विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
विनय-पत्रिका २०१ को कौन पूजने जाय। तुलसीदास कहते हैं कि उन्हीं श्रीरामजीकी सेवा करनी चाहिये जिनकी पूजा शिवजी किया करते हैं ॥६॥ विशेष १—'नीको'—श्रीवियोगी हरिजीने 'नीको' शब्दका अर्थ 'सर्वश्रेष्ठ' किया है। (१०८) बीर महा अवराधिये, साधे सिधि होय। सकल काम पूरन करै, जानै सब कोय ॥१॥ बेगि, विलंब न कीजिये लीजै उपदेस। बीज मंत्र जपिये सोई, जो जपत महेस ॥२॥ प्रेम-वारि-तरपन भलो, घृत सहज सनेहु। संसय-समिध, अगिनि छमा, ममता-बलि देहु॥३॥ अघ-उचाटि, मन बस करै, मारै मद-मार। आकरषै सुख-संपदा-संतोष-विचार ॥४॥ जिन्ह यहि भाँति भजन कियो, मिले रघुपति ताहि। तुलसिदास प्रभु पथ चढ़्यो, जौ लेहु निवाहि ॥५॥ शब्दार्थ—बीजमंत्र = मूलमंत्र। समिध = हवनकी लकड़ी। अघ = पाप। उचाटि = छ महाप्रयोगोंमें उच्चाटन एक प्रयोग है। मार = कामदेव। भावार्थ—महावीर श्रीरामजीकी आराधना कीजिये, क्योंकि उन्हें साध लेनेसे सब काम सिद्ध हो जाता है। यह बात सब लोग जानते हैं कि वह सब काम पूरा कर देते हैं ॥१॥ बस, अब देर न कीजिये, शीघ्र उपदेश लीजिये, और वही मूलमंत्र जपिये, जिसे शिवजी जपते हैं ॥२॥ (मन्त्रजपकी विधि कहते हैं) प्रेमरूपी जलसे तर्पण करना उत्तम है। यहाँ स्वाभाविक स्नेहरूपी घी है, संशय (इस कार्यसे सिद्धि होगी या नहीं, इस प्रकारका भाव) ही समिध है और क्षमा ही अग्नि है। (वीरकी आराधनामें बलि चाहिये, अतः कहते हैं कि) उसमें ममताकी बलि दो ॥३॥ (इस प्रकार सब कार्य करके) पापोंका उच्चाटन करके मनको वशमें करना चाहिये, अहंकार और कामदेवका मारण तथा सन्तोष और विचाररूपी सुख-सम्पत्तिका आकर्षण करना चाहिये ॥४॥ जिन लोगोंने इस प्रकार
भजन किया, उन्हें श्रीरघुनाथजी मिले हैं। अब हे प्रभो ! तुलसीदास आपके पथपर चढ़ा है, यदि आप निवाह लें (तो वह आपतक पहुँच जायगा) ॥५॥ विशेष १—'लीजै उपदेस'—उपदेस देना गुरुका कार्य है। वास्तवमें बिना गुरुके भवसागरसे पार होना असम्भव है। गोस्वामीजीने कहा भी है :— बिनुगुरु भव-निधि तरै न कोई। जौ बिरंचि संकर सम होई ॥ किन्तु गुरु वही है, जो अज्ञानान्धकारको दूर करे। देखिये:— गुकारस्त्वन्धकारस्यादुकारस्तं निरोधकः । अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥ ( १०९ ) कस न करहु करुना हरे ! दुख हरन सुरारि । त्रिविधताप-संदेह-सोक-संसय-भय-हारि ॥१॥ इक कलिकाल-जनित मल, मतिमंद, मलिन-मन । तेहि पर प्रभु नहिं कर सँभार, केहि भाँति जियै जन ॥२॥ सब प्रकार समरथ प्रभो, मैं सब विधि दीन । यह जिय जानि द्रवौ नहीं, मैं करम विहीन ॥३॥ भ्रमत अनेक जोनि रघुपति, पति आन न मोरे । दुख-सुख सहौं, रहौं सदा सरनागत तोरे ॥४॥ तो सम देव न कोउ कृपालु, समुझौं मन माहीं । तुलसिदास हरि तोषिये, सो साधन नाहीं ॥५॥ शब्दार्थ—सँभार = रक्षा । आन = दूसरा । तोषिये = सन्तोष दीजिये । भावार्थ—हे हरे ! हे सुरारे !! आप तो दुःखोंके हरनेवाले हैं, फिर मुझपर कृपा क्यों नहीं करते ? आप तीनों तापोंका तथा सन्देह, शोक, संशय और भयका हरण करनेवाले हैं ॥१॥ एक तो कलिकाल-जनित पापोंसे यों ही बुद्धि मन्द हो गयी है तथा मन मलिन हो गया है, तिसपर हे प्रभो ! आप मेरा सम्भार भी नहीं करते, (अब आप ही बतावें कि) यह दास किस प्रकार जिये ॥२॥ हे प्रभो ! आप सब तरहसे सामर्थ्यवान् हैं और मैं सब तरहसे दीन हूँ। क्या आप
विनय-पत्रिका २०३ अपने दिलमें यह जानकर मुझपर नहीं पिघल रहे हैं कि मैं कर्म-हीन (भाग्य-हीन) हूँ ? ॥३॥ हे रघुनाथजी ! मैं अनेक योनियोंमें भ्रम रहा हूँ, मेरे लिए दूसरा कोई स्वामी नहीं है। इसीसे मैं दुःख-सुख सहता हुआ सदा आपकी शरणमें आकर रहता हूँ ॥४॥ आपके समान कृपालु दूसरा कोई भी देवता नहीं है, यह मैं अपने मनमें खूब समझ रहा हूँ। किन्तु हे नाथ ! आप तुलसीदासको सन्तोष दीजिये, क्योंकि (मेरे पास) वह साधन नहीं है जिससे आप प्रसन्न होते हैं। अर्थात् तुलसी- दास भाग्य और उपाय दोनोंसे रहित है, आप ही उसका कल्याण करें ॥५॥ ( ११० ) कहु केहि कहिय कृपानिधे ! भव-जनित विपति अति । इंद्रिय सकल विकल सदा, निज निज सुभाउ रति ॥१॥ जे सुख-संपति, सरग नरक संतत सँग लागी । हरि ! परिहरि सोइ जतन करत मन मोर अभागी ॥२॥ मैं अति दीन, दयालु देव सुनि मन अनुरागे । जो न द्रवहु रघुवीर धीर, दुख काहे न लागे ॥३॥ जद्यपि मैं अपराध-सदन, दुख-समन मुरारे । तुलसिदास कहँ आस इहैं बहु पतित उधारे ॥४॥ शब्दार्थ—विकल = व्याकुल। मोर = मेरा। भावार्थ—हे कृपानिधे ! कहिये, संसार-जनित भारी विपत्तियोंको मैं किससे कहूँ ? सब इन्द्रियाँ अपने-अपने स्वभावकी प्रीतिमें सदा विकल रहती हैं ॥१॥ हे हरे ! मेरा अभागा मन भी आपको छोड़कर वही यत्न कर रहा है जिससे सुख-सम्पत्ति, स्वर्ग-नरकका बखेड़ा सदैव साथ लगा रहे ॥२॥ मैं अत्यन्त दीन हूँ। देव (श्रीरामजी) दयालु हैं, यह सुनकर मनमें प्रसन्नता हुई। हे धैर्यवान् श्रीरघुनाथजी ! यदि आप द्रवीभूत न होंगे तो भला मुझे दुःख कैसे न होगा ? ॥३॥ यद्यपि मैं अपराधोंका घर हूँ, पर हे मुरारे ! आप तो दुःखोंका शमन करनेवाले हैं न ! तुलसीदासको यही भरोसा है कि आपने बहुत-से पतितों- को तार दिया है (इसलिए तुलसीदासको भी तारेंगे) ॥४॥
