भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 215

२०४ विनय-पत्रिका १११ ) केसव ! कहि न जाइ का कहिये । देखत तब रचना विचित्र हरि ! समुझि मनहिं मन रहिये ॥१॥ सून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे । धोये मिटै न मरै भीति दुख, पाइय इहि तनु हेरे ॥२॥ रविकर-नीर बसै अति दारुन मकर रूप तेहि माहीं । बदन-हीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं ॥३॥ कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै । तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै ॥४॥ शब्दार्थ—चितेरे = चित्रकार । हेरे = ढूँढ़नेसे । रविकर-नीर = ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यकी किरणोंसे मरुभूमि पर जो जलका भ्रम होता है, उसीको 'रविकर-नीर' कहा गया है। इसे मृगतृष्णा या मृगज ल भी कहते हैं । बदन = मुख । आपन = अपनेको, आत्माको । : भावार्थ—हे केशव ! कहा नहीं जाता, क्या कहूँ ? हे हरे ! आपकी इस विचित्र रचनाको देखकर मन ही मन समझकर रह जाता हूँ (कुछ कहते नहीं बनता) ॥१॥ इस संसाररूपी चित्रको अशरीरी (अव्यक्त, निराकार ब्रह्मरूपी) चित्रकारने शून्य (माया अथवा आकाशरूपी) दीवारपर बिना रंगके (संकल्प- से ही) बनाया है। (इस मायाचित्रका रंग) धोनेसे नहीं मिटता और इसे मरनेका भय और दुःख होता है। (तात्पर्य, जड़ चित्रका रंग धोनेसे मिट जाता है; पर यह पांचभौतिक चित्र धोनेसे नहीं मिटता; जड़ चित्रको मरनेका भय और दुःख नहीं होता, पर इस पांचभौतिक शरीर-रूपी चित्रको मरणका दुःख और भय बना रहता है)। यह सब विचित्रता कहाँ दिखलाई पड़ती है, इसके लिए ग्रंथकारका कथन है कि इसी शरीरमें ढूँढ़नेसे (यह सब विचित्रता) मिलती है ॥२॥ (अब दूसरी विचित्रता कहते हैं) मरीचिकामें अत्यन्त भयानक मगररूपी तृष्णा रहती है, जोकि मुख-हीन है (यानी उस मगरके मुँह नहीं है) । किन्तु जो भी वहाँ जल पीने जाता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चैतन्य, उसे वह ग्रस लेती है। भाव यह है कि, यह संसार मृगजलके समान है और इसमें मगररूप निराकार काल निवास करता है। उसके मुख नहीं है, पर वह