भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 229

२१८ विनय-पत्रिका अज्ञानवश ब्रह्महत्या लगी, मालामें सर्पकी भ्रान्ति हुई, मृगतृष्णाके समुद्रने भय पैदा किया, और भ्रमके दूर होते ही उन सबका अपने आप ही नाश हो गया, वैसे ही मिथ्या जगतरूपी शरीरादिके अधिष्ठान-(अहंबुद्धि) द्वारा जबतक शरीरमें सत्यताकी प्रतीति है, तबतक अनेक उपाय करनेपर भी उसका मूलोच्छेद नहीं हो सकता । क्योंकि यदि कोई वस्तु हो तब तो उपायों द्वारा उसका नाश हो सकता है; जो पदार्थ है ही नहीं, वह कैसे जायगा ? किन्तु जब मिथ्या संसारके अधिष्ठानरूप अहंबुद्धिमें यह विचार पैदा होता है कि मैंने अज्ञानवश इसे मान रखा था, वास्तवमें यह कुछ नहीं है—और जब यह विचार दृढ़ हो जाता है, तब देहादिक संसार तथा उसके अधिष्ठान अहंबुद्धिरूप जीवका लय हो जाता है; अर्थात् यह ज्ञान हो जाता है कि परमात्माके अतिरिक्त यह सब वस्तु मिथ्या है। बस, इसी दवासे संसाररूपी रोगका नाश होता है— अन्यथा नहीं । विशेष १—'स्रग महँ सर्प'—वास्तवमें संसार भ्रान्तिरूप है। भ्रान्तिरूप संसार पाँच प्रकारका है। भेदभ्रान्ति, कर्त्ता-भोक्तापनकी भ्रान्ति, संगकी भ्रान्ति, विकारकी भ्रान्ति और ब्रह्मसे भिन्न जगत्‌के सत्यताकी भ्रान्ति । वेदान्त शास्त्रने इस भ्रान्तिको अध्यास भी कहा है । इसके दो भेद माने गये हैं; यथा ज्ञानाध्यास और अर्थाध्यास । [ १२३ ] अस कछु समुझि परत रघुराया । बिनु तव कृपा दयालु ! दास-हित मोह न छूटै माया ॥१॥ वाक्य-ग्यान अत्यन्त निपुन भव-पार न पावै कोई । निसि गृहमध्य दीप की बातन्ह, तम निवृत्त नहिं होई ॥२॥ जैसे कोइ इक दीन दुखित अति असन-हीन दुख पावै । चित्र कल्पतरु कामधेनु गृह लिखे न विपति नसावै ॥३॥ षटरस बहु प्रकार भोजन कोड, दिन अरु रैन बखानै । बिनु बोले सन्तोष-जनित सुख खाइ सोई पै जानै ॥४॥