भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 233, कुल 475 में से

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पृष्ठ 233

२२२ विनय-पत्रिका न मानकर जबर्दस्ती करते हैं ॥३॥ अज्ञान, मोह, लोभ, अहंकार, मद, क्रोध, और ज्ञानका शत्रु काम, ॥४॥ यही सब चोर हैं जोकि हे नाथ ! बड़ा उपद्रव कर रहे हैं, और मुझे अनाथ जानकर कुचल रहे हैं ॥५॥ मैं अकेला हूँ और डाकू बहुत-से हैं, मेरा चिल्लाना भी कोई नहीं सुन रहा है॥६॥ हे नाथ ! भागने- पर भी मैं नहीं बच सकता । अतः हे रघुनाथजी ! मेरा सम्भार कीजिये ॥७॥ तुलसीदास कहते हैं कि हे रामजी ! सुनो, (ऊपर कहे हुए) चोर आपका घर लूट रहे हैं ॥८॥ इसीलिए मुझे इस बातकी बड़ी चिन्ता हो रही है कि इससे कहीं आपकी बदनामी न हो ॥९॥ [ १२६ ] मन मेरे, मानहि सिख मेरी। जो निजु भगति चहै हरि केरी ॥१॥ उर आनहि प्रभु-कृत हित जेते। सेवहि तजे अपनपौ चेते ॥२॥ दुख-सुख अरु अपमान बड़ाई। सब सम लेखहि बिपति विहाई ॥३॥ सुनु सठ काल-ग्रसित यह देही। जनि तेहि लागि विदूषहि केही॥४॥ तुलसिदास बिनु असि मति आये। मिलहिं न राम कपट-लौ लाये ॥५॥ शब्दार्थ - अपनपौ = अहंकार। विदूषहि = दोष दे। भावार्थ-रे मेरे मन ! यदि तू अपनेमें भगवान्‌की भक्ति चाहता है तो मेरी शिक्षा मान ले ॥१॥ (सबसे पहले तू) परमात्माने जितने उपकार किये हों, उनका हृदयमें स्मरण कर और अहंकार छोड़कर चेत करके उनकी सेवा कर ॥२॥ सुख-दुःख और मान-अपमान सबको बराबर समझ, तभी तेरी विपत्ति दूर होगी ॥३॥ रे दुष्ट मन ! सुन, यह शरीर काल-ग्रसित है, इसके लिए तू किसीको दोष न दे ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि ऐसी बुद्धि हुए बिना, केवल कपट-प्रेम करनेसे, रामजी नहीं मिल सकते ॥५॥ विशेष (१) 'दुख' 'बिहाई' - भगवान्‌ने भी गीतामें यही कहा है:- समः शत्रौ च मित्रे च, तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥

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