विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
२२८ विनय-पत्रिका ययातिने अपने पुत्र पुरुकी तरुणावस्था माँगकर एक हजार वर्षतक खूब सुखोपभोग किया। अन्तमें उन्हें जो अनुभव हुआ, वह यह है:— न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥ —महाभारत, आदिपर्व अर्थात् 'सुखोंके उपभोगसे विषय-वासनाकी तृप्ति नहीं होती; उससे तो विषय-वासना उसी प्रकार बढ़ती है जैसे हवनके पदार्थोंसे अग्निकी ज्वाला।' [ १३३ ] तोसों हौं फिरि फिरि हित, प्रिय पुनीत सत्य वचन कहत । सुनि मन, गुनि, समुझि, क्यों न सुगम सुमग गहत ॥१॥ छोटो बड़ो, खोटो खरो, जग जो जहँ रहत । अपने अपने को भलो कहहु, को न चहत ॥२॥ बिधि लगि लघु कीट अवधि सुख सुखी, दुख दहत । पसु लौं पसुपाल ईस बाँधत छोरत नहत ॥३॥ विषय मुद निहारु भार सिर काँधे ज्यों बहत । यों ही जिय जानि, मानि सठ ! तू साँसति सहत ॥४॥ पायो केहि घृत बिचारु, हरिन—वारि महुत । तुलसी तकु ताहि सरन, जाते सब लहत ॥५॥ शब्दार्थ—लगि = से । अवधि = तक । लौं = समान । पसुपाल = अहीर, ग्वाला । नहत = नाथता है, जोतता है। निहारु = देख। महुत = मथकर । तकु = देख । लहत = प्राप्त होता है। भावार्थ—रे जीव ! मैं तुझसे फिर-फिर हितकारी, प्रिय, पवित्र और सत्य- वचन कहता हूँ। उसे तू सुनकर मनमें गौर करके (गुनकर) और समझकर सीधा रास्ता क्यों नहीं पकड़ता ॥१॥ संसारमें छोटा-बड़ा, खरा-खोटा जो जहाँ रहता है, कहो तो, उनमें ऐसा कौन है जो अपना और अपने परिवारका भला नहीं चाहता ? ॥२॥ ब्रह्मासे लेकर छोटे कीड़ेतक सुखसे सुखी और दुःखसे
विनय-पत्रिका २२९ जलते हैं, अर्थात् सुख-दुःखका प्रभाव सबपर पड़ता है। परमात्मा ग्वालेकी तरह जीवरूपी पशुओंको बाँधता है, खोलता है और जोतता है। अर्थात्, कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त जीवोंको ईश्वर जगतरूप क्रीड़ाके निमित्त उनके योग्यतानुसार भिन्न-भिन्न व्यापारमें लगाता है, विमुख रहनेवाले जीवोंको बाँधता है, सम्मुख हुए जीवोंको छोड़ता है ॥३॥ विषयोंके आनन्दको देख, वह मानों सिरके ऊपरके बोझको कन्धेपर रखता है। रे शठ ! यों ही तू हृदयमें जान और मानकर कष्ट सह रहा है। तात्पर्य, जैसे कोई सिरके ऊपरके बोझको कन्धेपर रखकर क्षणभरके लिए सुखका अनुभव करता है, और फिर जब कन्धा दुखने लगता है, तब वह उसे सिरपर रख लेता है, उसी तरह तू एक विषयसे हटकर दूसरे विषयमें फँसता, और क्षणिक सुखको आनन्द मानता है ॥४॥ सोच तो सही, मृगजल मथकर किसने घी पाया ? ऐ तुलसी ! तू उसी प्रभुकी शरण देख (शरणमें जा) जिस (प्रभु) से सब-कुछ प्राप्त होता है ॥५॥ विशेष १—'विधि लगि...बहत'—यहाँ गोस्वामीजीने यह दिखाया है कि ब्रह्मासे लेकर छोटे कीड़ेतक सुखसे सुखी और दुःखसे दुखी होते हैं, पर वे मूर्ख हैं; बुद्धिमान् तो वे हैं जो दोनों अवस्थाओंमें समान भावसे धैर्य धारण किये रहें। देखिये न, लिखा भी है:— सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ॥ —रामचरितमानस यथार्थतः सब प्राणी ईश्वराधीन हैं—कोई भी जीव स्वतन्त्र नहीं है। ऐसी दशामें सुखसे सुखी और दुःखसे दुखी होनेकी क्या जरूरत ? “नट मरकट इव सबहिं नचावत। राम खगेस बेद अस गावत ।” —रामचरितमानस न तो अपनी इच्छासे सुख ही मिलता है और न वह स्थायी रूपसे रहता ही है। सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुखका आना अनिवार्य है।
२३० विनय-पत्रिका [ १३४ ] ताते हौं बार बार देव ! द्वार परि पुकार करत । आरति, नति, दीनता कहे प्रभु संकट हरत ॥१॥ लोकपाल सोक-बिकल रावन-डर डरत । का सुनि सकुचे कृपालु नर-सरीर धरत ॥२॥ कौसिक, मुनि-तीय, जनक सोच-अनल जरत । साधन केहि सीतल भये, सो न समुझि परत ॥३॥ केवट, खग, सबरि सहज चरन-कमल न रत । सनमुख तोहिं होत नाथ ! कुतरु सुफरु परत ॥४॥ बंधु-बैर कपि-बिभीषन गुरु गलानि गरत । सेवा केहि रीझि राम, किये सरिस भरत ॥५॥ सेवक भयो पवनपूत साहिब अनुहरत । ताको लिये नाम राम सब को सुढर ढरत ॥६॥ जाने बिनु राम-रीति पचि पचि जग मरत । परिहरि छल सरन गये तुलसिहुँ-से तरत ॥७॥ शब्दार्थ—नति = नम्रता । कुतरु = बुरे वृक्ष । सुफरु = सुन्दर फल । कपि = सुग्रीव गुरु = भारी । पवन-पूत = वायुके पुत्र हनुमान्जी । अनुहरत = अनुहारि करने लगे । भावार्थ—हे देवाधिदेव ! मैं आपके द्वारपर पड़ा हुआ इसलिए बार-बार पुकार कर रहा हूँ कि आप नम्रतापूर्वक दुःख, और दीनता कहनेपर संकट हर लेते हैं ॥१॥ जब कुबेर, इन्द्र आदि लोकपाल रावणके डरसे डरकर शोक-व्याकुल हो गये थे, तब हे कृपालु ! आपने कौन-सी बात सुनकर संकोच किया था और मनुष्यशरीर धारण किया था ? ॥२॥ यह बात मेरी समझमें नहीं आती कि शोकाग्निसे जलते हुए विश्वामित्र, अहिल्या और जनक किस साधनसे शीतल हुए थे ॥३॥ आपके चरण-कमलोंमें गुह, निषाद, जटायु पक्षी, शबरी आदिका सहज-प्रेम नहीं था । किन्तु हे नाथ ! आपके सम्मुख आते ही बुरे वृक्ष भी उत्तम फल फलने लगते हैं ॥४॥ भाई-(बालि और रावण) के बैरसे सुग्रीव और विभीषण भारी ग्लानिसे गले जा रहे थे । हे रामजी ! आपने उन्हें किस सेवापर
