भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

२३० विनय-पत्रिका [ १३४ ] ताते हौं बार बार देव ! द्वार परि पुकार करत । आरति, नति, दीनता कहे प्रभु संकट हरत ॥१॥ लोकपाल सोक-बिकल रावन-डर डरत । का सुनि सकुचे कृपालु नर-सरीर धरत ॥२॥ कौसिक, मुनि-तीय, जनक सोच-अनल जरत । साधन केहि सीतल भये, सो न समुझि परत ॥३॥ केवट, खग, सबरि सहज चरन-कमल न रत । सनमुख तोहिं होत नाथ ! कुतरु सुफरु परत ॥४॥ बंधु-बैर कपि-बिभीषन गुरु गलानि गरत । सेवा केहि रीझि राम, किये सरिस भरत ॥५॥ सेवक भयो पवनपूत साहिब अनुहरत । ताको लिये नाम राम सब को सुढर ढरत ॥६॥ जाने बिनु राम-रीति पचि पचि जग मरत । परिहरि छल सरन गये तुलसिहुँ-से तरत ॥७॥ शब्दार्थ—नति = नम्रता । कुतरु = बुरे वृक्ष । सुफरु = सुन्दर फल । कपि = सुग्रीव गुरु = भारी । पवन-पूत = वायुके पुत्र हनुमान्‌जी । अनुहरत = अनुहारि करने लगे । भावार्थ—हे देवाधिदेव ! मैं आपके द्वारपर पड़ा हुआ इसलिए बार-बार पुकार कर रहा हूँ कि आप नम्रतापूर्वक दुःख, और दीनता कहनेपर संकट हर लेते हैं ॥१॥ जब कुबेर, इन्द्र आदि लोकपाल रावणके डरसे डरकर शोक-व्याकुल हो गये थे, तब हे कृपालु ! आपने कौन-सी बात सुनकर संकोच किया था और मनुष्यशरीर धारण किया था ? ॥२॥ यह बात मेरी समझमें नहीं आती कि शोकाग्निसे जलते हुए विश्वामित्र, अहिल्या और जनक किस साधनसे शीतल हुए थे ॥३॥ आपके चरण-कमलोंमें गुह, निषाद, जटायु पक्षी, शबरी आदिका सहज-प्रेम नहीं था । किन्तु हे नाथ ! आपके सम्मुख आते ही बुरे वृक्ष भी उत्तम फल फलने लगते हैं ॥४॥ भाई-(बालि और रावण) के बैरसे सुग्रीव और विभीषण भारी ग्लानिसे गले जा रहे थे । हे रामजी ! आपने उन्हें किस सेवापर