विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० विनय-पत्रिका राग विहाग बिलावल [ १०७ ] है नीको मेरो देवता कोसलपति राम । सुभग सरोरुह लोचन, सुठि सुन्दर स्याम ॥१॥ सिय-समेत सोहत सदा छवि अमित अनंग । भुज विसाल सर धनु धरे, कटि चारु निषंग ॥२॥ वलि-पूजा चाहत नहीं, चाहत एक प्रीति । सुमिरत ही मानै भलो, पावन सब रीति ॥३॥ देहि सकल सुख, दुख दहै, आरत-जन-बन्धु । गुन गहि, अघ-औगुन हरै, अस करुनासिन्धु ॥४॥ देस-काल-पूरन सदा वद वेद पुरान । सबको प्रभु, सबमें बसै, सबकी गति जान ॥५॥ को करि कोटिक कामना, पूजै बहु देव । तुलसिदास तेहि सेइये, संकर जेहि सेव ॥६॥ शब्दार्थ—नीको = अच्छे । निषंग = तरकस । भलो = अच्छा मानते हैं, प्रसन्न होते हैं । औगुन = दोष । बद = कहते हैं । भावार्थ—कोशलाधीश श्रीरामजी मेरे अच्छे देवता हैं। उनके सुन्दर नेत्र कमलके समान हैं और मनोहर श्याम शरीर बड़ा ही लावण्यमय है ॥१॥ वह अनेक कामदेवोंके समान शोभावाले हैं और सदैव महारानीजीके साथ शोभित रहते हैं। अपनी विशाल भुजाओंमें धनुष बाण लिये रहते हैं और कमरमें सुन्दर तरकस बाँधे हुए हैं ॥२॥ वह बलि और पूजा नहीं चाहते; चाहते हैं, केवल प्रेम। स्मरण करते ही वह प्रसन्न हो जाते तथा सबको पवित्र भी कर देते हैं ॥३॥ वह दुःखोंका नाश करके हर तरहका सुख देनेवाले हैं और दीन-जनोंके बन्धु हैं। वह ऐसे करुणा-सागर हैं कि गुणोंको ग्रहण करते और पाप तथा दुर्गुणोंको हर लेते हैं ॥४॥ वेदों और पुराणोंका कथन है कि देश और काल सदैव उन्हींसे परिपूर्ण रहते हैं, वह सबके स्वामी हैं, सबमें निवास करते हैं और सबकी गति जाननेवाले हैं ॥५॥ करोड़ों तरहकी कामनाओंसे प्रेरित होकर बहुत-से देवताओं-