रीझकर भरतके समान मान लिया ? अर्थात् सुग्रीव और विभीषणने सेवा तो पीछे की; जब उन लोगोंने कुछ भी सेवा नहीं की थी, तभी आपने उनसे मिलकर कहा था कि 'तुम मुझे भरतके समान प्रिय हो' ॥५॥ सेवक हनुमान्जी (सेवा करते-करते) आपकी अनुहारि करने लगे या आपहीके समान हो गये। हे रामजी ! अब उनका नाम लेनेसे आप सबपर पूर्ण रीतिसे ढल (प्रसन्न हो) जाते हैं ॥६॥ हे नाथ ! आपकी रीति जाने बिना संसार पच-पचकर मर रहा है। किन्तु छलभाव त्यागकर आपकी शरणमें जानेपर तुलसी-जैसे जीव भी तर जाते हैं ॥७॥
विशेष (१) 'साहब अनुहरत'—यों तो हनुमान्जी शिवजीके अवतार हैं और शिवजी तथा रामजीमें कोई अन्तर ही नहीं है, तिसपर वह परमात्माका तात्त्विक स्वरूप भी पहचान चुके थे।
राग सूहो बिलावल [ १३५ ] राम सनेही सों तैं न सनेहु कियो। अगम जो अमरनिहूँ सो तनु तोहिं दियो ॥ दियो सुकुल जनम, सरीर सुंदर, हेतु जो फल चारिको । जो पाइ पंडित परम पद, पावत पुरारि-मुरारि को ॥ यह भरत खंड, समीप सुरसरि, थल भलो, संगति भली । तेरी कुमति कायर ! कल्प-वल्ली चहति¹ विष फलफली ॥१॥ ❊ ❊ ❊ अजहूँ समुझि चित दै सुनु परमारथ । है हित सो जगहूँ जाहिते स्वारथ ॥ स्वारथहि प्रिय, स्वारथ सो काते कौन वेद बखानई । देखु खल, अहि-खेल परिहरि, सो प्रभुहिं पहिचानई ॥ १. पाठान्तर 'चहति हैं'।
२३२ विनय-पत्रिका पितु-मातु, गुरु, स्वामी, अपनपौ, तिय, तनय, सेवक, सखा। प्रिय लगत जाके प्रेमसों, बिनु हेतु हित तैं नहिं लखा ॥२॥
दूरि न सो हितू हेरु हिये ही है। छलहिं छोड़ि सुमिरे छोहु किये ही है॥ किये छोहु छाया कमल कर की भगत पर भजतहि भजै। जगदीस, जीवन जीव को, जो साज सब सबको सजै ॥ हरिहि हरिता, बिधिहिं बिधिता, सिवहिं सिवता जो दई। सोइ जानकी-पति मधुर मूरति, मोदमय मंगलमई ॥३॥
ठाकुर अतिहि बड़ो, सील, सरल, सुठि। ध्यान अगम सिवहूँ, भेंट्यो केवट उठि ॥ भरि अंक भेंट्यो सजल नयन, सनेह सिथिल सरीर सो। सुर, सिद्ध, मुनि, कवि कहत कोउ न प्रेम-प्रिय रघुवीर सो ॥ खग, सबारि, निसिचर, भालु, कपि किये आपु ते बंदित बड़े। तापर तिन्हकि सेवा सुमिरि जिय जात जनुसकुचनि गड़े॥४॥
स्वामी को सुभाउ कह्यो सो जब उर आनिहैं। सोच सकल मिटिहैं, राम भलो मन मानिहैं॥ भलो मानिहैं रघुनाथ जोरि जो हाथ माथो नाइहै ततकाल तुलसीदास जीवन-जनम को फल पाइहै॥ जपि नाम करहि प्रनाम, कहि गुन-ग्राम, रामहि धरि हिये। बिचरहिं अवनि अवनीस-चरन सरोज मन-मधुकर किये ॥५॥ शब्दार्थ—अमरनिहूँ = देवताओंको भी। सुकुल = उत्तम कुल। तनय = पुत्र। सुठि = सुन्दर। उर = हृदय। आनिहैं = लावेंगे। भावार्थ—तूने स्नेही रामसे प्रेम नहीं किया। उन्होंने तुझे वह (मनुष्य) शरीर दिया है, जो देवताओंके लिए भी दुर्लभ है। उन्होंने तुझे सुन्दर कुलमें
विनय-पत्रिका २३३ जन्म दिया है। ऐसा सुन्दर शरीर दिया है जो चारो फलों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का कारण है। जिस शरीरको पाकर पंडित (ज्ञानी) लोग शिव और कृष्णके परमपदको प्राप्त करते हैं। स्थल उत्तम है, क्योंकि यह देश भारतवर्ष है; और संगति भी अच्छी है, क्योंकि समीपमें ही देवनदी गंगाजी हैं। किन्तु रे कायर ! तेरी कुबुद्धिरूपी कल्पबेलि विषैले फल फला चाहती है ॥१॥ अब भी सोच-समझ ले और मन लगाकर परमार्थकी बात सुन। वह भलाईकी बात है अर्थात् परमार्थ सिद्ध करनेवाली है और उससे इस संसारमें भी स्वार्थ सिद्ध होता है। यदि तुझे (परमार्थ प्रिय न हो, केवल) स्वार्थ ही प्रिय है, तो वह स्वार्थ किससे प्राप्त होगा, कौन है, जिसकी वेद बड़ाई करते हैं (यह तो समझ)। रे खल ! देख, (विषयरूपी) सर्पके साथ खेलना छोड़कर उस प्रभु (श्रीरामजी) को पहचान, जिसके प्रेमके कारण पिता, माता, गुरु, स्वामी, अपना हृदय, स्त्री, पुत्र, सेवक, मित्र आदि प्रिय लगते हैं। उस अकारण हित करनेवाले (श्रीरामजी) को तूने नहीं देखा ॥२॥ तेरे वह हितू दूर नहीं हैं। वह तेरे हृदयमें ही हैं—ढूँढ़ या देख। छल छोड़कर स्मरण करनेपर वह कृपा किये बैठे हैं। अर्थात् ज्यों ही तू छल छोड़कर उनका स्मरण करेगा—तुरन्त वह तुझपर कृपा करेंगे। वह कृपा करके भक्तोंके ऊपर अपने हस्त-कमलकी छाया किये रहते हैं। वह भजते ही भजने लगते हैं; तात्पर्य, जो उन्हें भजता है, वह भी उसे भजने लगते हैं। वह जगत्के स्वामी हैं, जीवके जीवन हैं। जो सबके लिए सब साज-सामान प्रस्तुत करता है, जिसने विष्णुको विष्णुत्व (विष्णुपना), ब्रह्माको ब्रह्मापन और शिवको शिवपन प्रदान किया है, अर्थात् विष्णुको जगत्-पालनकी शक्ति, ब्रह्माको सृजनकी शक्ति और शिवको संहार-शक्ति जिसने दी है, वह जानकीनाथ श्रीरामजी ही हैं; उनकी मधुरमूर्त्ति आनन्दमयी और कल्याणमयी है ॥