विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २०५ सबको (जल पीनेके लिए जानेवाले लोगोंको) खा जाता है। या यों कहिये कि मृगजल-तुल्य भ्रममय संसारमें मगररूपी रूप-रसादि पाँचों विषय बसते हैं, जो लोग इनमें सुख मानकर फँस जाते हैं, वे खाली हाथ कालके मुखमें चले जाते हैं ॥३॥ कोई तो कहता है कि (यह संसार) सत्य है, कोई कहता है कि झूठा (मिथ्या) है, और कोई इन दोनोंको ही प्रबल मानता है; यानी यह सत्य भी है और मिथ्या भी (अर्थात् पूर्वमीमांसावाले कर्मवादी सत्य मानते हैं और उत्तरमीमांसावाले अद्वैतवेदान्ती मिथ्या मानते हैं, और सांख्यशास्त्रके आचार्य दोनों-(सत्य और मिथ्या) को ही जगत्का कारणरूप सत्य मानते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि जो मनुष्य इन तीनों भ्रमोंको त्याग देता है वही अपनेको पहचानता है (उसे ही आत्मज्ञान होता है) ॥४॥ विशेष १-गोस्वामीजीने इस पदमें बहुत ही गम्भीर दार्शनिक भाव व्यक्त किया है। मननशील पाठक ही इसके असली अर्थकी गहराईतक पहुँच सकते हैं। २-'रविकर-नीर...माहीं'-का भाव यह है कि जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यकी किरणोंको जल समझकर मृग उन किरणोंके पीछे दौड़ता है और जल न पाकर प्यासा ही मर जाता है, उसी प्रकार इस भ्रमात्मक संसारमें सुख समझकर लिप्त रहनेवालोंको बिना सुखका कालरूपी अथवा रूप-रसादि विषयरूपी मगर निगल जाता है। एक अर्थ इसका यह भी हो सकता है कि इस मिथ्या संसार- सरोवरमें शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध ही रविकर-नीर है और उसमें मगररूप काल रहता है। जो लोग उस विषयरसको पीनेके लिए जाते हैं, उन्हें मगर निगल जाता है। मृगजल और विषयरसका जोड़ भी ठीक जँचता है। ५९ वें पदमें गोस्वामीजीने 'रूपादि सब सर्प' लिखकर पंच विषयोंको ही कालरूप सर्प बनाया है। ( ११२ ) केशव ! कारन कौन गुसाईं । जेहि अपराध असाधु जानि मोहिं तजेउ अग्य की नाईं ॥१॥ परम पुनीत सन्त कोमल-चित, तिनहिं तुमहिं बनि आई । तौ कत विप्र, ब्याध, गनिकहिं तारेहु, कछु रही सगाई ? ॥२॥