२०४ विनय-पत्रिका १११ ) केसव ! कहि न जाइ का कहिये । देखत तब रचना विचित्र हरि ! समुझि मनहिं मन रहिये ॥१॥ सून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे । धोये मिटै न मरै भीति दुख, पाइय इहि तनु हेरे ॥२॥ रविकर-नीर बसै अति दारुन मकर रूप तेहि माहीं । बदन-हीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं ॥३॥ कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै । तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै ॥४॥ शब्दार्थ—चितेरे = चित्रकार । हेरे = ढूँढ़नेसे । रविकर-नीर = ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यकी किरणोंसे मरुभूमि पर जो जलका भ्रम होता है, उसीको 'रविकर-नीर' कहा गया है। इसे मृगतृष्णा या मृगज ल भी कहते हैं । बदन = मुख । आपन = अपनेको, आत्माको । : भावार्थ—हे केशव ! कहा नहीं जाता, क्या कहूँ ? हे हरे ! आपकी इस विचित्र रचनाको देखकर मन ही मन समझकर रह जाता हूँ (कुछ कहते नहीं बनता) ॥१॥ इस संसाररूपी चित्रको अशरीरी (अव्यक्त, निराकार ब्रह्मरूपी) चित्रकारने शून्य (माया अथवा आकाशरूपी) दीवारपर बिना रंगके (संकल्प- से ही) बनाया है। (इस मायाचित्रका रंग) धोनेसे नहीं मिटता और इसे मरनेका भय और दुःख होता है। (तात्पर्य, जड़ चित्रका रंग धोनेसे मिट जाता है; पर यह पांचभौतिक चित्र धोनेसे नहीं मिटता; जड़ चित्रको मरनेका भय और दुःख नहीं होता, पर इस पांचभौतिक शरीर-रूपी चित्रको मरणका दुःख और भय बना रहता है)। यह सब विचित्रता कहाँ दिखलाई पड़ती है, इसके लिए ग्रंथकारका कथन है कि इसी शरीरमें ढूँढ़नेसे (यह सब विचित्रता) मिलती है ॥२॥ (अब दूसरी विचित्रता कहते हैं) मरीचिकामें अत्यन्त भयानक मगररूपी तृष्णा रहती है, जोकि मुख-हीन है (यानी उस मगरके मुँह नहीं है) । किन्तु जो भी वहाँ जल पीने जाता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चैतन्य, उसे वह ग्रस लेती है। भाव यह है कि, यह संसार मृगजलके समान है और इसमें मगररूप निराकार काल निवास करता है। उसके मुख नहीं है, पर वह
विनय-पत्रिका २०५ सबको (जल पीनेके लिए जानेवाले लोगोंको) खा जाता है। या यों कहिये कि मृगजल-तुल्य भ्रममय संसारमें मगररूपी रूप-रसादि पाँचों विषय बसते हैं, जो लोग इनमें सुख मानकर फँस जाते हैं, वे खाली हाथ कालके मुखमें चले जाते हैं ॥३॥ कोई तो कहता है कि (यह संसार) सत्य है, कोई कहता है कि झूठा (मिथ्या) है, और कोई इन दोनोंको ही प्रबल मानता है; यानी यह सत्य भी है और मिथ्या भी (अर्थात् पूर्वमीमांसावाले कर्मवादी सत्य मानते हैं और उत्तरमीमांसावाले अद्वैतवेदान्ती मिथ्या मानते हैं, और सांख्यशास्त्रके आचार्य दोनों-(सत्य और मिथ्या) को ही जगत्का कारणरूप सत्य मानते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि जो मनुष्य इन तीनों भ्रमोंको त्याग देता है वही अपनेको पहचानता है (उसे ही आत्मज्ञान होता है) ॥४॥ विशेष १-गोस्वामीजीने इस पदमें बहुत ही गम्भीर दार्शनिक भाव व्यक्त किया है। मननशील पाठक ही इसके असली अर्थकी गहराईतक पहुँच सकते हैं। २-'रविकर-नीर...माहीं'-का भाव यह है कि जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यकी किरणोंको जल समझकर मृग उन किरणोंके पीछे दौड़ता है और जल न पाकर प्यासा ही मर जाता है, उसी प्रकार इस भ्रमात्मक संसारमें सुख समझकर लिप्त रहनेवालोंको बिना सुखका कालरूपी अथवा रूप-रसादि विषयरूपी मगर निगल जाता है। एक अर्थ इसका यह भी हो सकता है कि इस मिथ्या संसार- सरोवरमें शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध ही रविकर-नीर है और उसमें मगररूप काल रहता है। जो लोग उस विषयरसको पीनेके लिए जाते हैं, उन्हें मगर निगल जाता है। मृगजल और विषयरसका जोड़ भी ठीक जँचता है। ५९ वें पदमें गोस्वामीजीने 'रूपादि सब सर्प' लिखकर पंच विषयोंको ही कालरूप सर्प बनाया है। ( ११२ ) केशव ! कारन कौन गुसाईं । जेहि अपराध असाधु जानि मोहिं तजेउ अग्य की नाईं ॥१॥ परम पुनीत सन्त कोमल-चित, तिनहिं तुमहिं बनि आई । तौ कत विप्र, ब्याध, गनिकहिं तारेहु, कछु रही सगाई ? ॥२॥