३॥ वह शीलमूर्त्ति, सरलमूर्त्ति और सुन्दरताकी मूर्त्ति श्रीरामजी बहुत बड़े ठाकुर (स्वामी) हैं। उनका ध्यान शिवजीको भी दुर्लभ है, (किन्तु वह इतने सरल हैं कि) उन्होंने उठकर निषाद- को हृदयसे लगा लिया। स्नेह-शिथिल शरीरसे ज्यों ही वह केवटको छातीसे लगाकर मिले, त्यों ही उनकी आँखें भर आयीं। देवता, सिद्ध, मुनि और कवि कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीके समान प्रेमप्रिय कोई भी नहीं है। (प्रेमप्रियताका ही प्रभाव है कि) उन्होंने जटायु, शबरी, राक्षस (विभीषण), रीछ (जाम्ब-
२३४ विनय-पत्रिका वान) और बन्दरों-(सुग्रीव आदि) को अपनेसे भी अधिक वन्दनीय बना दिया। इसपर भी जब वह उन लोगोंकी सेवाओंका स्मरण करते हैं, तब मन-ही- मन मानों संकोचसे गड़-से जाते हैं ॥४॥ स्वामी श्रीरामजीका जो स्वभाव मैंने अभी कहा है उसे जब तू अपने हृदयमें लावेगा, तब तेरी सब चिन्ताएँ मिट जायँगी, और रामजी भी मनमें भला मानेंगे, तुझपर प्रसन्न होंगे। रघुनाथजी तो तभी प्रसन्न हो जायेंगे, जब तू हाथ जोड़कर मस्तक नवा देगा अर्थात् प्रणाम करेगा। ऐ तुलसीदास ! (उस समय) तू तत्काल ही जन्म लेनेका फल पा जायगा। तू राम-नामका जप कर, उन्हें प्रणाम कर और श्रीरामजीके स्वरूपको हृदयमें धारण करके उनकी गुणावलीका कीर्त्तन कर। तू जगदीश भगवान् रामजीके चरण-कमलोंमें अपने मन-मधुकर-(भ्रमर) को लगाकर पृथिवीपर विचरण कर ॥५॥ विशेष १—'हरिहिं...जो दई'—इसमें यह सन्देह हो सकता है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेशमें तो कोई भेद ही नहीं है, तो फिर गोस्वामीजीने ऐसा क्यों लिखा। इसका समाधान कई तरहसे किया जा सकता है। यहाँ इतना लिखना पर्याप्त है कि यह अनन्य भक्तिका लक्षण है। अनन्य भक्त चाहे वह शिवजीका उपासक हो अथवा और किसी देवताका—अपने आराध्य देवको सर्वश्रेष्ठ देखता ही है। २—'ध्यान अगम सिव हूँ'—एक बार भगवान्के स्वरूपको हृदयमें स्थित करनेके लिए भगवान् शंकरने सत्तासी हजार वर्षकी एक समाधि लगायी थी। ३—'केवट'—गुह निषाद; १०६ठे पदके 'विशेष'में देखिये। ४—'रावण'—जटायु; इसने सीताको छुड़ानेके लिए रावणसे युद्ध करके देह-त्याग किया था। रामजीने अपने पिताके समान इसका दाह-संस्कार किया था। ५—'सबरि'—१०६ ठे पदके 'विशेष'में देखिये। [ १३६ ] १ जिय जबतें हरितें बिलगान्यो । तबतें देह गेह निज जान्यो ॥ मायाबस स्वरूप बिसरायो । तेहि भ्रम ते दारुन दुख पायो ॥
पायो जो दारुन दुसह दुख, सुख लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो। भव-सूल, सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो॥ बहु जोनि जनम, जरा-बिपत्ति, मतिमन्द ! हरि जान्यो नहीं। श्री राम बिनु विश्राम मूढ़ ! विचारु, लखि पायो कहीं ॥ २ आनंद-सिंधु-मध्य तव वासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥ मृग-भ्रम वारि सत्य जिय जानी। तहँ तू मगन भयो सुख मानी ॥ तहँ मगन मज्जसि, पान करि, त्रयकाल जल नाहीं जहाँ। निज सहज अनुभव रूप तव खल ! भूलि अब आयो तहाँ ॥ निरमल निरञ्जन, निर्विकार, उदार सुख तैं परिहरयो। निःकाज राज बिहाय नृप इव सपन कारागृह परयो ॥ ३ तैं निज करम-डोरि दृढ़ कीन्हीं। अपने करनि गाँठि गँहि दीन्हीं ॥ ताते परबस परयो अभागे। ता फल गरभ-बास-दुख आगे ॥ आगे अनेक समूह संसृति उदरगत जान्यो सोऊ। सिर हेठ, ऊपर चरन, संकट बात नहिं पूछै कोऊ ॥ सोनित-पुरीष, जो मूत्र-मल कृमि-कर्द्दमावृत सोवई। कोमल सरीर, गंभीर वेदन, सीस धुनि-धुनि रोवई ॥ ४ तू निज करम-जाल जहँ घेरो। श्री हरि संग तज्यो नहिं तेरो ॥ बहु बिधि प्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ग्यान तोहि दीन्हों॥ तोहि दियो ज्ञान-विवेक, जनम अनेक की तव सुधि भई। तेहि ईस की हौं सरन, जाकी विषम माया गुनमई ॥ जेहि किये जीव-निकाय बस रस-हीन, दिन-दिन अति नई। सो करौ बेगि सँभार श्रीपति, विपति महँ जेहि मति दई ॥ ५ धुनि बहु विधि गलानि जिय मानी। अब जग जाइ भजौं चक्रपानी ॥ ऐसेहि करि विचारि चुप साधी। प्रसव-पवन प्रेरेउ अपराधी ॥
