन्य है! (जिसका रामजी आदर करते हैं) उसके समान गम्भीर, गुणराशि, सर्वज्ञ, पुण्य- वान्, वीर, अत्यन्त सुशील और साधु दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ (देखिये न) अहल्या, निषाद, वानर, भालू, राक्षस, शबरी, जटायु आदि शम, दम, दया और दान आदि गुणोंसे हीन थे, किन्तु नाम लेनेसे ही श्रीरामजीने इन सबको इतना परम पवित्र कर दिया कि उनका गुणगान करनेसे मनुष्य तर जाता है ॥२॥ व्याधने अपराध करनेमें कौन-सी साध बाकी रख छोड़ी थी (क्या उठा रखा था)? अथवा पिंगला नाम्नी वेश्याकी ही बुद्धि कौन-सी भक्तिसे सींची (भींगी) हुई थी? अधम अजामिलने कब सोमयज्ञ किया था, और गजेन्द्र कौन-सा अश्वमेध यज्ञ करनेवाला था? ॥३॥ पांडवों, गोपियों, विदुर और कुबरी आदिको, जिन्हें इस बातका रंचमात्र भी ज्ञान न था कि शुद्धता क्या वस्तु है- आपने पवित्र कर दिया। हे श्रीकृष्णजी! आपने प्रेम देखकर इन्हें भी अपना लिया। उसीका यह परिणाम है कि संसारमें उनका सुन्दर यश विष्णु और शिवकी तरह छा रहा है ॥४॥ कोल, खस, भील, यवन आदि खलोंमें ऐसा कौन है जिसने राम-नाम उच्चारण करके नीच होनेपर भी ऊँचा पद नहीं पाया? दीनोंका दुःख दूर करनेवाले, तथा करुणाके स्थान लक्ष्मीपति श्रीरामजीका पतितोंको पवित्र करना ही बाना है-ऐसा वेदोंने कहा है ॥५॥ तुलसीदासके समान मन्द-बुद्धि, कुटिल और खल-शिरोमणि तीनों लोकमें और तीनों कालमें कोई नहीं हुआ; फिर भी अपने नामका लिहाज करके तथा अपना दास जानकर कलिकाल-रूपी सर्पसे ग्रसित इस तुलसीदासको भी श्रीरामजीने अपनी शरणमें रख लिया ॥६॥