विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ विनय-पत्रिका ( ११४ ) माधव ! मो समान जग माहीं। सब विधि हीन, मलीन, दीन अति, लीन विषय कोउ नाहीं ॥१॥ तुम सम हेतु-रहित कृपालु आरत-हित ईस न त्यागी । मैं दुख-सोक-विकल कृपालु ! केहि कारन दया न लागी ॥२॥ नाहिं न कछु औगुन तुम्हार, अपराध मोर मैं माना। ग्यान-भवन तनु दियेहु नाथ, सोउ पाय न मैं प्रभु जाना ॥३॥ बेनु करील, श्रीखंड बसंतहि दूषन मृषा लगावै । सार-रहित हत-भाग्य सुरभि, पल्लव सो कहु किमि पावै ॥४॥ सब प्रकार मैं कठिन, मृदुल हरि, दृढ़ विचार जिय मोरे । तुलसिदास प्रभु मोह-स्रंखला, छुटिहि तुम्हारे छोरे ॥५॥ शब्दार्थ- हेतुरहित = निष्काम । बेनु = बाँस । श्रीखंड = चन्दन । सुरभि = सुगन्ध । पल्लव = पत्तियाँ । मृदुल = कोमल । भावार्थ- हे माधव ! इस संसारमें मुझसा, सब प्रकारसे हीन, मलिन, अत्यन्त दीन और विषयासक्त दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ और आपके समान निष्काम कृपा करनेवाला, दुखियोंका हितू और परम त्यागी स्वामी दूसरा कोई नहीं है। मैं दुःख और शोकसे इतना विकल हूँ, फिर भी हे परम कृपालु ! किस कारणसे आपको मुझपर दया नहीं आयी ? ॥२॥ किन्तु इसमें आपका कुछ दोष नहीं है, यह सब मेरा ही अपराध है- इसे मैं मानता हूँ। हे नाथ ! (वह अपराध यही है कि) आपने तो मुझे ज्ञानका आगार (मनुष्य) शरीर दिया, पर उसे भी पाकर मैंने आपको नहीं पहचाना ॥३॥ सार-हीन बाँस चन्दनको और हतभाग करील वसन्त ऋतुको व्यर्थ ही दोष देते हैं। भला कहो तो सही, चन्दन सारहीन बाँसको कैसे सुगंध प्रदान कर सकता है और करीलको (जिसमें पत्ते होते ही नहीं), वसन्त ऋतु द्वारा पत्ते किस प्रकार प्राप्त हो सकते हैं ? ॥४॥ हे प्रभो, मेरे हृदयका यह दृढ़ विचार है कि मैं हर तरहसे कठोर हूँ, और आप कोमल हैं। हे प्रभो ! तुलसीदासकी मोह-श्रृंखला आपके ही छोड़नेसे छूटेगी ॥५॥