विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० विनय-पत्रिका केवल शास्त्रीय ज्ञानसे कुछ नहीं होता, उद्धार तो तब होता है जब उसके अनुसार आचरण करे। [ १२४ ] जौ निज मन परिहरै विकारा । तौ कत द्वैत-जनित संसृति-दुख, संसय, सोक अपारा ॥१॥ सत्रु, मित्र, मध्यस्थ, तीनि ये, मन कीन्हें बरिआईं । त्यागन, गहन, उपेच्छनीय, अहि, हाटक, तृन की नाईं ॥२॥ असन, बसन, पसु, वस्तु विविध विधि, सब मनि महँ रह जैसे । सरग, नरक, चर-अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे ॥३॥ बिटप-मध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये। मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये ॥४॥ रघुपति-भगति-बारि-छालित चित, बिनु प्रयास ही सूझै। तुलसिदास कह चिद्-बिलास जग बूझत बूझत बूझै ॥५॥ शब्दार्थ—मध्यस्थ = बीचका, न शत्रु ही, न मित्र ही, यानी उदासीन। बरिआईं = जबर्दस्ती। हाटक = सोना। पुतरिका = पुतली। कंचुकि = वस्त्र। छालित = प्रक्षालित, धुलकर। भावार्थ—यदि अपना मन विकारों-(संकल्प-विकल्परूप चाञ्चल्य) को छोड़ दे, तो द्वैतभावसे उत्पन्न सांसारिक दुःख, संशय और अपार शोक, क्यों हो ? ॥१॥ मनने ही अपनी जबर्दस्तीसे किसीको शत्रु, किसीको मित्र और किसीको उदासीन इन तीनोंको मान रखा है (पर वास्तवमें न कोई शत्रु है, न मित्र और न उदासीन)। शत्रु सर्पके समान त्याग देने योग्य हैं, मित्र सुवर्णकी तरह ग्रहण करने योग्य हैं और उदासीन तृणकी भाँति उपेक्षा करने योग्य हैं ॥२॥ जैसे भोजन, वस्त्र, पशु और नाना प्रकारकी वस्तुएँ ये सब मणिके अन्तर्गत हैं (अर्थात् यदि मणि हो, तो उसे बेचकर उक्त वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं), वैसे ही स्वर्ग, नरक, जड़, चैतन्य तथा बहुत-से लोक मनमें रहते हैं (तात्पर्य, मनके प्रतापसे वह जीव हर जगह जा सकता है) ॥३॥ जैसे वृक्षके बीचमें कठपुतली तथा सूतमें वस्त्र बिना बनाये ही मौजूद रहते हैं, उसी प्रकार मनके भीतर अनेक