भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 214

विनय-पत्रिका २०३ अपने दिलमें यह जानकर मुझपर नहीं पिघल रहे हैं कि मैं कर्म-हीन (भाग्य-हीन) हूँ ? ॥३॥ हे रघुनाथजी ! मैं अनेक योनियोंमें भ्रम रहा हूँ, मेरे लिए दूसरा कोई स्वामी नहीं है। इसीसे मैं दुःख-सुख सहता हुआ सदा आपकी शरणमें आकर रहता हूँ ॥४॥ आपके समान कृपालु दूसरा कोई भी देवता नहीं है, यह मैं अपने मनमें खूब समझ रहा हूँ। किन्तु हे नाथ ! आप तुलसीदासको सन्तोष दीजिये, क्योंकि (मेरे पास) वह साधन नहीं है जिससे आप प्रसन्न होते हैं। अर्थात् तुलसी- दास भाग्य और उपाय दोनोंसे रहित है, आप ही उसका कल्याण करें ॥५॥ ( ११० ) कहु केहि कहिय कृपानिधे ! भव-जनित विपति अति । इंद्रिय सकल विकल सदा, निज निज सुभाउ रति ॥१॥ जे सुख-संपति, सरग नरक संतत सँग लागी । हरि ! परिहरि सोइ जतन करत मन मोर अभागी ॥२॥ मैं अति दीन, दयालु देव सुनि मन अनुरागे । जो न द्रवहु रघुवीर धीर, दुख काहे न लागे ॥३॥ जद्यपि मैं अपराध-सदन, दुख-समन मुरारे । तुलसिदास कहँ आस इहैं बहु पतित उधारे ॥४॥ शब्दार्थ—विकल = व्याकुल। मोर = मेरा। भावार्थ—हे कृपानिधे ! कहिये, संसार-जनित भारी विपत्तियोंको मैं किससे कहूँ ? सब इन्द्रियाँ अपने-अपने स्वभावकी प्रीतिमें सदा विकल रहती हैं ॥१॥ हे हरे ! मेरा अभागा मन भी आपको छोड़कर वही यत्न कर रहा है जिससे सुख-सम्पत्ति, स्वर्ग-नरकका बखेड़ा सदैव साथ लगा रहे ॥२॥ मैं अत्यन्त दीन हूँ। देव (श्रीरामजी) दयालु हैं, यह सुनकर मनमें प्रसन्नता हुई। हे धैर्यवान् श्रीरघुनाथजी ! यदि आप द्रवीभूत न होंगे तो भला मुझे दुःख कैसे न होगा ? ॥३॥ यद्यपि मैं अपराधोंका घर हूँ, पर हे मुरारे ! आप तो दुःखोंका शमन करनेवाले हैं न ! तुलसीदासको यही भरोसा है कि आपने बहुत-से पतितों- को तार दिया है (इसलिए तुलसीदासको भी तारेंगे) ॥४॥