भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 212

विनय-पत्रिका २०१ को कौन पूजने जाय। तुलसीदास कहते हैं कि उन्हीं श्रीरामजीकी सेवा करनी चाहिये जिनकी पूजा शिवजी किया करते हैं ॥६॥ विशेष १—'नीको'—श्रीवियोगी हरिजीने 'नीको' शब्दका अर्थ 'सर्वश्रेष्ठ' किया है। (१०८) बीर महा अवराधिये, साधे सिधि होय। सकल काम पूरन करै, जानै सब कोय ॥१॥ बेगि, विलंब न कीजिये लीजै उपदेस। बीज मंत्र जपिये सोई, जो जपत महेस ॥२॥ प्रेम-वारि-तरपन भलो, घृत सहज सनेहु। संसय-समिध, अगिनि छमा, ममता-बलि देहु॥३॥ अघ-उचाटि, मन बस करै, मारै मद-मार। आकरषै सुख-संपदा-संतोष-विचार ॥४॥ जिन्ह यहि भाँति भजन कियो, मिले रघुपति ताहि। तुलसिदास प्रभु पथ चढ़्यो, जौ लेहु निवाहि ॥५॥ शब्दार्थ—बीजमंत्र = मूलमंत्र। समिध = हवनकी लकड़ी। अघ = पाप। उचाटि = छ महाप्रयोगोंमें उच्चाटन एक प्रयोग है। मार = कामदेव। भावार्थ—महावीर श्रीरामजीकी आराधना कीजिये, क्योंकि उन्हें साध लेनेसे सब काम सिद्ध हो जाता है। यह बात सब लोग जानते हैं कि वह सब काम पूरा कर देते हैं ॥१॥ बस, अब देर न कीजिये, शीघ्र उपदेश लीजिये, और वही मूलमंत्र जपिये, जिसे शिवजी जपते हैं ॥२॥ (मन्त्रजपकी विधि कहते हैं) प्रेमरूपी जलसे तर्पण करना उत्तम है। यहाँ स्वाभाविक स्नेहरूपी घी है, संशय (इस कार्यसे सिद्धि होगी या नहीं, इस प्रकारका भाव) ही समिध है और क्षमा ही अग्नि है। (वीरकी आराधनामें बलि चाहिये, अतः कहते हैं कि) उसमें ममताकी बलि दो ॥३॥ (इस प्रकार सब कार्य करके) पापोंका उच्चाटन करके मनको वशमें करना चाहिये, अहंकार और कामदेवका मारण तथा सन्तोष और विचाररूपी सुख-सम्पत्तिका आकर्षण करना चाहिये ॥४॥ जिन लोगोंने इस प्रकार