२०६ विनय-पत्रिका काल, करम, गति अगति जीव की, सब हरि ! हाथ तुम्हारे । सोइ कछु करहु, हरहु ममता प्रभु ! फिरउँ न तुम्हहिं बिसारे ॥३॥ जौ तुम तजहु, भजौं न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे । मन-बच-करम नरक-सुरपुर जहाँ तहँ रघुवीर निहोरे ॥४॥ जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सौं करौं ढिठाई । तुलसिदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई ॥५॥ शब्दार्थ—असाधु = दुष्ट । अग्य = अज्ञ, मूर्ख । बनि आई = पटती है । विप्र = अजा- मिल । निहोरे = विनय । सीदत = शिथिल होता जाता है । भावार्थ—हे केशव ! हे स्वामी ! कौन-सा कारण है जिस अपराधसे आपने मुझे दुष्ट जानकर अज्ञकी तरह छोड़ दिया ? ॥१॥ (यदि यह कहा जाय कि) जो परम पवित्र और कोमल चित्तवाले सन्त हैं, उन्हींसे आपकी पटती है, तो फिर आपने अजामिल, व्याध और गणिकाको क्यों तार दिया ? क्या उनसे आपका कुछ रिश्ता था ? ॥२॥ हे हरे ! जीवका काल (नाशकर्त्ता), कर्म (जो विश्व-ब्रह्माण्डको बाँधे हुए हैं), गति (स्वर्गादिकी प्राप्ति) और अगति (नरककी प्राप्ति) सब आपके ही हाथ है । अतः हे प्रभो ! मेरी ममता दूर करके कुछ ऐसा उपाय करिये, जिससे मैं आपको भूलकर भटकता न फिरूँ ॥३॥ हे प्रभो ! यदि आप मुझे छोड़ देंगे, तो भी मैं दूसरेको न भजूँगा, यही मेरे प्रणका प्रमाण है । हे रघुनाथजी ! मन, वचन और कर्मसे नरक या देवलोकमें जहाँ कहीं आप भेजेंगे, वहाँ आपकाही निहोरा करता रहूँगा ॥४॥ हे नाथ ! यद्यपि यह जो आपसे ऐसी ढिठाई कर रहा हूँ, वह उचित कार्य नहीं हो रहा है; किन्तु तुलसी- दास रातदिन (कलिकालसे) शिथिल होता जा रहा है, तिसपर वह आपकी निष्ठुरता भी देख रहा है; अर्थात् एक तो वह यों ही कष्ट भोग रहा है दूसरे आपकी निष्ठुरता उसे और भी अधिक सता रही है ॥५॥ विशेष १—इस पदमें गोस्वामीजीने पहले तो 'कछु रही सगाई' कहकर प्रभुजीको खूब खरी-खोटी सुनायी है, पीछे उसे अनुचित समझकर दीनता प्रकट की है । २—'व्याध गनिकहिं'—९४ पदके 'विशेष'में देखिये ।
विनय-पत्रिका २०७ ( ११३ ) माधव ! अब न द्रवहु केहि लेखे । प्रनतपाल पन तोर, मोर पन जियउँ कमल-पद देखे ॥१॥ जब लगि मैं न दीन, दयालु तैं, मैं न दास, तैं स्वामी । तब लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहिं, जद्यपि अंतरजामी ॥२॥ तैं उदार, मैं कृपन, पतित मैं, तैं पुनीत श्रुति गावै । बहुत नात रघुनाथ ! तोहिं मोहिं, अब न तजे बनि आवै ॥३॥ जनक-जननि, गुरु-बंधु, सुहृद-पति, सब प्रकार हितकारी । द्वैतरूप तम-कूप परौं नहिं, अस कछु जतन विचारी ॥४॥ सुनु अदभ्र करुना वारिजलोचन मोचन भय भारी । तुलसिदास प्रभु ! तब प्रकास बिनु, संसय टरै न टारी ॥५॥ शब्दार्थ—जनक = पिता । जननि = माता । सुहृद = मित्र । द्वैत = यहाँ मैं-मेराको द्वैत कहा है ।; अदभ्र = अत्यधिक, असीम । भावार्थ—हे माधव ! अब आप किस कारणसे कृपा नहीं कर रहे हैं ? आपकी तो शरणागतोंका पालन करनेकी प्रतिज्ञा है, और आपके चरणारविन्दों- को देख-देखकर जीनेकी प्रतिज्ञा मेरी है ॥१॥ जबतक मैं दीन नहीं बना था और आप दयालु नहीं हुए थे, मैं सेवक नहीं हुआ था और आप स्वामी नहीं हुए थे, तबतक मैंने जो कष्ट सहन किया था, उसे आपसे नहीं कहा था—यद्यपि आप अन्तर्यामी हैं, (घटघटके भीतरका हाल जाननेवाले हैं) ॥२॥ आप उदार हैं, मैं कृपण हूँ; मैं पापी हूँ और आप पवित्र हैं, ऐसा वेदोंने कहा है । हे रघु- नाथजी ! आपमें और मुझमें बहुत-से रिश्ते हैं, अब मुझे छोड़नेसे काम नहीं चल सकता ॥३॥ आप मेरे पिता, माता, गुरु, भाई, मित्र, स्वामी और सब प्रकारसे हितकारी हैं । इसलिए कुछ ऐसा उपाय सोचिये, जिससे मैं द्वैतरूपी अन्धकूपमें न पहूँ । हे कमलनेत्र ! आपकी असीम करुणा संसारके भारी भयको दूर करने- वाली है । हे प्रभो ! बिना आपके प्रकाशके तुलसीदासका संशय (अज्ञानान्धकार) टाले नहीं टल सकता ।
२०८ विनय-पत्रिका ( ११४ ) माधव ! मो समान जग माहीं। सब विधि हीन, मलीन, दीन अति, लीन विषय कोउ नाहीं ॥१॥ तुम सम हेतु-रहित कृपालु आरत-हित ईस न त्यागी । मैं दुख-सोक-विकल कृपालु ! केहि कारन दया न लागी ॥२॥ नाहिं न कछु औगुन तुम्हार, अपराध मोर मैं माना। ग्यान-भवन तनु दियेहु नाथ, सोउ पाय न मैं प्रभु जाना ॥३॥ बेनु करील, श्रीखंड बसंतहि दूषन मृषा लगावै । सार-रहित हत-भाग्य सुरभि, पल्लव सो कहु किमि पावै ॥४॥ सब प्रकार मैं कठिन, मृदुल हरि, दृढ़ विचार जिय मोरे । तुलसिदास प्रभु मोह-स्रंखला, छुटिहि तुम्हारे छोरे ॥५॥ शब्दार्थ- हेतुरहित = निष्काम । बेनु = बाँस । श्रीखंड = चन्दन । सुरभि = सुगन्ध । पल्लव = पत्तियाँ । मृदुल = कोमल । भावार्थ- हे माधव ! इस संसारमें मुझसा, सब प्रकारसे हीन, मलिन, अत्यन्त दीन और विषयासक्त दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ और आपके समान निष्काम कृपा करनेवाला, दुखियोंका हितू और परम त्यागी स्वामी दूसरा कोई नहीं है। मैं दुःख और शोकसे इतना विकल हूँ, फिर भी हे परम कृपालु ! किस कारणसे आपको मुझपर दया नहीं आयी ? ॥२॥ किन्तु इसमें आपका कुछ दोष नहीं है, यह सब मेरा ही अपराध है- इसे मैं मानता हूँ। हे नाथ ! (वह अपराध यही है कि) आपने तो मुझे ज्ञानका आगार (मनुष्य) शरीर दिया, पर उसे भी पाकर मैंने आपको नहीं पहचाना ॥३॥ सार-हीन बाँस चन्दनको और हतभाग करील वसन्त ऋतुको व्यर्थ ही दोष देते हैं। भला कहो तो सही, चन्दन सारहीन बाँसको कैसे सुगंध प्रदान कर सकता है और करीलको (जिसमें पत्ते होते ही नहीं), वसन्त ऋतु द्वारा पत्ते किस प्रकार प्राप्त हो सकते हैं ? ॥४॥ हे प्रभो, मेरे हृदयका यह दृढ़ विचार है कि मैं हर तरहसे कठोर हूँ, और आप कोमल हैं। हे प्रभो ! तुलसीदासकी मोह-श्रृंखला आपके ही छोड़नेसे छूटेगी ॥५॥
विनय-पत्रिका ११५ ) माधव ! मोह-फाँस१ क्यों टूटै । बाहर कोटि उपाय करिय, अभ्यन्तर ग्रन्थि न छूटै ॥१॥ घृत पूरन कराह अंतरगत ससि प्रतिबिंब दिखावै । ईंधन अनल लगाइ कलप सत, औटत नास न पावै ॥२॥ तरु-कोटर महँ बस बिहंग तरु काटै मरै न जैसे । साधन करिय विचार-हीन मन शुद्ध होइ नहिं तैसे ॥३॥ अंतर मलिन विषय मन अति, तन पावन करिय पखारे । मरइ न उरग अनेक जतन बलमीकि विविध विधि मारे ॥४॥ तुलसिदास हरि-गुरु करुना बिनु विमल विवेक न होई । बिनु बिबेक संसार-घोर-निधि पार न पावै कोई ॥५॥ शब्दार्थ—ग्रंथि = गाँठ। प्रतिबिम्ब = छाया। कोटर = खोड़र, छेद। विचार = सत्- असत्का विचार, आत्मज्ञान । बलमीकि = बिल । भावार्थ—हे माधव ! मेरा यह मोहका फन्दा क्यों कर टूटेगा ? बाहरसे करोड़ों उपाय क्यों न किये जायँ, उनसे भीतरकी गाँठ नहीं छूट सकती ॥१॥ घीसे भरे हुए कड़ाहमें जो चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है, उसका सौ कल्पतक ईंधन और आग लगाकर औटानेसे नाश नहीं हो सकता (जबतक कड़ाहमें जरा भी घी रहेगा, तबतक वह प्रतिबिम्ब ज्योंका त्यों बना रहेगा) इसी प्रकार जबतक मोह रहेगा, तबतक आवागमनकी फाँसी भी बनी रहेगी ॥२॥ जैसे वृक्षके कोटरमें रहनेवाला पक्षी वृक्षके काटनेसे नहीं मर सकता, वैसे ही (बाहरी) साधनोंसे (सत्-असत्) विचार-शून्य मन शुद्ध नहीं हो सकता ॥३॥ जिस प्रकार साँपके बिलपर अनेक प्रकारसे मारने अथवा नाना उपाय करनेसे उसके भीतरका सर्प नहीं मरता, उसी प्रकार शरीरको बाहरसे धोकर पवित्र या स्वच्छ करनेसे विषयोंके कारण मलिन हुआ मन ज्योंका त्यों मलिन ही रह जाता है—पवित्र नहीं होता ॥४॥ हे तुलसीदास ! बिना भगवान् और गुरुकी १. पाठान्तर—'पास' । १४
२१० विनय-पत्रिका करुणाके निर्मल विवेक (ज्ञान) नहीं होता और विवेक हुए बिना इस घोर संसार- सागरसे कोई भी पार नहीं जा सकता ॥५॥ विशेष १—'घृत पूरन······पावै'—कुछ टीकाकारोंने इसका अर्थ इस प्रकार लिखा है; "प्रतिबिम्बके औटानेसे आकाशके चन्द्रमाका नाश नहीं होता तथा वृक्षके काटनेसे उसके कोटरमें रहनेवाला पक्षी नहीं मर जाता, वैसे ही······" २—'साधन······तैसे'—वियोगी हरिजीने लिखा है, 'बिना आत्मज्ञानके मन शुद्ध होनेका नहीं।' अर्थात् आत्मज्ञान होनेके बाद मन शुद्ध होता है। किन्तु यह बात बिलकुल ही असंगत है। क्योंकि मनकी शुद्धि हुए बिना तो आत्मज्ञान होता ही नहीं। ( ११६ ) माधव ! असि¹ तुम्हारि यह माया । करि उपाय पचि मरिय, तरिय नहिं, जब लगि करहु न दाया ॥१॥ सुनिय, गुनिय, समुझिय, समुझाइय, दसा हृदय नहिं आवै । जेहि अनुभव बिनु मोह-जनित भव दारुन विपति सतावै ॥२॥ ब्रह्म-पियूष मधुर शीतल जो पै मन सो रस पावै । तौ कत मृगजल-रूप विषय कारन निसि-वासर धावै ॥३॥ जेहि के भवन विमल चिन्तामनि, सो कत काँच बटोरै । सपने परवस परै, जागि देखत केहि जाइ निहोरै ॥४॥ ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य, झूठ कछु नाहीं । तुलसिदास हरि कृपा मिटै भ्रम, यह भरोस मन माहीं ॥५॥ शब्दार्थ—पियूष = अमृत । चिन्तामनि = चिन्ताओंको दूर करनेवाला स्वर्गका एक रत्न । भावार्थ—हे माधव ! तुम्हारी यह माया ऐसी है कि यत्न करते-करते मर- पच जानेपर भी जबतक आप दया नहीं करते, तबतक (मायासे) उद्धार नहीं १. पाठान्तर—'अस'।
