भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 236

विनय-पत्रिका २२५ शब्दार्थ—तिमिर = अन्धकार। तोम = समूह। अटत = पहुँचाता है। गुंजा = घुँघची। लटत = लोभ। हटत = हटता जा रहा है, अलग या दूर होता जा रहा है। भावार्थ—ऐ सुन्दर जिह्ने ! तू राम नाम क्यों नहीं रट रही है ? उनका स्मरण करनेसे सुख और आनन्द बढ़ते हैं तथा पाप और अनिष्ट घटते हैं ॥१॥ राम-नाम रटनेसे बिना परिश्रमके ही कलियुगके कटु और विकराल पापोंका जाल उसी प्रकार कट जाता है, जैसे सूर्यके उदय होते ही सघनान्धकार फट जाता है ॥२॥ तू योग, यज्ञ, जप, वैराग्य, तप और तीर्थमें पहुँचती है (वह सब करती है); किन्तु ऐसा करके तू संसाररूपी हाथीको बाँधनेके लिए धूलकी रस्सी बँट रही है ॥३॥ तू राम-नामरूपी चिन्तामणिको छोड़, घुँघची देखकर उसपर लट्टू हो रही है। तेरा यह तुच्छ लोभ देखकर तुलसीदास तुझसे हटता जा रहा है॥४॥ विशेष १—'अटत'का अर्थ टीकाकारोंने 'फिरता है' लिखा है। किन्तु हमारी समझसे इसका अर्थ है 'पहुँचता है'। भाषामें इसका प्रयोग इसी अर्थमें किया भी जाता है। [ १३० ] राम राम, राम राम, राम राम, जपत। मंगल-मुद उदित होत, कलि-मल छल छपत ॥१॥ कहु के लहे फल रसाल, बबुर बीज वपत। हारहि जनि जनम जाय गाल गूल गपत ॥२॥ काल, करम, गुन, सुभाउ सबके सीस तपत। राम-नाम-महिमा की चरचा चले चपत ॥३॥ साधन बिनु सिद्धि सकल विकल लोग लपत। कलिजुग वर वनिज विपुल नाम नगर खपत ॥४॥ नाम सों प्रतीति-प्रीति हृदय सुथिर थपत। पावन किये रावन-रिपु तुलसिहुँ-से अपत ॥५॥ शब्दार्थ—वपत = बोनेसे ! गाल = गाल बजाना, अनर्गल बात करना । गूल = शोर करना । गपत = गप्पें हाँककर । चपत = दब जाते हैं । खपत = खप जाता है। रिपु = रावणके शत्रु श्रीरामजी । अपत = पतित, पापी । १५