विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २०७ ( ११३ ) माधव ! अब न द्रवहु केहि लेखे । प्रनतपाल पन तोर, मोर पन जियउँ कमल-पद देखे ॥१॥ जब लगि मैं न दीन, दयालु तैं, मैं न दास, तैं स्वामी । तब लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहिं, जद्यपि अंतरजामी ॥२॥ तैं उदार, मैं कृपन, पतित मैं, तैं पुनीत श्रुति गावै । बहुत नात रघुनाथ ! तोहिं मोहिं, अब न तजे बनि आवै ॥३॥ जनक-जननि, गुरु-बंधु, सुहृद-पति, सब प्रकार हितकारी । द्वैतरूप तम-कूप परौं नहिं, अस कछु जतन विचारी ॥४॥ सुनु अदभ्र करुना वारिजलोचन मोचन भय भारी । तुलसिदास प्रभु ! तब प्रकास बिनु, संसय टरै न टारी ॥५॥ शब्दार्थ—जनक = पिता । जननि = माता । सुहृद = मित्र । द्वैत = यहाँ मैं-मेराको द्वैत कहा है ।; अदभ्र = अत्यधिक, असीम । भावार्थ—हे माधव ! अब आप किस कारणसे कृपा नहीं कर रहे हैं ? आपकी तो शरणागतोंका पालन करनेकी प्रतिज्ञा है, और आपके चरणारविन्दों- को देख-देखकर जीनेकी प्रतिज्ञा मेरी है ॥१॥ जबतक मैं दीन नहीं बना था और आप दयालु नहीं हुए थे, मैं सेवक नहीं हुआ था और आप स्वामी नहीं हुए थे, तबतक मैंने जो कष्ट सहन किया था, उसे आपसे नहीं कहा था—यद्यपि आप अन्तर्यामी हैं, (घटघटके भीतरका हाल जाननेवाले हैं) ॥२॥ आप उदार हैं, मैं कृपण हूँ; मैं पापी हूँ और आप पवित्र हैं, ऐसा वेदोंने कहा है । हे रघु- नाथजी ! आपमें और मुझमें बहुत-से रिश्ते हैं, अब मुझे छोड़नेसे काम नहीं चल सकता ॥३॥ आप मेरे पिता, माता, गुरु, भाई, मित्र, स्वामी और सब प्रकारसे हितकारी हैं । इसलिए कुछ ऐसा उपाय सोचिये, जिससे मैं द्वैतरूपी अन्धकूपमें न पहूँ । हे कमलनेत्र ! आपकी असीम करुणा संसारके भारी भयको दूर करने- वाली है । हे प्रभो ! बिना आपके प्रकाशके तुलसीदासका संशय (अज्ञानान्धकार) टाले नहीं टल सकता ।