विनय-पत्रिका २११ होता ॥१॥ सुनता हूँ, विचार करता हूँ, समझता हूँ, दूसरोंको समझाता हूँ, फिर भी तुम्हारी उस मायाकी गति मनमें नहीं बैठती, जिसका अनुभव हुए बिना मोह- जनित संसारकी भयंकर विपत्तियाँ सताती रहती हैं ॥२॥ ब्रह्मामृत बड़ा ही मधुर और शीतल है, उसका स्वादु यदि कहीं यह मन पा जाय, तो फिर यह मृगजल- रूप विषयोंके लिए रातदिन क्यों दौड़े ॥३॥ जिसके घरमें स्वच्छ चिन्तामणि है, वह काँच क्यों बटोरने लगा ! भाव यह है कि जिसे भगवान्के रूप-माधुर्यका आनन्द प्राप्त हो जायगा, वह तुच्छ सांसारिक विषयोंकी ओर नहीं झुक सकता । जैसे कोई स्वप्नमें किसीके पराधीन हो जाय, किन्तु जागनेपर वह (छूटनेके लिए) किसीसे विनय करते नहीं देखा जाता ॥४॥ ज्ञान, भक्ति तथा और जो बहुत-से साधन हैं, वे सब सच्चे हैं, झूठा कुछ भी नहीं है, किन्तु तुलसीदासके मनमें यह विश्वास है कि केवल श्रीरामजीकी कृपासे ही भ्रमका नाश हो सकता है ॥५॥ विशेष 'यह माया'—भगवान्की माया कैसी है, इसे भगवान्ने स्वयं ही गीतामें कहा है— 'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥'—श्रीमद्भगवद्गीता श्लोकार्थ—मेरी यह गुणमयी (गुणात्मक) और दिव्य माया दुस्तर है । इस मायाको वे ही पार करते हैं, जो मेरी शरणमें आ जाते हैं । ( ११७ ) हे हरि ! कवन दोष तोहिं दीजै । जेहि उपाय सपनेहुँ दुरलभ गति, सोइ निसि-बासर कीजै ॥१॥ जानत अर्थ अनर्थ-रूप, तमकृप परब येहि लागे । तदपि न तजत स्वान अज खर ज्यों, फिरत विषय अनुरागे ॥२॥ भूत-द्रोह कृत मोह बस्य हित आपन मैं न विचारो । , मद-मत्सर-अभिमान ज्ञान-रिपु, इन महँ रहनि अपारो ॥३॥ वेद-पुरान सुनत समुझत रघुनाथ सकल जगव्यापी । बेधत नहिं श्रीखंड बेनु इव, सारहीन मन पापी ॥४॥
२१२ विनय-पत्रिका 'मैं अपराध-सिंधु करुनाकर ! जानत अंतरजामी । तुलसिदास भव-ब्याल-ग्रसित तब सरन उरग-रिपु-गामी ॥५॥ शब्दार्थ—अर्थ = इन्द्रियोंके विषय । स्वान = कुत्ता । अज = बकरा । खर = गधा । अपारो = बेहद । श्रीखंड = चन्दन । बेनु = बाँस । भावार्थ—हे हरे ! मैं तुम्हें क्या दोष दूँ ? जिस उपायसे स्वप्नमें भी उद्धार होना दुर्लभ है, वही मैं रातदिन किया करता हूँ ॥१॥ मैं जानता हूँ कि इन्द्रियों- के विषय अनर्थरूप हैं, इनके कारण मैं अन्धकूपमें गिर पहूँगा; फिर भी मैं उन्हें न छोड़कर कुत्ते, बकरे और गधेकी भाँति विषयानुरागमें भटक रहा हूँ ॥२॥ सब प्राणियोंसे द्रोह करके और मोहके वशीभूत होकर मैंने अपनी भलाईपर विचार नहीं किया और ज्ञानके शत्रु मद, ईर्ष्या, अभिमान आदिमें बेहद लीन रहने लगा ॥३॥ समस्त संसारमें श्रीरघुनाथजी ही व्याप्त हैं, यह वेदों और पुराणोंमें सुनते और समझते हुए भी, मेरे सारहीन पापी मनमें वह बात ठीक उसी प्रकार नहीं घुस रही है जैसे चन्दनकी सुगन्ध बाँसमें नहीं भिनती ॥४॥ हे करुणाकी खानि श्रीरामजी ! मैं अपराधोंका समुद्र हूँ, इसे आप जानते हैं,— क्योंकि आप अन्तर्यामी हैं। इसलिए हे गरुड़गामी ! संसार-सर्पसे ग्रसित यह तुलसीदास आपकी शरणमें है ॥५॥ ( ११८ ) हे हरि ! कवन जतन सुख मानहुँ । ज्यों गज दसन तथा मम करनी, सब प्रकार तुम जानहु ॥१॥ जो कछु कहिय करिय भवसागर तरिय बच्छपद जैसे । रहनि आन विधि, कहिय आन, हरिपद-सुख पाइय कैसे ॥२॥ देखत चारु मयूर बयन सुभ बोल सुधा इव सानी । सविष उरग-आहार, निठुर अस, यहु करनी वह बानी ॥३॥ अखिल-जीव-वत्सल, निरमत्सर, चरन कमल अनुरागी । ते तव प्रिय रघुवीर धीर मति, अतिसय निज-पर-त्यागी ॥४॥ जद्यपि मम औगुन अपार संसार जोग्य रघुराया । तुलसिदास निज गुन विचारि करुना-निधान करु दाया ॥५॥
शब्दार्थ-गज = हाथी । दसन = दाँत । बच्छ = बछड़ा । चारु = सुन्दर । मयूर = मोर । सविष = विषके सहित । निरमत्सर = ईर्ष्यारहित । भावार्थ-हे हरे ! मैं किस तरह (उपायसे) सुख मानूँ ? जैसे हाथीके दाँत (दिखानेके तो और होते हैं किन्तु खानेके और) होते हैं, वैसे ही मेरी करनी है । (दिखानेके लिए तो आपका दास बना हूँ, किन्तु मेरा अन्तःकरण विषयोंका दास है), इसे आप भली भाँति जानते भी हैं ॥१॥ जो कुछ कहे, उसे करे, (ऐसा करनेसे मनुष्य) भवसागरको इस प्रकार पार कर जाता है जैसे बछड़ेका पैर; अर्थात् अपने कथनानुसार काम करनेवाला मनुष्य गऊके खुरसे जमीनपर बने हुए गड्ढेमें भरे हुए जलकी तरह संसार-रूपी समुद्रको अनायास ही लाँघ सकता है, किन्तु जब कि रहन-सहन कुछ और तरहकी है और कथन कुछ और ही है, तो फिर हे हरे ! आपके चरणोंका आनन्द उसे कैसे मिल सकता है ? ॥२॥ देखनेमें मोर सुन्दर लगता है और ऐसी मंगलमय वाणी बोलता है मानों अमृतसे सनी हुई हो ! किन्तु उसका आहार विषधर सर्प है। वह ऐसा कठोर है । उसकी यह करनी है और वह वाणी ॥३॥ जो समस्त प्राणियोंपर प्रेम करते हैं, जो ईर्ष्या-रहित हैं, जो आपके चरणारविन्दोंके भक्त हैं, जो धीर-बुद्धि हैं, जो विशेष रूपसे अपने-परायेका भाव छोड़ चुके हैं, हे रघुनाथजी ! वे ही साधु आपको प्रिय हैं । हे रघुनाथजी ! यद्यपि मेरे अपार दुर्गुण संसारके ही योग्य हैं, फिर भी हे करुणानिधान ! आप अपने गुणोंपर विचार करके मुझ तुलसीदासपर दया कीजिये ॥५॥ ( ११९ ) हे हरि ! कवन जतन भ्रम भागै । देखत, सुनत, बिचारत यह मन, निज सुभाउ नहिं त्यागै ॥१॥ भगति ग्यान-बैराग्य सकल साधन यहि लागि उपाई । कोउ भल कहउ, देउ कछु, असि बासना न उर ते जाई ॥२॥ जेहि निसि सकल जीव सूतहिं तब कृपा-पात्र जन जागै । निज करनी विपरीत देखि मोहिं समुझि महाभय लागै ॥३॥ जद्यपि भग्न-मगोरथ विधिवस, सुख इच्छत दुख पावै । चित्रकार करहीन जथा स्वारथ बिनु चित्र बनावै ॥४॥
