भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 242

रीझकर भरतके समान मान लिया ? अर्थात् सुग्रीव और विभीषणने सेवा तो पीछे की; जब उन लोगोंने कुछ भी सेवा नहीं की थी, तभी आपने उनसे मिलकर कहा था कि 'तुम मुझे भरतके समान प्रिय हो' ॥५॥ सेवक हनुमान्‌जी (सेवा करते-करते) आपकी अनुहारि करने लगे या आपहीके समान हो गये। हे रामजी ! अब उनका नाम लेनेसे आप सबपर पूर्ण रीतिसे ढल (प्रसन्न हो) जाते हैं ॥६॥ हे नाथ ! आपकी रीति जाने बिना संसार पच-पचकर मर रहा है। किन्तु छलभाव त्यागकर आपकी शरणमें जानेपर तुलसी-जैसे जीव भी तर जाते हैं ॥७॥

विशेष (१) 'साहब अनुहरत'—यों तो हनुमान्‌जी शिवजीके अवतार हैं और शिवजी तथा रामजीमें कोई अन्तर ही नहीं है, तिसपर वह परमात्माका तात्त्विक स्वरूप भी पहचान चुके थे।

राग सूहो बिलावल [ १३५ ] राम सनेही सों तैं न सनेहु कियो। अगम जो अमरनिहूँ सो तनु तोहिं दियो ॥ दियो सुकुल जनम, सरीर सुंदर, हेतु जो फल चारिको । जो पाइ पंडित परम पद, पावत पुरारि-मुरारि को ॥ यह भरत खंड, समीप सुरसरि, थल भलो, संगति भली । तेरी कुमति कायर ! कल्प-वल्ली चहति¹ विष फलफली ॥१॥ ❊ ❊ ❊ अजहूँ समुझि चित दै सुनु परमारथ । है हित सो जगहूँ जाहिते स्वारथ ॥ स्वारथहि प्रिय, स्वारथ सो काते कौन वेद बखानई । देखु खल, अहि-खेल परिहरि, सो प्रभुहिं पहिचानई ॥ १. पाठान्तर 'चहति हैं'।