२३६ विनय-पत्रिका प्रेरथो जो परम प्रचण्ड मारुत, कष्ट नाना तैं सह्यो । सो ग्यान, ध्यान, विराग अनुभव जातना पावक दह्यो ॥ अति खेद ब्याकुल, अल्प बल, छिन एक बोलि न आवई । तव तीव्र कष्ट न जान कोउ, सब लोग हरषित गावई ॥ ६ बाल-दसा जेते दुख पाये । अति असीम, नहिं जाहिं गनाये ॥ छुधा-व्याधि-बाधा भइ भारी । वेदन नहिं जानै महतारी ॥ जननी न जानै पीर सो, केहि हेतु सिसु रोदन करै । सोइ करै विविध उपाय, जातें अधिक तुव छाती जरै ॥ कौमार, सैसव अरु किशोर अपार अघ को कहि सकै । व्यतिरेक तोहि निर्दय ! महाखल ! आन कहु को सहि सकै॥ ७ जोबन जुवती सँग रँग रात्यो । तब तू महा मोह-मद मात्यो ॥ ताते तजी धरम-मरजादा । बिसरे तब सब प्रथम विषादा ॥ बिसरे विषाद, निकाय-संकट समुझि नहिं फाटत हियो । फिरि गर्भगत-आवर्त्त संसृति चक्र जेहि होइ सोइ कियो ॥ कृमि-भस्म-बिट-परिनाम तनु, तेहि लागि जग बैरी भयो । परदार, परधन, द्रोह पर, संसार बाढ़ै नित नयो ॥ ८ देखत ही आई विरुधाई । जो तैं सपनेहुँ नाहिं बुलाई ॥ ताके गुन कछु कहे न जाहीं । सो अब प्रगट देखु तन माहीं ॥ सो प्रगट तनु जरजर जरावस, व्याधि, सूल सतावई । सिर-कंप, इंद्रिय-सक्ति प्रतिहत, वचन काहु न भावई ॥ गृहपालहूतें अति निरादर, खान-पान न पावई । ऐसिहु दसा न विराग तहँ, तृष्णा-तरंग बढ़ावई ॥ ९ कहि को सकै महाभव तेरे । जनम एक के कछुक गनेरे ॥ चारि खानि संतत अवगाहीं । अजहुँ न करु विचार मन माहीं ॥
विनय-पत्रिका २३७ अजहूँ विंचारु, विकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं । भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुर-नायकं ॥ बिनु हेतु करुनाकर, उदार, अपार-माया-तारनं। कैवल्य-पति, जगपति, रमापति, प्रानपति, गतिकारनं ॥ १० रघुपति-भगति सुलभ, सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी बिनु सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिलैं द्रवै जब सोई ॥ जब द्रवैं दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये। जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ॥ जिनके मिले दुख-सुख समान, अमानतादिक गुन भये। मद-मोह-लोभ-विषाद-क्रोध सुबोध तें सहजहिं गये ॥ ११ सेवत साधु द्वैत-भय भागै । श्री रघुवीर-चरन लौ लागै ॥ देह-जनित विकार सब त्यागै। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै ॥ अनुराग सो निज रूप जो जगतें बिलच्छन देखिये। संतोष, सम, सीतल सदा दम, देहवंत न लेखिये ॥ निरमल, निरामय, एक रस, तेहि हरष-सोक न व्यापई। त्रैलोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी भई ॥ १२ जो तेहि पंथ चलै मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई ॥ जो मारग श्रुति-साधु दिखावैं। तेहि पथ चलत सबै सुख पावैं ॥ पावै सदा सुख हरि-कृपा, संसार आसा तजि रहै। सपनेहुँ नहीं दुख द्वैत-दरसन, बात कोटिक को कहै ॥ द्विज, देव, गुरु, हरि संत बिनु संसार-पार न पाइये। यह जानि तुलसीदास त्रास हरन रमापति गाइये ॥ शब्दार्थ—विलगान्यो = अलग हुआ। जरा = बुढ़ापा। मज्जसि = स्नान कर रहा है। संसृति = संसार। हेठ = नीचे। शोनित = रक्त। पुरीष = मल, विष्ठा। कर्दमावृत = कीचसे ढँका हुआ। निकाय = समूह। सिसु = बालक। व्यतिरेक = अतिरिक्त, सिवा। रात्यो = फँस
२३८ विनय-पत्रिका गया । आवर्त्त = गढ़ा, जन्म-मरणके चक्करमें घूमना । विट = मल । प्रतिहत = नष्ट । गृहपाल = कुत्ता । महाभव = महाजन्म । १ भावार्थ—हे जीव ! जबसे तू परमात्मासे अलग हुआ (अर्थात्, जबतक तू परमात्माके स्वरूपमें स्थित था, तबतक तेरा जीव नाम नहीं पड़ा था; किन्तु जब- से अविद्याके आवरण द्वारा तू भगवान्से पृथक् हुआ), तबसे तेरा जीव नाम पड़ गया और तभीसे तूने इस शरीरको ही अपना घर समझ लिया । तूने मायाके वश होकर अपने असली सत्-चित्-आनन्दस्वरूपको भुला दिया, और उसी भ्रमके कारण तुझे (जन्म-मरणरूप) भयंकर दुःख हुआ । जो भयंकर और असह्य दुःख तुझे भोगना पड़ा, उसमें स्वप्नमें भी सुखका लेशमात्र न रहा । तू हठपूर्वक उस मार्गसे चलता रहा, जिसमें संसारके शूल (गर्भवास) और अनेक शोक भरे पड़े हैं । रे मन्दबुद्धि ! बहुत-सी योनियोंके जन्म और बुढ़ापेकी विपत्तियाँ तुझे झेलनी पड़ीं, फिर भी तूने श्रीरामजीको न पहचाना । रे मूढ़ ! विचारकर देख, श्रीरामजीके बिना तुझे और कहीं शान्ति मिली ? २ रे जीव ! तेरा निवास आनन्दके समुद्रमें है, अर्थात् तू आनन्दस्वरूप परब्रह्मसे भिन्न नहीं है । तू बिना जाने (अज्ञानवश) क्यों प्यासा मर रहा है ? तूने मृग-तृष्णाके जल-(इन्द्रिय-विषयों) को सत्य मान लिया, और उसीमें सुख मानकर मग्न हो गया । वहीं तू डूबकर (विषयोंका ध्यान कर) नहा रहा है, और उसीको पी रहा है, जहाँ तीनों कालमें जल (सुख) नहीं अर्थात् विषयोंमें न तो कभी सुख था, न है, और न रहेगा । रे खल ! अब तू अपने सहज अनुभव-रूपको भूलकर वहीं (जहाँ त्रिकालमें जल नहीं) आ पड़ा है । अर्थात् अपने सच्चिदानन्दरूपको भूलकर अब तू अपनेको शरीररूप मान रहा है । तूने विशुद्ध, अविनाशी, षट्-विकार-(जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय, नाश) रहित परम सुखको त्याग दिया । तेरी वही दशा है जैसे कोई राजा व्यर्थ ही स्वप्नमें राज छोड़कर कारागृहमें पड़ा हो । ३ तूने अपनी कर्मरूपी डोरीको मजबूत कर ली और अपने हाथोंसे (अज्ञानसे)