२१४ विनय-पत्रिका हृषीकेस सुनि नाउँ जाउँ बलि, अति भरोस जिय मोरे। तुलसिदास इंद्रिय-संभव दुख, हरे बनहि प्रभु तोरे ॥५॥ शब्दार्थ—सूतहिं = सोते हैं। विपरीत = उलटा। विधिवस = विधाताकी इच्छासे। हृषीकेस = (हृषीक + ईश) इन्द्रियोंके स्वामी। संभव = उत्पन्न। भावार्थ—हे हरे! (यह सांसारिक भ्रम) किस उपायसे दूर होता है? यह मन (संसारका मिथ्यात्व) देख रहा है, सुन रहा है, सोच रहा है, फिर भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ रहा है ॥१॥ भक्ति, ज्ञान, वैराग्य आदि सब साधन इसीके (मनको, स्थिर करनेके) लिए उपाय हैं। फिर भी 'कोई मुझे अच्छा कहे,' 'कोई कुछ दे', ऐसी वासना मेरे हृदयसे नहीं जाती ॥२॥ जिस (संसार) रात्रिमें सब प्राणी सोते हैं, उसमें आपके कृपापात्र भक्त जागते हैं। किन्तु अपनी करनीको विपरीत देखकर उसे समझनेपर मुझे बड़ा डर लग रहा है ॥३॥ यद्यपि विधाताकी इच्छासे लोगोंका मनोरथ भंग हो जाता है, और वे सुखकी इच्छा करनेमें वैसे ही दुःख पाते हैं जैसे बिना हाथका चित्रकार बिना स्वार्थके ही (मनोकल्पित) चित्र बनाता है (अर्थात् चित्रोंसे अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है, पर हाथ न रहनेके कारण भग्न-मनोरथ होकर दुःख पाता है) ॥४॥ आपका 'हृषीकेश' नाम सुनकर मैं आपकी बलैया लेता हूँ। मेरे जीमें आपका बहुत बड़ा भरोसा है। हे प्रभो ! तुलसीदासका इन्द्रिय-जन्य दुःख आपको अवश्यमेव दूर करना पड़ेगा (क्योंकि आप हृषीकेश अर्थात् इन्द्रियोंके स्वामी हैं) ॥५॥ विशेष १—'जेहिनिसि··जागै'—यह बात गीतामें भगवान्ने भी कही है— या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ —भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९ । ( १२० ) हे हरि ! कस न हरहु भ्रम भारी। जद्यपि मृषा सत्य भासै जब लगि नहिं कृपा तुम्हारी ॥१॥
विनय-पत्रिका २१५ अर्थ अविद्यमान जानिय संसृति नहिं जाइ गुसाँईं । बिनु बाँधे निज हठ सठ परबस पर्यो कीर की नाईं ॥२॥ सपने व्याधि विविध बाधा जनु मृत्यु उपस्थित आई । बैद अनेक उपाय करै जागे बिनु पीर न जाई ॥३॥ श्रुति-गुरु-साधु-स्मृति-संमत यह दृश्य असत दुखकारी । तेहि बिनु तजे, भजे बिनु रघुपति, विपति सकै को टारी ॥४॥ बहु उपाय संसार-तरन कहँ, विमल गिरा श्रुति गावै । तुलसिदास मैं-मोर गये बिनु जिउ सुख कबहुँ न पावै ॥५॥ शब्दार्थ—अविद्यमान = नाशवान्, क्षणभंगुर । संसृति = संसार, क्लेश । कीर = तोता । भावार्थ—हे हरे ! आप मेरे इस भारी भ्रमको क्यों नहीं दूर करते ? यद्यपि यह संसार मिथ्या है, तथापि जबतक आपकी कृपा नहीं हो रही है, तबतक यह सत्य-सा भास रहा है ॥१॥ यह मैं जानता हूँ कि इन्द्रियोंके विषय झूठे हैं, तथापि हे गुसांई ! क्लेश दूर नहीं हो रहा है (संसार बना है)। बिना (किसीके) बाँधे ही मैं अपने हठसे शठतावश तोतेकी तरह दूसरेके अधीन पड़ा हूँ ॥२॥ जैसे किसीकी स्वप्नमें रोगकी अनेक तरहकी बाधाओंसे मृत्यु निकट आ जाय और वैद्य अनेक उपाय करें, किन्तु जागे बिना दुःख दूर नहीं हो सकता (वैसे ही भ्रममें पड़कर हमलोग पीड़ा भोग रहे हैं और उसे दूर करनेके लिए मिथ्या उपाय कर रहे हैं, पर बिना तत्त्वज्ञानके उससे छुटकारा नहीं मिल सकता) ॥३॥ वेद, गुरु, साधु और स्मृतियोंकी सम्मति है कि यह दृश्य (दिखलाई पड़नेवाला जगत्) असत् है—दुःखदायक है । इसे त्यागकर श्रीरामजीका भजन किये बिना सांसारिक दुःखोंको कौन टाल सकता है ? ॥४॥ वेद निर्मल वाणीसे कह रहे हैं कि संसार-सागरको पार करनेके लिए बहुत-से उपाय हैं; किन्तु तुलसीदास कहते हैं कि ‘मैं और मेरा’ भाव नष्ट हुए बिना इस जीवको कभी भी सुख नहीं मिलता ॥५॥ [ १२१ ] हे हरि ! यह भ्रम की अधिकाई । देखत, सुनत, कहत समुझत संसय-संदेह न जाई ॥१॥
