भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 232, कुल 475 में से

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पृष्ठ 232

शरीर लीन रहते हैं और अवसर पाकर प्रकट होते हैं ॥४॥ श्रीरामजीको भक्तिरूपी जलसे चित्तके धुल जानेपर अनायास ही दृष्टि खुल जाती है (यानी ऊपर कही हुई बात दृष्टिगोचर होने लगती है)। तुलसीदास कहते हैं कि तभी (रामभक्तिरूपी जलसे चित्तके धुल जानेपर ही) चैतन्यका विलासरूप जगत् समझते समझते समझमें आता है ॥५॥ विशेष १—'मन'—शत्रु और मित्र मानना मनका ही धर्म है, और मन ही स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाला है। अन्यत्र भी लिखा है:— 'मन एव मनुष्याणाम् कारणं बन्धमोक्षयोः ।' २—'सत्रु, मित्र···नाईं' इसमें क्रम अलंकार है। जहाँ क्रमसे दो या इससे अधिक वस्तुओंका वर्णन अर्थका मिलान करते हुए किया जाय वहाँ क्रमालंकार होता है। [ १२५ ] मैं केहि कहौं बिपति अति भारी। श्रीरघुवीर धीर हित कारी ॥१॥ मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आइ बहु चोरा ॥२॥ अति कठिन करहिं बरजोरा। मानहिं नहिं विनय निहोरा ॥३॥ तम, मोह, लोभ, अहँकारा। मद, क्रोध, बोध-रिपु मारा ॥४॥ अति करहिं उपद्रव नाथा। मरदहिं मोहिं जानि अनाथा ॥५॥ मैं एक, अमित बटपारा। कोउ सुनै न मोर पुकारा ॥६॥ भागेहु नहिं नाथ ! उबारा। रघुनायक, करहु सँभारा ॥७॥ कह तुलसिदास सुनु रामा। लूटहिं तसकर तव धामा ॥८॥ चिंता यह मोहिं अपारा। अपजस नहिं होइ तुम्हारा ॥९॥ शब्दार्थ—बरजोरा = जबर्दस्ती। बोधरिपु = ज्ञानका शत्रु। मार = कामदेव। बटपारा = डाकू। धामा = घर। भावार्थ—हे धीरतापूर्वक हित करनेवाले रघुनाथजी ! मैं अपनी महान् विपत्ति किससे कहूँ ? ॥१॥ हे प्रभो ! मेरा हृदय आपका घर है, किन्तु उसमें अब बहुत-से चोर आ बसे हैं ॥२॥ (ये चोर) बड़े कठिन हैं, और विनती निहोरा

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