विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ विनय-पत्रिका वान) और बन्दरों-(सुग्रीव आदि) को अपनेसे भी अधिक वन्दनीय बना दिया। इसपर भी जब वह उन लोगोंकी सेवाओंका स्मरण करते हैं, तब मन-ही- मन मानों संकोचसे गड़-से जाते हैं ॥४॥ स्वामी श्रीरामजीका जो स्वभाव मैंने अभी कहा है उसे जब तू अपने हृदयमें लावेगा, तब तेरी सब चिन्ताएँ मिट जायँगी, और रामजी भी मनमें भला मानेंगे, तुझपर प्रसन्न होंगे। रघुनाथजी तो तभी प्रसन्न हो जायेंगे, जब तू हाथ जोड़कर मस्तक नवा देगा अर्थात् प्रणाम करेगा। ऐ तुलसीदास ! (उस समय) तू तत्काल ही जन्म लेनेका फल पा जायगा। तू राम-नामका जप कर, उन्हें प्रणाम कर और श्रीरामजीके स्वरूपको हृदयमें धारण करके उनकी गुणावलीका कीर्त्तन कर। तू जगदीश भगवान् रामजीके चरण-कमलोंमें अपने मन-मधुकर-(भ्रमर) को लगाकर पृथिवीपर विचरण कर ॥५॥ विशेष १—'हरिहिं...जो दई'—इसमें यह सन्देह हो सकता है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेशमें तो कोई भेद ही नहीं है, तो फिर गोस्वामीजीने ऐसा क्यों लिखा। इसका समाधान कई तरहसे किया जा सकता है। यहाँ इतना लिखना पर्याप्त है कि यह अनन्य भक्तिका लक्षण है। अनन्य भक्त चाहे वह शिवजीका उपासक हो अथवा और किसी देवताका—अपने आराध्य देवको सर्वश्रेष्ठ देखता ही है। २—'ध्यान अगम सिव हूँ'—एक बार भगवान्के स्वरूपको हृदयमें स्थित करनेके लिए भगवान् शंकरने सत्तासी हजार वर्षकी एक समाधि लगायी थी। ३—'केवट'—गुह निषाद; १०६ठे पदके 'विशेष'में देखिये। ४—'रावण'—जटायु; इसने सीताको छुड़ानेके लिए रावणसे युद्ध करके देह-त्याग किया था। रामजीने अपने पिताके समान इसका दाह-संस्कार किया था। ५—'सबरि'—१०६ ठे पदके 'विशेष'में देखिये। [ १३६ ] १ जिय जबतें हरितें बिलगान्यो । तबतें देह गेह निज जान्यो ॥ मायाबस स्वरूप बिसरायो । तेहि भ्रम ते दारुन दुख पायो ॥