भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 475 में से

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पृष्ठ 240

विनय-पत्रिका २२९ जलते हैं, अर्थात् सुख-दुःखका प्रभाव सबपर पड़ता है। परमात्मा ग्वालेकी तरह जीवरूपी पशुओंको बाँधता है, खोलता है और जोतता है। अर्थात्, कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त जीवोंको ईश्वर जगतरूप क्रीड़ाके निमित्त उनके योग्यतानुसार भिन्न-भिन्न व्यापारमें लगाता है, विमुख रहनेवाले जीवोंको बाँधता है, सम्मुख हुए जीवोंको छोड़ता है ॥३॥ विषयोंके आनन्दको देख, वह मानों सिरके ऊपरके बोझको कन्धेपर रखता है। रे शठ ! यों ही तू हृदयमें जान और मानकर कष्ट सह रहा है। तात्पर्य, जैसे कोई सिरके ऊपरके बोझको कन्धेपर रखकर क्षणभरके लिए सुखका अनुभव करता है, और फिर जब कन्धा दुखने लगता है, तब वह उसे सिरपर रख लेता है, उसी तरह तू एक विषयसे हटकर दूसरे विषयमें फँसता, और क्षणिक सुखको आनन्द मानता है ॥४॥ सोच तो सही, मृगजल मथकर किसने घी पाया ? ऐ तुलसी ! तू उसी प्रभुकी शरण देख (शरणमें जा) जिस (प्रभु) से सब-कुछ प्राप्त होता है ॥५॥ विशेष १—'विधि लगि...बहत'—यहाँ गोस्वामीजीने यह दिखाया है कि ब्रह्मासे लेकर छोटे कीड़ेतक सुखसे सुखी और दुःखसे दुखी होते हैं, पर वे मूर्ख हैं; बुद्धिमान् तो वे हैं जो दोनों अवस्थाओंमें समान भावसे धैर्य धारण किये रहें। देखिये न, लिखा भी है:— सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ॥ —रामचरितमानस यथार्थतः सब प्राणी ईश्वराधीन हैं—कोई भी जीव स्वतन्त्र नहीं है। ऐसी दशामें सुखसे सुखी और दुःखसे दुखी होनेकी क्या जरूरत ? “नट मरकट इव सबहिं नचावत। राम खगेस बेद अस गावत ।” —रामचरितमानस न तो अपनी इच्छासे सुख ही मिलता है और न वह स्थायी रूपसे रहता ही है। सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुखका आना अनिवार्य है।

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