भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 237

२२६ विनय-पत्रिका भावार्थ—राम-राम जपते ही कल्याण और आनन्दका उदय होता है और कलिके पाप एवं छल-प्रपंच छिप जाते हैं ॥१॥ कहो तो सही, बबूरका बीज बोकर किसे आमका फल मिला है ? गाल बजाकर तथा गप्पें हाँककर हल्ला करनेमें जीवन बीता जा रहा है, पर उसे इस प्रकार न खो दे । सारांश, गल्लगुह्ल या गुल्गापाड़ा छोड़कर ईश्वर भजन कर ॥२॥ काल, कर्म, गुण और स्वभाव ये सबके सिरपर तप रहे हैं; किन्तु राम-नामकी महिमाकी चर्चा चलनेपर ये सब दब जाते हैं ॥३॥ व्याकुल प्राणी बिना साधनके ही सब सिद्धियाँ लपक लेना चाहता है । इस कलियुगका श्रेष्ठ वाणिज्य व्यापार (नाना प्रकारका निषेध कर्म रूप सौदा) बहुत है, और वह नाम-नगरमें ही खपता है; अर्थात् जिस प्रकार बड़े शहरमें अच्छा-बुरा सब माल बिक जाता है, उसी तरह नाम-रूपी नगरमें पापरूपी सौदा बिक जाता है या नष्ट हो जाता है ॥४॥ राम-नाममें विश्वास और प्रेम करनेसे हृदय स्थिर होकर भगवान्‌में स्थित हो जाता है । श्रीरामजीके नामने तुलसी-सरीखे पापियोंको भी पवित्र कर दिया है ॥५॥ [ १३१ ] पावन प्रेम राम-चरन-कमल जनम लाहु परम । रामनाम लेत होत, सुलभ सकल धरम ॥१॥ जोग, मख, बिबेक, बिरति, बेद-बिदित करम । करिबे कहँ कटु कठोर, सुनत मधुर, नरम ॥२॥ तुलसी सुनि, जानि-बूझि, भूलहि जनि भरम । तेहि प्रभुको होहि, जाहि सब ही की सरम ॥३॥१ भावार्थ—श्रीरामजीके चरण-कमलोंमें पवित्र प्रेम होना परम लाभकी वस्तु है । रामका नाम लेते ही सब धर्म सुलभ हो जाते हैं ॥१॥ योगाभ्यास, यज्ञ, विवेक, वैराग्य आदि कर्म वेदोंमें प्रकट हैं, पर वे सब सुननेमें ही मधुर और कोमल हैं, करनेमें बड़े ही कटु और कठोर हैं । अर्थात्, योग-यज्ञादि कर्मोंके स्वर्ग ऐश्वर्यादि फल सुननेमें मधुर या मीठे हैं, नाम भी उनके कोमल हैं; किन्तु १. पाठान्तर 'तेहि प्रभु की तू सरन होहि जेहि सब की सरम' । तथा 'तेहि प्रभुको तू होहि जाहि सबहीकी सरम ।'