विनय-पत्रिका २३९ कसकर गाँठ लगा दी। अभागे ! इसीसे तू परतंत्र पड़ा हुआ है। उसका फल गर्भवासका दुःख है जोकि तेरे आगे है। आगे (गर्भवासमें) जो अनेक दुःखोंके समूह हैं, वे माताके पेटमें पड़े हुए प्राणीको ज्ञात हैं, (गर्भमें) सिर तो नीचे रहता है और पैर ऊपर। इस संकटकालमें कोई बात भी नहीं पूछता। रक्त, विष्ठा, मूत्र, मल, कृमि और कीचसे ढँका हुआ (गर्भमें) सोता है। उस समय तेरा शरीर तो कोमल रहता है, पर वेदना (पीड़ा) अत्यधिक सहनी पड़ती है। इससे तू सिर धुन-धुनकर रोता है। ४ जहाँ-जहाँ तू अपने कर्म-जालमें घिरा, वहाँ-तहाँ भगवान् तेरे साथ रहे। प्रभुने हर प्रकारसे तेरा पालन-पोषण किया, और उस परम कृपालुने तुझे ज्ञान भी दिया। जब परमात्माने ज्ञान और विवेक दिया, तब तुझे पिछले अनेक जन्मोंका स्मरण हुआ। फिर तो कहने लगा कि 'मैं उस ईश्वरकी शरणमें हूँ जिसकी यह त्रिगुणात्मिका माया अत्यन्त दुस्तर है। जिस (माया) ने जीव- समुदायको अपने वशमें कर रखा है, जिसने जीवोंको रसहीन (आनन्द-रहित) बना रखा है और जो दिनपर दिन अत्यन्त नयी दिखाई देती है, उस मायासे हे लक्ष्मीनारायण ! मेरी शीघ्र रक्षा कीजिये; क्योंकि आपनेही तो इस विपत्तिकालमें (गर्भमें) बुद्धि दी है।' ५ फिर तू अपने मनमें बहुत तरहकी ग्लानि मानकर कहने लगा कि अब मैं संसारमें जाकर या जन्म लेकर चक्रपाणि भगवान्का भजन करूँगा। ऐसा विचारकर ज्यों ही तूने चुप्पी साधी, त्यों ही प्रसवकालकी वायुने तुझ अपराधीको प्रेरित किया। उस परम प्रचंड वायुके प्रेरणा करनेपर तुझे अनेक तरहके कष्ट सहन करने पड़े। फिर क्या था, तेरा वह ज्ञान, ध्यान, वैराग्य और अनुभव (सब जन्मकालकी) यातनाकी आगमें जल-भुन गया, अर्थात् असह्य कष्टमें तू सब भूल गया। (जन्म होनेपर) अत्यन्त कष्टके कारण व्याकुल होने, तथा थोड़ा बल रहनेके कारण एक क्षणतक बोल नहीं आया। उस समयके तेरे तीव्र कष्टको किसीने न जाना, उलटा सब लोग हर्षित होकर गाने लगे।
२४० विनय-पत्रिका ६ बाल्यावस्थामें तुझे जितने दुःख मिले, वे इतने अधिक हैं कि गिनाये नहीं जा सकते। क्षुधा और रोगकी भारी बाधा खड़ी हुई। तेरी वेदनाको माताने न जाना। तेरी उस पीड़ाको माता नहीं जान पाती कि बच्चा किस कारणसे रो रहा है। वह (तेरे हितकी दृष्टिसे) अनेक तरहके ऐसे उपाय (उलटा उपचार) करती है, जिससे तेरी छाती अधिकाधिक जलती है। शैशव, कौमार और किशोरावस्थाके तेरे अपार अघों (दुःखों) को कौन कह सकता है ? रे निर्दय ! महाखल ! तू ही कह, कि (उन दुःखोंको) तेरे अतिरिक्त दूसरा कौन सह सकता है ? ७ उसके बाद तेरा यौवनकाल आया। तब तू महान् मोहके मदमें मतवाला हो गया और युवतीके साथ रस-रंगमें फँस गया। इससे तूने धर्मकी मर्यादा छोड़ दी। उस समय तू पहलेके सब दुःखोंको भूल गया। पिछले दुःखोंके भूल जाने और आगेके संकटोंको समझकर तेरी छाती नहीं फट जाती ? फिर तूने वही काम किया जिससे तुझे गर्भगत आवर्त्तमें (गर्भवास होना, जन्म होना, मरण होना इस प्रकार घूमना, अथवा गर्भके गढ़ेमें) या संसारचक्रमें पड़नेकी नौबत आवे। जिस शरीरका (अन्तिम) परिणाम कृमि होना, राख होना या बीट (मल) होना है, (अर्थात्, मरनेके बाद यदि शरीर सड़ जाता है तो कीड़ोंके रूपमें बदल जाता है, जला दिया जाता है तो राखके रूपमें हो जाता है और यदि जीव-जन्तु खा जाते हैं तो विष्ठा बन जाता है), उसीके लिए तू संसारका बैरी बना। दूसरेकी स्त्री, दूसरेके धन का लोभ तथा दूसरोंसे द्रोह यही सब संसारमें प्रतिदिन नया-नया बढ़ता जाता है। ८ देखते ही देखते बुढ़ापा आ गया। जिस बुढ़ापेको तूने स्वप्नमें भी नहीं बुलाया था उस बुढ़ापेके गुण कुछ भी नहीं कहे जा सकते। उसके गुणोंको अब तू अपने शरीरमें ही प्रकट रूपसे (प्रत्यक्ष) देख ले। वे गुण प्रत्यक्ष हैं। वृद्धावस्थाके कारण शरीर जर्जर हो गया है, रोग और शूल सता रहे हैं, सिर हिल रहा है, इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट हो गयी है, तेरा बोलना किसीको नहीं भाता।
