विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २२७ करनेमें पहाड़के समान भारी और कठिन हैं॥२॥ अतः हे तुलसीदास ! तू सुन और जान-बूझकर भ्रममें पड़कर भूल न जा। तू श्रीरामजीका हो जा, जिसे सबकी लाज है ॥३॥ [ १३२ ] राम-से प्रीतम की प्रीति-रहित जीव जाय जियत । जेहि सुख सुख मानि लेत, सुख सो समुझ कियत ॥१॥ जहँ-जहँ जेहि जोनि जनम महि, पताल, वियत । तहँ-तहँ तू विषय-सुखहिं, चहत लहत नियत ॥२॥ कत विमोह लट्यो, फट्यो गगन मगन सियत । तुलसी प्रभु-सुजस गाइ, क्यों न सुधा पियत ॥३॥ शब्दार्थ—कियत = कितना। महि = पृथिवी। वियत = आकाश । नियत = प्रारब्ध । विमोह = अज्ञान । भावार्थ—राम सरीखे प्रीतमके प्रेमसे रहित होकर यह जीव व्यर्थ जीता है। जिस सुखको तू सुख मान लेता है, जरा समझ तो सही कि वह सुख कितना है ? अर्थात् सांसारिक सुख क्षणिक हैं, बड़े दुःखदायी हैं ॥१॥ आकाश, पाताल और पृथिवीमें जहाँ-जहाँ और जिस-जिस योनिमें तूने जन्म लिया, वहाँ-वहाँ तूने विषय-सुखकी ही कामना की और प्रारब्धवश वही तुझे मिला भी ॥२॥ क्यों तू अज्ञानमें लुब्ध होकर फटे आकाश (जो कि फटा हुआ नहीं है) की सिलाई करनेमें मग्न है ? (यदि तुझे सुखकी ही इच्छा है, तो) तुलसीदास कहते हैं कि तू श्रीरामजीका सुयश गाकर अमृत पान क्यों नहीं करता ? ॥३॥ विशेष १— 'सुख'—सांसारिक सुख क्या है और कितना है, इसपर भिन्न-भिन्न आचार्योंका मत देखिये :— 'प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति मनः । —भर्तृहरि अर्थात्, किसी व्याधि अथवा दुःखके होनेपर उसका जो निवारण किया जाता है, उसीको लोग भ्रमवश 'सुख' कहा करते हैं ।