विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २३३ जन्म दिया है। ऐसा सुन्दर शरीर दिया है जो चारो फलों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का कारण है। जिस शरीरको पाकर पंडित (ज्ञानी) लोग शिव और कृष्णके परमपदको प्राप्त करते हैं। स्थल उत्तम है, क्योंकि यह देश भारतवर्ष है; और संगति भी अच्छी है, क्योंकि समीपमें ही देवनदी गंगाजी हैं। किन्तु रे कायर ! तेरी कुबुद्धिरूपी कल्पबेलि विषैले फल फला चाहती है ॥१॥ अब भी सोच-समझ ले और मन लगाकर परमार्थकी बात सुन। वह भलाईकी बात है अर्थात् परमार्थ सिद्ध करनेवाली है और उससे इस संसारमें भी स्वार्थ सिद्ध होता है। यदि तुझे (परमार्थ प्रिय न हो, केवल) स्वार्थ ही प्रिय है, तो वह स्वार्थ किससे प्राप्त होगा, कौन है, जिसकी वेद बड़ाई करते हैं (यह तो समझ)। रे खल ! देख, (विषयरूपी) सर्पके साथ खेलना छोड़कर उस प्रभु (श्रीरामजी) को पहचान, जिसके प्रेमके कारण पिता, माता, गुरु, स्वामी, अपना हृदय, स्त्री, पुत्र, सेवक, मित्र आदि प्रिय लगते हैं। उस अकारण हित करनेवाले (श्रीरामजी) को तूने नहीं देखा ॥२॥ तेरे वह हितू दूर नहीं हैं। वह तेरे हृदयमें ही हैं—ढूँढ़ या देख। छल छोड़कर स्मरण करनेपर वह कृपा किये बैठे हैं। अर्थात् ज्यों ही तू छल छोड़कर उनका स्मरण करेगा—तुरन्त वह तुझपर कृपा करेंगे। वह कृपा करके भक्तोंके ऊपर अपने हस्त-कमलकी छाया किये रहते हैं। वह भजते ही भजने लगते हैं; तात्पर्य, जो उन्हें भजता है, वह भी उसे भजने लगते हैं। वह जगत्के स्वामी हैं, जीवके जीवन हैं। जो सबके लिए सब साज-सामान प्रस्तुत करता है, जिसने विष्णुको विष्णुत्व (विष्णुपना), ब्रह्माको ब्रह्मापन और शिवको शिवपन प्रदान किया है, अर्थात् विष्णुको जगत्-पालनकी शक्ति, ब्रह्माको सृजनकी शक्ति और शिवको संहार-शक्ति जिसने दी है, वह जानकीनाथ श्रीरामजी ही हैं; उनकी मधुरमूर्त्ति आनन्दमयी और कल्याणमयी है ॥३॥ वह शीलमूर्त्ति, सरलमूर्त्ति और सुन्दरताकी मूर्त्ति श्रीरामजी बहुत बड़े ठाकुर (स्वामी) हैं। उनका ध्यान शिवजीको भी दुर्लभ है, (किन्तु वह इतने सरल हैं कि) उन्होंने उठकर निषाद- को हृदयसे लगा लिया। स्नेह-शिथिल शरीरसे ज्यों ही वह केवटको छातीसे लगाकर मिले, त्यों ही उनकी आँखें भर आयीं। देवता, सिद्ध, मुनि और कवि कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीके समान प्रेमप्रिय कोई भी नहीं है। (प्रेमप्रियताका ही प्रभाव है कि) उन्होंने जटायु, शबरी, राक्षस (विभीषण), रीछ (जाम्ब-