२१६ विनय-पत्रिका जो जग मृषा ताप-त्रय-अनुभव होइ कहहु केहि लेखे। कहि न जाय मृगबारि सत्य, भ्रम ते दुख होइ बिसेखे ॥२॥ सुभग सेज सोवत सपने, बारिधि बूडत भय लागै। कोटिहुँ नाव न पार पाव सो, जब लगि आपु न जागै ॥३॥ अनविचार रमनीय सदा, संसार भयंकर भारी। सम-संतोष-दया-विवेक तें, व्यवहारी सुखकारी ॥४॥ तुलसिदास सब विधि प्रपंच जग जदपि झूठ श्रुति गावै। रघुपति, भगति, संत-संगति बिनु, को भव-त्रास नसावै ॥५॥ शब्दार्थ-मृगबारि = मृगजल। आपु = स्वयं। भावार्थ-हे हरे ! यह भ्रमकी ही विशेषता है कि देखते, सुनते और समझते रहनेपर भी संशय और सन्देह दूर नहीं हो रहा है ॥१॥ यदि यह कहो कि जब संसार मिथ्या ही है, तो फिर त्रिविध तापोंका अनुभव किस प्रकार होता है (क्योंकि संसारके मिथ्या होनेपर उसके तापोंका मिथ्या होना स्वाभाविक है)-तो (इसका उत्तर यह है कि) मृगजल सत्य नहीं कहा जा सकता, किन्तु भ्रमवश विशेष दुःख होता ही है ॥२॥ स्वप्नमें सुन्दर सेजपर सोया हुआ मनुष्य समुद्रमें डूबनेसे भयभीत होता है; किन्तु जबतक वह स्वयं नहीं जागता, तबतक करोड़ों नावोंके रहनेपर भी पार नहीं जा पाता ॥३॥ यह बड़ा ही भयंकर संसार विचार न रहनेके कारण ही सदैव रमणीय दिखाई देता है। हाँ, सम, सन्तोष, दया और विवेकयुक्त व्यवहार करनेवालोंके लिए (यह भयानक संसार) सुखकर अवश्य है ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि यद्यपि संसारका प्रपंच सब तरहसे झूठा है—ऐसा वेदोंका कथन है, फिर भी रामजीकी भक्ति और सन्त- जनोंकी संगतिके बिना संसार-भयको कौन दूर कर सकता है ? ॥५॥ विशेष १-‘संशय-संदेह’—देखनेमें दोनों शब्द एक ही अर्थके द्योतक प्रतीत हो रहे हैं, पर दोनों शब्दोंका भिन्न-भिन्न आशय है। यहाँपर ‘संशय’ शब्दसे अभिप्राय है, ‘मिथ्या जगत्को सत्य मानना’ और ‘सन्देह’ शब्दसे अभिप्राय है ‘केवल परमात्माकी ही सत्ता है या और कुछ’।
विनय-पत्रिका २१७ ( १२२ ) मैं हरि, साधन करइ न जानी। जस आमय भेषज न कीन्ह तस, दोष कंहा दिरमानी ॥१॥ सपने नृप कहँ घटै विप्र-बध, बिकल फिरै अघ लागे। वाजिमेध सत कोटि करै नहिं सुद्ध होइ बिनु जागे ॥२॥ स्त्रग महँ सर्प विपुल भयदायक, प्रगट होइ अविचारे। बहु आयुध धरि, वल अनेक करि हारहि मरइ न मारे ॥३॥ निज भ्रम ते रवि-कर-संभव सागर अति भय उपजावै। अवगाहत बोहित नौका चढ़ि कवहूँ पार न पावै ॥४॥ तुलसिदास जग आपु सहित जब लगि निरमूल न जाई। तब लगि कोटि कलप उपाय करि मरिय, तरिय नहिं भाई ॥५॥ शब्दार्थ—आमय = रोग। भेषज = दवा। दिरमानी = हिकमत (यह अरबी भाषाका शब्द है। किसी-किसी प्रतिमें 'दिरमानी' की जगह 'वरवानी' पाठ है)। स्त्रग = माला। अवगाहत = डूबता है। बोहित = जहाज। भावार्थ—हे हरे ! मैंने साधन करना नहीं जाना। जैसा रोग था, वैसी दवा नहीं की, इसमें हिकमत (दवा) का दोष ही क्या है? ॥१॥ स्वप्नमें किसी राजाको ब्रह्महत्या लग जानेपर वह उस पापके कारण विकल होकर घूमता है, पर चाहे वह सौ करोड़ अश्वमेध यज्ञ कर डाले—बिना जागे शुद्ध नहीं होता (वैसे ही तत्त्वज्ञानके बिना अज्ञान-जनित पापोंसे छुटकारा नहीं होता) ॥२॥ अज्ञानके कारण मालामें बड़े भयानक सर्पका भ्रम पैदा हो जाता है; किन्तु वह बहुत-से हथियारोंके द्वारा अनेक तरहका बल-प्रयोग करके मारते-मारते हार जानेपर भी नहीं मरता (मरता तभी है, जब सर्पकी भ्रान्ति दूर हो जाती है) ॥३॥ अपने ही भ्रमसे सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न हुआ (मृगजलका) समुद्र अत्यधिक भय उत्पन्न करता है और उसमें डूबकर जहाज या नावपर चढ़नेसे कोई पार नहीं पाता ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि जबतक अहंपनके सहित संसारका निर्मूल नाश न होगा, तबतक हे भाई ! करोड़ों कल्पतक उपाय करते- करते मर जाओ, पर संसार-सागरसे पार नहीं हो सकते ॥५॥ (सारांश, जैसे
२१८ विनय-पत्रिका अज्ञानवश ब्रह्महत्या लगी, मालामें सर्पकी भ्रान्ति हुई, मृगतृष्णाके समुद्रने भय पैदा किया, और भ्रमके दूर होते ही उन सबका अपने आप ही नाश हो गया, वैसे ही मिथ्या जगतरूपी शरीरादिके अधिष्ठान-(अहंबुद्धि) द्वारा जबतक शरीरमें सत्यताकी प्रतीति है, तबतक अनेक उपाय करनेपर भी उसका मूलोच्छेद नहीं हो सकता । क्योंकि यदि कोई वस्तु हो तब तो उपायों द्वारा उसका नाश हो सकता है; जो पदार्थ है ही नहीं, वह कैसे जायगा ? किन्तु जब मिथ्या संसारके अधिष्ठानरूप अहंबुद्धिमें यह विचार पैदा होता है कि मैंने अज्ञानवश इसे मान रखा था, वास्तवमें यह कुछ नहीं है—और जब यह विचार दृढ़ हो जाता है, तब देहादिक संसार तथा उसके अधिष्ठान अहंबुद्धिरूप जीवका लय हो जाता है; अर्थात् यह ज्ञान हो जाता है कि परमात्माके अतिरिक्त यह सब वस्तु मिथ्या है। बस, इसी दवासे संसाररूपी रोगका नाश होता है— अन्यथा नहीं । विशेष १—'स्रग महँ सर्प'—वास्तवमें संसार भ्रान्तिरूप है। भ्रान्तिरूप संसार पाँच प्रकारका है। भेदभ्रान्ति, कर्त्ता-भोक्तापनकी भ्रान्ति, संगकी भ्रान्ति, विकारकी भ्रान्ति और ब्रह्मसे भिन्न जगत्के सत्यताकी भ्रान्ति । वेदान्त शास्त्रने इस भ्रान्तिको अध्यास भी कहा है । इसके दो भेद माने गये हैं; यथा ज्ञानाध्यास और अर्थाध्यास । [ १२३ ] अस कछु समुझि परत रघुराया । बिनु तव कृपा दयालु ! दास-हित मोह न छूटै माया ॥