विनय-पत्रिका २४१ कुत्तेसे भी बढ़कर तेरा निरादर होने लगा, अन्न-जल भी (समयसे) नहीं मिलता। ऐसी दशामें भी तुझे उससे विराग नहीं हो रहा है और तू तृष्णाकी तरंगोंको बढ़ाता जा रहा है। ९ तेरे महान् संसार, अथवा अनेक जन्मों और अनेक योनियोंकी बातें कौन कह सकता है ? यह तो एक जन्मकी कुछ बातें गिनायी गयी हैं। सदैव चार खानों-(अंडज, जैसे पक्षी आदि; पिंडज, जो गर्भसे उत्पन्न होते हैं जैसे मनुष्य, पशु आदि; स्वेदज, जैसे खटमल जुएँ आदि; उद्भिज्ज, जैसे वृक्ष आदि) में जन्म ग्रहण करना या घूमना पड़ता है। अब भी तू मनमें विचार नहीं कर रहा है। अब भी तू विचार कर और विकारोंको छोड़कर भक्तोंको आनन्द देनेवाले श्रीरामजीको भज। दुस्तर संसार-सागरके लिए जलयान (नाव) रूपी चक्र सुदर्शनधारी देवाधिदेव भगवान् रामचन्द्रजीका भजन कर। वह अकारण ही करुणा करनेवाले, उदार और अपार मायासे उद्धार करनेवाले हैं। वह कैवल्यके स्वामी अर्थात् मोक्ष-दाता, जगत्के स्वामी, लक्ष्मीजीके पति, प्राणनाथ और सुगतिके कारण हैं। १० श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुलभ और सुखदायिनी है। वह तीनों तापों, शोक और भयको हरनेवाली है। किन्तु वह भक्ति बिना सत्संगके पैदा नहीं होती, और संतजन तब मिलते हैं जब वह (श्रीरामजी) द्रवित होते हैं। जब दीनदयालु राघव कृपा करते हैं, तब ऐसे साधु-महात्माओंकी संगति प्राप्त होती है, जिनके दर्शनसे, स्पर्शसे और समागम आदिसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं, जिनके मिलनेसे सुख और दुःख समान प्रतीत होने लगते हैं तथा अमानता आदि सद्गुण पैदा हो जाते हैं। फिर तो सुबोध अर्थात् आत्मज्ञान हो जाता है और उसके प्रभावसे मद, मोह, लोभ, शोक, क्रोध आदि सहजहीमें दूर हो जाते हैं। सारांश, सत्संगके प्रभावसे जीवन ही धन्य हो जाता है। ११ साधु-सेवा करते ही द्वैतका भय भाग जाता है ('सर्वं खल्विदं ब्रह्म' भान हो जाता है), और श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें ध्यान लग जाता है। जब शरीरसे १६
२४२ विनय-पत्रिका उत्पन्न होनेवाले सब विकारोंको छोड़ दे, तब जाकर अपने स्वरूपमें प्रेम होता है। जिसे अपने स्वरूपमें अनुराग है, वह संसारमें विलक्षण दिखाई देता है। उसे सदा सन्तोष, समता और शान्ति रहती है तथा उसके मन एवं इन्द्रियोंका निग्रह स्वाभाविक ही हो जाता है। फिर तो वह देहधारी समझा ही नहीं जाता; वह विशुद्ध, नीरोग, आधि-व्याधि-रहित, एकरस हो जाता है; उसे हर्ष और शोक नहीं व्यापता। जिसकी सदैव ऐसी दशा हो गयी, वह तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है। १२ जो मनुष्य इस मार्गपर मन लगाकर चलता है, उसकी सहायता प्रभुजी क्यों न करेंगे? जिस मार्गको वेदों और संतोंने दिखाया है, उस मार्गपर चलने- से सब लोग सुख पाते हैं। वे ईश्वरकी कृपासे नित्यानन्द प्राप्त करते हैं, और सांसारिक भावनाओंको छोड़ देते हैं। (मूल बात यह है कि) उसे स्वप्नमें भी द्वैतके दुःखका दर्शन नहीं होता, करोड़ों बातें कौन कहे। ब्राह्मण, देवता, गुरु, हरि और संतोंके बिना संसार-सागरको पार करना असम्भव है। यही समझकर तुलसीदास भव-भयहारी लक्ष्मीनारायण भगवान्के गुण गाता है। विशेष १—'जिय'—जीव और ईश्वर क्या हैं, इस विषयमें अद्वैतवादमें कई मत हैं। उनमें प्रत्येकके मतकी परिभाषा नीचे लिखी जाती है। इससे पाठक- गण समझ सकेंगे कि अद्वैतके ही अन्तर्गत भिन्न-भिन्न आचार्योंके विचारमें कितना सूक्ष्म अन्तर है। अवच्छेदवाद—जब शुद्ध चेतन ब्रह्मके साथ मायाका विशेषण लगता है, तो वह ईश्वर कहलाता है, और जब उसके साथ अविद्याका विशेषण लगता है, तो वह जीव कहलाता है। किन्तु अवच्छेदवादके दूसरे मतके अनुसार, जब चेतनका विशेषण अन्तःकरण होता है, तो वह जीव है, और जब अन्तःकरण उसका विशेषण नहीं है, तो वह ईश्वर है। अवच्छेदका अर्थ है, पृथक् करना, सीमा बाँधना। आभासवाद—इस सिद्धान्तमें शुद्ध चेतनाका जो आभास माया, अविद्या,
विनय-पत्रिका २४३ अन्तःकरण, बुद्धि अथवा अज्ञानमें पड़ता है, उसके कारण ईश्वर और जीवके रूप कई तरहके माने गये हैं। आभास मिथ्या होता है, अतः ईश्वर और जीवके रूप भी मिथ्या हैं। इस मतके अनुसार ईश्वर और जीवके रूप ये हैं— शुद्ध चेतन और मायामें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। अविद्या, अविद्याका अधिष्ठान कूटस्थ, और कूटस्थका अविद्यामें आभास जीव है। बुद्धि-वासना- विशिष्ट अज्ञानमें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। अन्तःकरण, अन्तःकरणका अधिष्ठान कूटस्थ, और कूटस्थका अन्तःकरणमें आभास जीव है। शुद्ध चेतन और मायामें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। बुद्धि, बुद्धिका अधिष्ठान कूटस्थ और कूटस्थका बुद्धिमें आभास जीव है। अथवा बुद्धिका अधिष्ठान कूटस्थ, और बुद्धिमें ब्रह्मका आभास जीव है। अथवा अज्ञानका अधिष्ठान कूटस्थ और कूटस्थका अज्ञानमें आभास जीव है। समष्टि बुद्धि वासना-विशिष्ट अज्ञानमें चेतनका आभास ईश्वर है। अन्तःकरणमें चेतनका आभास जीव है। प्रतिबिम्बवाद—दर्पणमें