भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 210

विनय-पत्रिका १९१ विशेष १—'उपल'—अहिल्या; ४३ पदके 'विशेष'में देखिये। २—'केवट'—वन-यात्राके समय गंगा-तटपर पहुँचकर भगवान्‌ने केवटसे नाव माँगी थी। उसने प्रेम-विह्वल होकर कहा था:— इहि घाटते थोरिक दूरि अहै कटि लौं जलु थाह देखाइहौं जू। परसे पग धूरि तरै तरनी घरनी घर क्यों समुझाइहौं जू ॥ तुलसी अवलम्ब न और कछू लरिका केहि भाँति जियाइहौं जू। बरु मारिय मोहि बिना पग धोये हौं नाथ न नाव चढ़ाइहौं जू ॥ ३—'सबरी'—शबरी नामकी भीलनीको मतंग ऋषिकी सेवा करते-करते ईश्वर-भक्ति हो गयी थी। जब श्रीरामजी उसके स्थानपर पहुँचे, तब उसने चख-चखकर जूठे बेर भगवान्‌को खिलाये। उसे भगवान्‌ने नवधा भक्तिका उपदेश देकर मुक्त कर दिया था। नवधा भक्तिका लक्षण यह है:— आचारो विनयो विद्या प्रतिष्ठा तीर्थदर्शनम् । निष्ठा वृत्तिस्तपोदानं नवधा कुललक्षणम् ॥ ४—'गीध'—जटायु; ४३ पदके 'विशेष'में देखिये। ५—'पिंगला'—९४ पदके 'विशेष'में देखिये। ६—'भेई' शब्दका अर्थ श्रीवियोगी हरिने 'लगाई' लिखा है; किन्तु वास्तवमें इस शब्दका अर्थ है 'सींचा' भिगोया या तर किया । ७—गजराज—८३ पदके विशेषमें देखिये । ८—'बिदुर'—दासीपुत्र थे। वह श्रीकृष्ण भगवान्‌के अनन्य भक्त थे। इसीसे हस्तिनापुरमें जानेपर भगवान् कौरवोंके घर न जाकर विदुरके ही अतिथि हुए थे। जिस समय भगवान् वहाँ पहुँचे, उस समय विदुर घरमें नहीं थे। उनकी स्त्रीने ही श्रीकृष्णका सत्कार किया। वह केले लेकर प्रभुजीको खिलाने बैठी; पर प्रेममें विभोर होनेके कारण केलोंको छीलकर नीचे गिराने लगी और छिलके भगवान्‌के हाथोंमें देने लगी। प्रेमके भूखे भगवान् प्रसन्न होकर उन छिलकोंको ही खाने लगे।—विदुरके साथ भगवान्‌का सख्य भाव था। ९—'कुबरी'—कंसकी दासी थी। कंसको मारकर लौटते समय भगवान् इसके अतिथि बने थे। यह भगवान्‌की परम भक्त थी।