१॥ वाक्य-ग्यान अत्यन्त निपुन भव-पार न पावै कोई । निसि गृहमध्य दीप की बातन्ह, तम निवृत्त नहिं होई ॥२॥ जैसे कोइ इक दीन दुखित अति असन-हीन दुख पावै । चित्र कल्पतरु कामधेनु गृह लिखे न विपति नसावै ॥३॥ षटरस बहु प्रकार भोजन कोड, दिन अरु रैन बखानै । बिनु बोले सन्तोष-जनित सुख खाइ सोई पै जानै ॥४॥
विनय-पत्रिका २१९ जब लगि नहिं निज हृदि प्रकास, अरु विषय-आस मनमाहीं । तुलसिदास तब लगि जग-जोनि भ्रमत सपनेहुँ सुख नाहीं ॥५॥ शब्दार्थ—वाक्य-ग्यान = वाणीकी चातुरी, मौखिक ज्ञान । तम = अन्धकार । असन = भोजन । रैन = रात । भावार्थ—हे रघुनाथजी ! मुझे तो कुछ ऐसा जान पड़ता है कि हे दयालु ! बिना आपकी कृपाके भक्तोंके हितार्थ न तो उनका मोह ही दूर होता है और न माया ही छूटती है ॥१॥ कोई मनुष्य मौखिक ज्ञान छाँटनेमें अत्यन्त निपुण होनेसे संसार-सागरको पार नहीं कर सकता । रातके समय घरमें दीपककी बातें करनेसे अन्धकारकी निवृत्ति नहीं हुआ करती (अन्धेरा तो दूर होता है, दीपक जलानेपर ही) ॥२॥ (और सुनिये) जैसे कोई अत्यन्त दीन और दुःखित मनुष्य बिना भोजनके (भूखके मारे) दुःख पा रहा है तो उसके घरमें कल्पवृक्ष और कामधेनुका चित्र लिखने (बनाने) से उसकी विपत्ति (क्षुधाकी पीड़ा) दूर नहीं की जा सकती, (वैसे ही शास्त्रोंकी कोरी बातोंसे या जबानी जमा-खर्चसे मोह नहीं छूटता) ॥३॥ यह तो ठीक वैसा ही है जैसे कोई मनुष्य अनेक प्रकारके षट्रस व्यञ्जनोंका दिन रात बखान (वर्णन) करता रहे; किन्तु उन व्यञ्जनोंका आनन्द तो केवल वही जानता है जो बिना बोले चाले उसे खाकर क्षुधाकी तृप्ति करता है (इसी प्रकार शास्त्रोंके पन्ने चाटने अथवा उनकी व्याख्या करनेसे कुछ नहीं होता) ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि जबतक अपने हृदयमें तत्त्वज्ञानका प्रकाश नहीं होता और मनमें विषयोंकी आशा बनी रहती है, तबतक यह जीव संसारकी अनन्त योनियोंमें भटकता रहता है, स्वप्नमें भी सुख नहीं पाता ॥५॥ विशेष १—'षट्रस'— १ मधुर, २ अम्ल, ३ लवण, ४ कटु, ५ तिक्त, ६ कषाय ये ही छः रस हैं। २—इस पदमें गोस्वामीजीने अच्छी युक्तिसे ईश्वरीय कृपाको प्रधानता दी है। ठीक ही है, 'अमृत'का गुण जाननेसे कहीं अमरता प्राप्त हो सकती है ? अमरत्व तो तभी प्राप्त हो सकता है जब अमृत पान करे । इसी प्रकार
२२० विनय-पत्रिका केवल शास्त्रीय ज्ञानसे कुछ नहीं होता, उद्धार तो तब होता है जब उसके अनुसार आचरण करे। [ १२४ ] जौ निज मन परिहरै विकारा । तौ कत द्वैत-जनित संसृति-दुख, संसय, सोक अपारा ॥१॥ सत्रु, मित्र, मध्यस्थ, तीनि ये, मन कीन्हें बरिआईं । त्यागन, गहन, उपेच्छनीय, अहि, हाटक, तृन की नाईं ॥२॥ असन, बसन, पसु, वस्तु विविध विधि, सब मनि महँ रह जैसे । सरग, नरक, चर-अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे ॥३॥ बिटप-मध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये। मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये ॥४॥ रघुपति-भगति-बारि-छालित चित, बिनु प्रयास ही सूझै। तुलसिदास कह चिद्-बिलास जग बूझत बूझत बूझै ॥५॥ शब्दार्थ—मध्यस्थ = बीचका, न शत्रु ही, न मित्र ही, यानी उदासीन। बरिआईं = जबर्दस्ती। हाटक = सोना। पुतरिका = पुतली। कंचुकि = वस्त्र। छालित = प्रक्षालित, धुलकर। भावार्थ—यदि अपना मन विकारों-(संकल्प-विकल्परूप चाञ्चल्य) को छोड़ दे, तो द्वैतभावसे उत्पन्न सांसारिक दुःख, संशय और अपार शोक, क्यों हो ? ॥१॥ मनने ही अपनी जबर्दस्तीसे किसीको शत्रु, किसीको मित्र और किसीको उदासीन इन तीनोंको मान रखा है (पर वास्तवमें न कोई शत्रु है, न मित्र और न उदासीन)। शत्रु सर्पके समान त्याग देने योग्य हैं, मित्र सुवर्णकी तरह ग्रहण करने योग्य हैं और उदासीन तृणकी भाँति उपेक्षा करने योग्य हैं ॥२॥ जैसे भोजन, वस्त्र, पशु और नाना प्रकारकी वस्तुएँ ये सब मणिके अन्तर्गत हैं (अर्थात् यदि मणि हो, तो उसे बेचकर उक्त वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं), वैसे ही स्वर्ग, नरक, जड़, चैतन्य तथा बहुत-से लोक मनमें रहते हैं (तात्पर्य, मनके प्रतापसे वह जीव हर जगह जा सकता है) ॥३॥ जैसे वृक्षके बीचमें कठपुतली तथा सूतमें वस्त्र बिना बनाये ही मौजूद रहते हैं, उसी प्रकार मनके भीतर अनेक