जो मुखका प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, वह मुखका प्रतिबिम्ब है। प्रतिबिम्ब तो मिथ्या नहीं है, पर बिम्ब मुखमें ही प्रति- बिम्बकी प्रतीति भ्रमरूप है। तात्पर्य यह कि बिम्ब और प्रतिबिम्ब एक ही हैं। इसी प्रकार माया और अविद्यामें जो ब्रह्मका प्रतिबिम्ब दिखता है, वह और ब्रह्म एक ही हैं। प्रतिबिम्बवादके कई भेद हैं। १—शुद्ध चेतनके आश्रित मूल- प्रकृतिमें चेतनका प्रतिबिम्ब ईश्वर है। अविद्या-रूप अनेक अंशोंमें चेतनके अनेक अनन्त प्रतिबिम्ब जीव हैं, और आवरण-शक्ति विशिष्ट मूल-प्रकृतिके अंशोंको अविद्या कहते हैं। २—मायामें चेतनका प्रतिबिम्ब ईश्वर, और अविद्यामें चेतनका प्रतिबिम्ब जीव है। यहाँपर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मूलप्रकृतिके दो रूप हैं—माया और अविद्या। शुद्ध सत्त्व-प्रधान माया है, जिसमें विक्षेप- शक्तिकी प्रधानता है और मलिन-सत्त्व-प्रधान अविद्या है जिसमें आवरण- शक्तिकी प्रधानता है। ईश्वर सर्वज्ञ है और जीव अल्पज्ञ। ३—अविद्यामें चेतनका प्रतिबिम्ब .ईश्वर है, और अन्तःकरणमें चेतनका प्रतिबिम्ब जीव है। (यहाँ अविद्याका अर्थ अज्ञान है) ४—अज्ञानोपहत बिम्ब ईश्वर है, और अज्ञानमें प्रतिबिम्ब जीव है। एकजीव-वाद—अद्वैत-मतमें आत्मा एक है, और जीव अनेक। जीवोंका
२४४ विनय-पत्रिका ही आवागमन होता है । इन्हींको पिछले कर्मोंका फल भोगना पड़ता है । कुछ वेदान्तियोंके मतमें आत्मा और जीव दोनों ही एक हैं । अन्य जीव, जीवाभास अर्थात् भ्रम-मात्र हैं । इस पक्षका कथन है कि ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे जीव हो गया है । वही ईश्वरकी कल्पना कर लेता है । न तो जीव अवच्छेदरूप है और न आभास या प्रतिबिम्बरूप ही । ब्रह्ममें जो कल्पित अज्ञानसे जीवभाव उत्पन्न हुआ है, वह ठीक वैसे ही है, जैसे कुन्तीका पुत्र कर्ण अज्ञानके कारण अपनेको दासी-पुत्र समझता था । ब्रह्मने ही अज्ञानसे जीव बनकर ईश्वरको भी उत्पन्न कर लिया है । या यों भी कहा जा सकता है कि शुद्ध चेतन ब्रह्म अपने आश्रित अज्ञानकी उपाधिके कारण जीवरूप हुआ है । इसी एक जीवने अपने विषयमें नाना जीवों, ईश्वर और जगत् प्रपंचकी कल्पना कर ली है । इस मतमें भी निम्नलिखित भेद हैं:— क—जीव एक है, अनेक नहीं । सजीव शरीर एक ही है । जो अन्य शरीर दिखाई देते हैं; वे स्वप्नके शरीरोंके समान निर्जीव हैं । ख—ब्रह्म जीव नहीं है, ब्रह्मका प्रतिबिम्ब-रूप हिरण्यगर्भ एक मुख्य जीव है । बिम्ब ब्रह्म उससे भिन्न है । इसी हिरण्यगर्भने जगत्की रचना की है । हिरण्यगर्भका शरीर इस मुख्य जीवसे सजीव है और दूसरे शरीर जीवाभास- रूप जीवोंसे सजीव हैं । ग—अविद्यामें ब्रह्मका प्रतिबिम्ब ही जीव है और अविद्याके एक होनेसे वह एक है । वह जीव भोगके लिए सब शरीरोंको आश्रय देता है । उसी जीव- के प्रतिबिम्ब अन्य सब जीव हैं । इन प्रतिबिम्बाभास-रूप जीवोंसे अन्य सब शरीर सजीव हैं । नानाजीव-वाद—इस मतमें भी कई भेद हैं । अ—अन्तःकरण अनेक हैं, अतः जीव भी अनेक हैं । कारण, जीवोंमें अन्तःकरण आदि उपाधियाँ होती हैं । अन्तःकरणोंका उपादानमूला-ज्ञान एक है; वह शुद्ध ब्रह्मके आश्रित है, ब्रह्मको ही विषय किये हुए है और उसकी निवृत्ति ही मोक्ष है । इसके स्पष्ट रूपसे ये भेद हैं:— क—मायावच्छिन्न चेतन ईश्वर है । अज्ञानके नाना अंशोंसे अवच्छिन्न चेतन नाना जीव हैं ।
विनय-पत्रिका २४५ ख—अविद्यावच्छिन्न चेतन ईश्वर है। नानान्तःकरणावच्छिन्न चेतन नानाजीव हैं। ग—समष्टि अज्ञानावच्छिन्न चेतन ईश्वर है। नाना अज्ञानांशसे सम्बन्ध- युक्त चेतन नाना मत उपाधिवाले जीव हैं। घ—समष्टि अविद्या उपाधिवाला ईश्वर है। अनेक अविद्यांश उपाधिवाला चेतन जीव है। इस अद्वैतवादमें वार्त्तिककारके मतसे जीव और ईश्वरके लक्षण ये हैं:— मूलाज्ञान-विशिष्ट चेतन ईश्वर है। तूलाज्ञान-विशिष्ट चेतन जीव है। मूलाज्ञान सामान्य अज्ञान है। यह एक है, अतः ईश्वर भी एक है। तूलाज्ञान विशेष अज्ञान है। यह नाना है, अतः जीव भी नाना हैं। यह स्मरण रहे कि केवल आभास या प्रतिबिम्ब जीव नहीं है, बल्कि उपाधि सहित चिदाभास या प्रतिबिम्ब और अधिष्ठान चेतन, दोनों मिलकर जीव हैं। जीव अल्पज्ञ, अल्पशक्तिमान् और पराधीन है। