विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ विनय-पत्रिका ययातिने अपने पुत्र पुरुकी तरुणावस्था माँगकर एक हजार वर्षतक खूब सुखोपभोग किया। अन्तमें उन्हें जो अनुभव हुआ, वह यह है:— न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥ —महाभारत, आदिपर्व अर्थात् 'सुखोंके उपभोगसे विषय-वासनाकी तृप्ति नहीं होती; उससे तो विषय-वासना उसी प्रकार बढ़ती है जैसे हवनके पदार्थोंसे अग्निकी ज्वाला।' [ १३३ ] तोसों हौं फिरि फिरि हित, प्रिय पुनीत सत्य वचन कहत । सुनि मन, गुनि, समुझि, क्यों न सुगम सुमग गहत ॥१॥ छोटो बड़ो, खोटो खरो, जग जो जहँ रहत । अपने अपने को भलो कहहु, को न चहत ॥२॥ बिधि लगि लघु कीट अवधि सुख सुखी, दुख दहत । पसु लौं पसुपाल ईस बाँधत छोरत नहत ॥३॥ विषय मुद निहारु भार सिर काँधे ज्यों बहत । यों ही जिय जानि, मानि सठ ! तू साँसति सहत ॥४॥ पायो केहि घृत बिचारु, हरिन—वारि महुत । तुलसी तकु ताहि सरन, जाते सब लहत ॥५॥ शब्दार्थ—लगि = से । अवधि = तक । लौं = समान । पसुपाल = अहीर, ग्वाला । नहत = नाथता है, जोतता है। निहारु = देख। महुत = मथकर । तकु = देख । लहत = प्राप्त होता है। भावार्थ—रे जीव ! मैं तुझसे फिर-फिर हितकारी, प्रिय, पवित्र और सत्य- वचन कहता हूँ। उसे तू सुनकर मनमें गौर करके (गुनकर) और समझकर सीधा रास्ता क्यों नहीं पकड़ता ॥१॥ संसारमें छोटा-बड़ा, खरा-खोटा जो जहाँ रहता है, कहो तो, उनमें ऐसा कौन है जो अपना और अपने परिवारका भला नहीं चाहता ? ॥२॥ ब्रह्मासे लेकर छोटे कीड़ेतक सुखसे सुखी और दुःखसे