भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 217

२०६ विनय-पत्रिका काल, करम, गति अगति जीव की, सब हरि ! हाथ तुम्हारे । सोइ कछु करहु, हरहु ममता प्रभु ! फिरउँ न तुम्हहिं बिसारे ॥३॥ जौ तुम तजहु, भजौं न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे । मन-बच-करम नरक-सुरपुर जहाँ तहँ रघुवीर निहोरे ॥४॥ जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सौं करौं ढिठाई । तुलसिदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई ॥५॥ शब्दार्थ—असाधु = दुष्ट । अग्य = अज्ञ, मूर्ख । बनि आई = पटती है । विप्र = अजा- मिल । निहोरे = विनय । सीदत = शिथिल होता जाता है । भावार्थ—हे केशव ! हे स्वामी ! कौन-सा कारण है जिस अपराधसे आपने मुझे दुष्ट जानकर अज्ञकी तरह छोड़ दिया ? ॥१॥ (यदि यह कहा जाय कि) जो परम पवित्र और कोमल चित्तवाले सन्त हैं, उन्हींसे आपकी पटती है, तो फिर आपने अजामिल, व्याध और गणिकाको क्यों तार दिया ? क्या उनसे आपका कुछ रिश्ता था ? ॥२॥ हे हरे ! जीवका काल (नाशकर्त्ता), कर्म (जो विश्व-ब्रह्माण्डको बाँधे हुए हैं), गति (स्वर्गादिकी प्राप्ति) और अगति (नरककी प्राप्ति) सब आपके ही हाथ है । अतः हे प्रभो ! मेरी ममता दूर करके कुछ ऐसा उपाय करिये, जिससे मैं आपको भूलकर भटकता न फिरूँ ॥३॥ हे प्रभो ! यदि आप मुझे छोड़ देंगे, तो भी मैं दूसरेको न भजूँगा, यही मेरे प्रणका प्रमाण है । हे रघुनाथजी ! मन, वचन और कर्मसे नरक या देवलोकमें जहाँ कहीं आप भेजेंगे, वहाँ आपकाही निहोरा करता रहूँगा ॥४॥ हे नाथ ! यद्यपि यह जो आपसे ऐसी ढिठाई कर रहा हूँ, वह उचित कार्य नहीं हो रहा है; किन्तु तुलसी- दास रातदिन (कलिकालसे) शिथिल होता जा रहा है, तिसपर वह आपकी निष्ठुरता भी देख रहा है; अर्थात् एक तो वह यों ही कष्ट भोग रहा है दूसरे आपकी निष्ठुरता उसे और भी अधिक सता रही है ॥५॥ विशेष १—इस पदमें गोस्वामीजीने पहले तो 'कछु रही सगाई' कहकर प्रभुजीको खूब खरी-खोटी सुनायी है, पीछे उसे अनुचित समझकर दीनता प्रकट की है । २—'व्याध गनिकहिं'—९४ पदके 'विशेष'में देखिये ।