भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 234

विनय-पत्रिका २२३ तुल्य निन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ —श्रीमद्भगवद्गीता, अ० १२, श्लो० १८-१९ (१) 'देही' वास्तवमें देहका अर्थ शरीर और देहीका अर्थ जीव है। यद्यपि जीवका नाश नहीं होता, फिर भी जबतक शरीरमें अहंबुद्धि रहती है, तबतक जीवका आवागमनरूप जन्म-मरण लगा रहता है। इसीसे साधारण रीतिसे जीवको कालग्रसित कह दिया गया है। किन्तु ऐसा अर्थ करनेमें खींचातानी करनी पड़ती है, अतः यहाँ देही शब्दका 'शरीर' अर्थ ही लिया गया है—और भाषाके काव्यमें शरीरके लिए देहके स्थानपर देही लिखा भी जा सकता है। ( १२७ ) मैं जानी, हरिपद-रति नाहीं। सपनेहुँ नहिं विराग मन माहीं ॥१॥ जे रघुबीर-चरन अनुरागे । तिन्ह सब भोग रोग सम त्यागे ॥२॥ काम-भुजंग डसत जब जाही। विषय नींव कटु लगत न ताही ॥३॥ असमंजस अस हृदय बिचारी। बढ़त सोच नित नूतन भारी ॥४॥ जब कब राम-कृपा दुख जाई। तुलसिदास नहिं आन उपाई ॥५॥ भावार्थ—मैं समझ गया कि भगवान्‌के चरणोंमें मेरा प्रेम नहीं है; क्योंकि मेरे मनमें स्वप्नमें भी वैराग्य नहीं है ॥१॥ जो लोग श्रीरामजीके चरणोंके प्रेममें पगे हैं, वे समस्त भोगोंको रोगके समान त्याग चुके हैं ॥२॥ जब भी जिसे काम- सर्प डँस लेता है, तब उसे विषयरूपी नीम कड़वी नहीं लगती ॥३॥ ऐसा हृदयमें विचारकर असमंजसमें पड़ गया हूँ और (मेरे मनमें) नित नया और महान् सोच बढ़ता जा रहा है ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि जब कभी भी हो, श्रीराम- जीकी कृपासे ही दुःख दूर होगा, दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥५॥ ( १२८ ) सुमिरु सनेह-सहित सीतापत्ति । रामचरन तजि नहिंन आनि गति १ जप, तप, तीरथ, जोग, समाधी । कलिमत्ति-विकल, न कछु निरुपाधी २ करतहुँ सुकृत न पाप सिराहीं । रकतबीज जिमि बाढ़त जाहीं ३ हरति एक अघ-असुर-जालिका । तुलसिदास प्रभु-कृपा—कालिका ४