भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 220

विनय-पत्रिका ११५ ) माधव ! मोह-फाँस१ क्यों टूटै । बाहर कोटि उपाय करिय, अभ्यन्तर ग्रन्थि न छूटै ॥१॥ घृत पूरन कराह अंतरगत ससि प्रतिबिंब दिखावै । ईंधन अनल लगाइ कलप सत, औटत नास न पावै ॥२॥ तरु-कोटर महँ बस बिहंग तरु काटै मरै न जैसे । साधन करिय विचार-हीन मन शुद्ध होइ नहिं तैसे ॥३॥ अंतर मलिन विषय मन अति, तन पावन करिय पखारे । मरइ न उरग अनेक जतन बलमीकि विविध विधि मारे ॥४॥ तुलसिदास हरि-गुरु करुना बिनु विमल विवेक न होई । बिनु बिबेक संसार-घोर-निधि पार न पावै कोई ॥५॥ शब्दार्थ—ग्रंथि = गाँठ। प्रतिबिम्ब = छाया। कोटर = खोड़र, छेद। विचार = सत्- असत्‌का विचार, आत्मज्ञान । बलमीकि = बिल । भावार्थ—हे माधव ! मेरा यह मोहका फन्दा क्यों कर टूटेगा ? बाहरसे करोड़ों उपाय क्यों न किये जायँ, उनसे भीतरकी गाँठ नहीं छूट सकती ॥१॥ घीसे भरे हुए कड़ाहमें जो चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है, उसका सौ कल्पतक ईंधन और आग लगाकर औटानेसे नाश नहीं हो सकता (जबतक कड़ाहमें जरा भी घी रहेगा, तबतक वह प्रतिबिम्ब ज्योंका त्यों बना रहेगा) इसी प्रकार जबतक मोह रहेगा, तबतक आवागमनकी फाँसी भी बनी रहेगी ॥२॥ जैसे वृक्षके कोटरमें रहनेवाला पक्षी वृक्षके काटनेसे नहीं मर सकता, वैसे ही (बाहरी) साधनोंसे (सत्-असत्) विचार-शून्य मन शुद्ध नहीं हो सकता ॥३॥ जिस प्रकार साँपके बिलपर अनेक प्रकारसे मारने अथवा नाना उपाय करनेसे उसके भीतरका सर्प नहीं मरता, उसी प्रकार शरीरको बाहरसे धोकर पवित्र या स्वच्छ करनेसे विषयोंके कारण मलिन हुआ मन ज्योंका त्यों मलिन ही रह जाता है—पवित्र नहीं होता ॥४॥ हे तुलसीदास ! बिना भगवान् और गुरुकी १. पाठान्तर—'पास' । १४