विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ विनय-पत्रिका पितु-मातु, गुरु, स्वामी, अपनपौ, तिय, तनय, सेवक, सखा। प्रिय लगत जाके प्रेमसों, बिनु हेतु हित तैं नहिं लखा ॥२॥
दूरि न सो हितू हेरु हिये ही है। छलहिं छोड़ि सुमिरे छोहु किये ही है॥ किये छोहु छाया कमल कर की भगत पर भजतहि भजै। जगदीस, जीवन जीव को, जो साज सब सबको सजै ॥ हरिहि हरिता, बिधिहिं बिधिता, सिवहिं सिवता जो दई। सोइ जानकी-पति मधुर मूरति, मोदमय मंगलमई ॥३॥
ठाकुर अतिहि बड़ो, सील, सरल, सुठि। ध्यान अगम सिवहूँ, भेंट्यो केवट उठि ॥ भरि अंक भेंट्यो सजल नयन, सनेह सिथिल सरीर सो। सुर, सिद्ध, मुनि, कवि कहत कोउ न प्रेम-प्रिय रघुवीर सो ॥ खग, सबारि, निसिचर, भालु, कपि किये आपु ते बंदित बड़े। तापर तिन्हकि सेवा सुमिरि जिय जात जनुसकुचनि गड़े॥४॥
स्वामी को सुभाउ कह्यो सो जब उर आनिहैं। सोच सकल मिटिहैं, राम भलो मन मानिहैं॥ भलो मानिहैं रघुनाथ जोरि जो हाथ माथो नाइहै ततकाल तुलसीदास जीवन-जनम को फल पाइहै॥ जपि नाम करहि प्रनाम, कहि गुन-ग्राम, रामहि धरि हिये। बिचरहिं अवनि अवनीस-चरन सरोज मन-मधुकर किये ॥५॥ शब्दार्थ—अमरनिहूँ = देवताओंको भी। सुकुल = उत्तम कुल। तनय = पुत्र। सुठि = सुन्दर। उर = हृदय। आनिहैं = लावेंगे। भावार्थ—तूने स्नेही रामसे प्रेम नहीं किया। उन्होंने तुझे वह (मनुष्य) शरीर दिया है, जो देवताओंके लिए भी दुर्लभ है। उन्होंने तुझे सुन्दर कुलमें