भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 213, कुल 475 में से

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पृष्ठ 213

भजन किया, उन्हें श्रीरघुनाथजी मिले हैं। अब हे प्रभो ! तुलसीदास आपके पथपर चढ़ा है, यदि आप निवाह लें (तो वह आपतक पहुँच जायगा) ॥५॥ विशेष १—'लीजै उपदेस'—उपदेस देना गुरुका कार्य है। वास्तवमें बिना गुरुके भवसागरसे पार होना असम्भव है। गोस्वामीजीने कहा भी है :— बिनुगुरु भव-निधि तरै न कोई। जौ बिरंचि संकर सम होई ॥ किन्तु गुरु वही है, जो अज्ञानान्धकारको दूर करे। देखिये:— गुकारस्त्वन्धकारस्यादुकारस्तं निरोधकः । अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥ ( १०९ ) कस न करहु करुना हरे ! दुख हरन सुरारि । त्रिविधताप-संदेह-सोक-संसय-भय-हारि ॥१॥ इक कलिकाल-जनित मल, मतिमंद, मलिन-मन । तेहि पर प्रभु नहिं कर सँभार, केहि भाँति जियै जन ॥२॥ सब प्रकार समरथ प्रभो, मैं सब विधि दीन । यह जिय जानि द्रवौ नहीं, मैं करम विहीन ॥३॥ भ्रमत अनेक जोनि रघुपति, पति आन न मोरे । दुख-सुख सहौं, रहौं सदा सरनागत तोरे ॥४॥ तो सम देव न कोउ कृपालु, समुझौं मन माहीं । तुलसिदास हरि तोषिये, सो साधन नाहीं ॥५॥ शब्दार्थ—सँभार = रक्षा । आन = दूसरा । तोषिये = सन्तोष दीजिये । भावार्थ—हे हरे ! हे सुरारे !! आप तो दुःखोंके हरनेवाले हैं, फिर मुझपर कृपा क्यों नहीं करते ? आप तीनों तापोंका तथा सन्देह, शोक, संशय और भयका हरण करनेवाले हैं ॥१॥ एक तो कलिकाल-जनित पापोंसे यों ही बुद्धि मन्द हो गयी है तथा मन मलिन हो गया है, तिसपर हे प्रभो ! आप मेरा सम्भार भी नहीं करते, (अब आप ही बतावें कि) यह दास किस प्रकार जिये ॥२॥ हे प्रभो ! आप सब तरहसे सामर्थ्यवान् हैं और मैं सब तरहसे दीन हूँ। क्या आप

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