विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ विनय-पत्रिका भावार्थ—स्नेह-पूर्वक श्रीरामजीका स्मरण कर; क्योंकि रामजीके चरणोंको छोड़कर दूसरी गति नहीं है ॥१॥ जप, तप, तीर्थ, योगाभ्यास, समाधि आदि कोई भी उपाधिरहित नहीं है, —सब कलियुगी बुद्धिसे व्याकुल हो रहे हैं ॥२॥ पुण्य करते हुए भी पापोंका अन्त नहीं होता । रक्तबीजके समान (पाप) बढ़ता ही जा रहा है ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि पाप-रूपी राक्षस-समूहको नाश करने- वाली केवल श्रीरामजीकी कृपारूपी काली है ॥४॥ विशेष १--'रक्तबीज' नामका महाप्रतापी दैत्य था । उसने तप करके भगवान् शिवजीसे यह वर प्राप्त किया था कि 'यदि मेरे शरीरसे एक बूँद रक्त गिरे तो उससे सैकड़ों रक्तबीज पैदा हो जायें।' यह वर प्राप्त करके उसने तीनों लोकको कँपा दिया। अन्तमें देवताओंकी प्रार्थनापर ध्यान देकर महाकाली प्रकट हुईं और उससे युद्ध करने लगीं । जब देखा कि उसके रक्तसे अगणित रक्तबीज पैदा होते जा रहे हैं, तब उन्होंने अपनी जीभ इतनी लम्बी बढ़ायी कि जितना रक्त गिरता, सब वह ऊपर ही ऊपर चाट-चाट जाती थीं, —जमीनपर रक्त गिरने ही नहीं पाता था । इस प्रकार उन्होंने रक्तबीजका वध किया । यह कथा दुर्गासप्तशतीमें विस्तारपूर्वक लिखी है । ( १२९ ) रुचिर रसना तू राम राम¹ क्यों न रटत । सुमिरत सुख-सुकृत बढ़त, अघ अमंगल घटत ॥१॥ बिनु श्रम कलि-कलुष-जाल कटु कराल कटत । दिनकर के उदय जैसे तिमिर-तोम फटत ॥२॥ जोग, जाग, तप, विराग, जप, सुतीरथ-अटत । बाँधिबे को भव-गयंद रेनुकी रजु बँटत ॥३॥ परिहरि सुर-मनि सुनाम, गुंजा लखि लटत । लालच लघु तेरो लखि, तुलसि तोहिं हटत ॥४॥ १. पाठान्तर—'राम राम राम' ।