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्व- शक्तिमान और स्वतन्त्र हैं। जीवकी सात अवस्थाएँ हैं। अज्ञान, आवरण, भ्रान्ति, द्विविधज्ञान, शोक, नाश और अतितृप्तं । इस प्रकार शास्त्रोंमें जीव और ईश्वरके लक्षण पाये जाते हैं। गोस्वामीजी किस मतके अनुयायी थे, इसका विस्तृत उल्लेख अन्यत्र किया गया है। जीव और ईश्वरका विस्तृत विवरण देनेसे पाठकगण विचार कर सकेंगे कि गोस्वामी- जीके ग्रन्थोंमें किस 'वाद' का आभास पाया जाता है। इस पदमें गोस्वामीजीके सिद्धान्तकी झलक भली भाँति दिखलाई पड़ती है। यों तो विनयपत्रिकाके प्रत्येक पद अपूर्व हैं, पर यह पद हर मनुष्यके लिए कण्ठस्थ करने योग्य है। २—'छिन एक बोलि न आवई'—वियोगी हरिजीने इसका अर्थ लिखा है, 'एक क्षण भर भी तुझसे न बोलते बना।' किन्तु कबतक बोलते न बना, कुछ पता नहीं। वास्तवमें बात यह है कि नवजात शिशु माताके गर्भसे बाहर निकलने या पैदा होनेके बाद प्रसव-पीड़ासे बेहोश रहनेके कारण थोड़ी देरतक रोता भी नहीं। उसीके लिए गोस्वामीजीने लिखा है, 'छिन एक बोलि न आवई', इसका अर्थ है, एक क्षणतक बोल नहीं आता (रोता भी नहीं)। ३—'कौमार···सकै'—इसका अर्थ भी उक्त टीकाकारने किया है, 'कुमारा-
२४६ । विनय-पत्रिका 'वस्था, बचपन और किशोरावस्थामें तूने कितने अनन्त, अगणित, पाप किये हैं, इसका वर्णन करना सामर्थ्यके बाहर है।' किन्तु शास्त्रकारोंने यह कहा है कि पाँच वर्षकी अवस्थातक पुण्य और पाप लगता ही नहीं। फिर यह कैसी बात है ? यहाँ 'अघ'का अर्थ 'पाप' नहीं बल्कि दुःख है। यथार्थ अर्थ पाठकगण इस टीकामें देख लें। अथवा यदि 'अघ' का अर्थ 'पाप' ही ग्राह्य हो, तो इसका अर्थ इस प्रकार किया जाना संगत हो सकता है:—'कौमार, शैशव और किशोर अवस्था कितना घोर पाप है अथवा कितने घोर पापका फल है, इसे कौन कह सकता है?' ४—'सोइ······छाती जरै'—का अर्थ आप करते हैं—'किन्तु वह बराबर वही उपाय करती है, जिससे तेरी छाती और जलै'। खूब ! माता अपने नव- जात-शिशुकी छाती जलानेके लिए उपाय करती है, यह वियोगी हरिजीकी नयी सूझ है। किन्तु महाराज ! यहाँ तो आप विनयपत्रिकाकी टीका लिखने बैठे हैं, फिर आप अपनी नयी सूझका नमूना क्यों दिखाने लगे ! गोस्वामीजीके शब्द तो यह नहीं कहते कि माता अपने बच्चेकी छाती जलाती है । वे तो यह कह रहे हैं कि 'वह (तेरे हितकी दृष्टिसे) अनेक तरहके ऐसे उपाय करती है, जिससे तेरी छाती अधिकाधिक जलती है।' तात्पर्य, माता यत्न तो करती है बच्चेको सुख पहुँचानेके लिए, पर उससे उसे होता है और अधिक कष्ट । राग बिलावल [ १३७ ] जो पै कृपा रघुपति कृपालु की, बैर और के कहा सरै। होइ न बाँको बार भगत को, जो कोउ कोटि उपाय करै ॥१॥ तकै नीचु जो मीचु साधु की, सो पामर तेहि मीचु मरै। बेद-बिदित-प्रहलाद-कथा सुनि, को न भगति-पथ पाउँ धरै ॥२॥ गज उधारि हरि थप्यो विभीषन, ध्रुव अविचल कबहूँ न टरै। अंबरीष की साप-सुरति करि, अजहूँ महामुनि ग्लानि गरै ॥३॥ सो धौं कहा जु न कियो सुजोधन, अबुध आपने मान जरै। प्रभु-प्रसाद सौभाग्य विजय-जस, पांडुतनै बरिआइ बरै ॥४॥
विनय-पत्रिका २४७ जोइ जोइ कूप खनैगो पर कहँ, सो सठ फिरि तेहि कूप परै । सपनेहुँ सुख न संत-द्रोही कहँ, सुरतरु सोउ विष-फरनि फरै ॥५॥ हैं काके द्वै सीस ईस के, जो हठि जनकी सीवँ चरै । तुलसिदास रघुवीर-बाहुबल, सदा अभय, काहू न डरै ॥६॥ शब्दार्थ—सरै = पूरा पड़ सकता है, हो सकता है। मीचु = मौत। अबुध = मूर्ख। खनैगो = खोदेगा। फरनि = फलोंसे। सीव = सीमा। भावार्थ—यदि कृपालु रघुनाथजीकी कृपा रहे, तो दूसरोंके बैर करनेसे क्या बिगड़ सकता है ? यदि कोई करोड़ों उपाय करे, तब भी भक्तका बाल बाँका नहीं होता ॥१॥ जो नीच किसी साधुकी मौत देखता है, वह पामर स्वयं उस मौतसे मरता है। वेदोंमें विदित भक्त प्रह्लादकी कथा सुनकर, भक्ति-पथपर कौन नहीं पैर रखेगा ? ॥२॥ भगवान्ने गजेन्द्रका उद्धार किया, विभीषणको राजगद्दी- पर बिठाया और ध्रुवको ऐसा अविचल पद दे दिया जो कभी टल नहीं सकता। अम्बरीषके शापकी सुध करके आज भी महामुनि (दुर्वासा) ग्लानिसे गले जाते हैं ॥३॥ दुर्योधनने (पाण्डवोंके अहितके लिए) क्या-क्या नहीं किया, वह मूर्ख अपने ही घमण्डमें जलता रहा। किन्तु ईश्वरकी कृपासे सौभाग्य, विजय और यशने पाण्डवोंको ही हठपूर्वक वर लिया, अर्थात् सौभाग्य, विजय और यश पाण्डवोंको ही प्राप्त हुआ ॥४॥ जो कोई दूसरेके लिए कुआँ खोदेगा, वह शठ स्वयं घूम-फिरकर उसी कुएँमें गिरेगा। सन्त-द्रोहीको स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता। ऐसे आदमीके लिए तो जो कल्पवृक्ष है, वह भी जहरीले फल फलेगा ॥५॥ किसके दो सिर हैं जो जबर्दस्ती भगवान्के भक्तकी सीमाको लाँघेगा ? तुलसीदास तो श्री रघुवीरके बाहु-बलके भरोसे सदा निर्भय है, वह किसीसे नहीं डरता ॥६॥ विशेष १—प्रह्लाद, गजराज, ध्रुव और अम्बरीष, दुर्वासाकी कथा पीछे क्रमशः ९३, ८३, ८६ और ९८ पदोंके विशेषमें लिखी जा चुकी है। २—'पांडुतनै'—यह पाठ काशी-नागरी-प्रचारिणी सभाकी प्रतिमें है। अन्यान्य प्रतियोंमें 'पांडवने' पाठ है। गीता प्रेसकी प्रतिमें 'पांडवनै' पाठ है।