विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २१९ जब लगि नहिं निज हृदि प्रकास, अरु विषय-आस मनमाहीं । तुलसिदास तब लगि जग-जोनि भ्रमत सपनेहुँ सुख नाहीं ॥५॥ शब्दार्थ—वाक्य-ग्यान = वाणीकी चातुरी, मौखिक ज्ञान । तम = अन्धकार । असन = भोजन । रैन = रात । भावार्थ—हे रघुनाथजी ! मुझे तो कुछ ऐसा जान पड़ता है कि हे दयालु ! बिना आपकी कृपाके भक्तोंके हितार्थ न तो उनका मोह ही दूर होता है और न माया ही छूटती है ॥१॥ कोई मनुष्य मौखिक ज्ञान छाँटनेमें अत्यन्त निपुण होनेसे संसार-सागरको पार नहीं कर सकता । रातके समय घरमें दीपककी बातें करनेसे अन्धकारकी निवृत्ति नहीं हुआ करती (अन्धेरा तो दूर होता है, दीपक जलानेपर ही) ॥२॥ (और सुनिये) जैसे कोई अत्यन्त दीन और दुःखित मनुष्य बिना भोजनके (भूखके मारे) दुःख पा रहा है तो उसके घरमें कल्पवृक्ष और कामधेनुका चित्र लिखने (बनाने) से उसकी विपत्ति (क्षुधाकी पीड़ा) दूर नहीं की जा सकती, (वैसे ही शास्त्रोंकी कोरी बातोंसे या जबानी जमा-खर्चसे मोह नहीं छूटता) ॥३॥ यह तो ठीक वैसा ही है जैसे कोई मनुष्य अनेक प्रकारके षट्रस व्यञ्जनोंका दिन रात बखान (वर्णन) करता रहे; किन्तु उन व्यञ्जनोंका आनन्द तो केवल वही जानता है जो बिना बोले चाले उसे खाकर क्षुधाकी तृप्ति करता है (इसी प्रकार शास्त्रोंके पन्ने चाटने अथवा उनकी व्याख्या करनेसे कुछ नहीं होता) ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि जबतक अपने हृदयमें तत्त्वज्ञानका प्रकाश नहीं होता और मनमें विषयोंकी आशा बनी रहती है, तबतक यह जीव संसारकी अनन्त योनियोंमें भटकता रहता है, स्वप्नमें भी सुख नहीं पाता ॥५॥ विशेष १—'षट्रस'— १ मधुर, २ अम्ल, ३ लवण, ४ कटु, ५ तिक्त, ६ कषाय ये ही छः रस हैं। २—इस पदमें गोस्वामीजीने अच्छी युक्तिसे ईश्वरीय कृपाको प्रधानता दी है। ठीक ही है, 'अमृत'का गुण जाननेसे कहीं अमरता प्राप्त हो सकती है ? अमरत्व तो तभी प्राप्त हो सकता है जब अमृत पान करे । इसी प्रकार