भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

विनय-पत्रिका २४५ ख—अविद्यावच्छिन्न चेतन ईश्वर है। नानान्तःकरणावच्छिन्न चेतन नानाजीव हैं। ग—समष्टि अज्ञानावच्छिन्न चेतन ईश्वर है। नाना अज्ञानांशसे सम्बन्ध- युक्त चेतन नाना मत उपाधिवाले जीव हैं। घ—समष्टि अविद्या उपाधिवाला ईश्वर है। अनेक अविद्यांश उपाधिवाला चेतन जीव है। इस अद्वैतवादमें वार्त्तिककारके मतसे जीव और ईश्वरके लक्षण ये हैं:— मूलाज्ञान-विशिष्ट चेतन ईश्वर है। तूलाज्ञान-विशिष्ट चेतन जीव है। मूलाज्ञान सामान्य अज्ञान है। यह एक है, अतः ईश्वर भी एक है। तूलाज्ञान विशेष अज्ञान है। यह नाना है, अतः जीव भी नाना हैं। यह स्मरण रहे कि केवल आभास या प्रतिबिम्ब जीव नहीं है, बल्कि उपाधि सहित चिदाभास या प्रतिबिम्ब और अधिष्ठान चेतन, दोनों मिलकर जीव हैं। जीव अल्पज्ञ, अल्पशक्तिमान् और पराधीन है। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्व- शक्तिमान और स्वतन्त्र हैं। जीवकी सात अवस्थाएँ हैं। अज्ञान, आवरण, भ्रान्ति, द्विविधज्ञान, शोक, नाश और अतितृप्तं । इस प्रकार शास्त्रोंमें जीव और ईश्वरके लक्षण पाये जाते हैं। गोस्वामीजी किस मतके अनुयायी थे, इसका विस्तृत उल्लेख अन्यत्र किया गया है। जीव और ईश्वरका विस्तृत विवरण देनेसे पाठकगण विचार कर सकेंगे कि गोस्वामी- जीके ग्रन्थोंमें किस 'वाद' का आभास पाया जाता है। इस पदमें गोस्वामीजीके सिद्धान्तकी झलक भली भाँति दिखलाई पड़ती है। यों तो विनयपत्रिकाके प्रत्येक पद अपूर्व हैं, पर यह पद हर मनुष्यके लिए कण्ठस्थ करने योग्य है। २—'छिन एक बोलि न आवई'—वियोगी हरिजीने इसका अर्थ लिखा है, 'एक क्षण भर भी तुझसे न बोलते बना।' किन्तु कबतक बोलते न बना, कुछ पता नहीं। वास्तवमें बात यह है कि नवजात शिशु माताके गर्भसे बाहर निकलने या पैदा होनेके बाद प्रसव-पीड़ासे बेहोश रहनेके कारण थोड़ी देरतक रोता भी नहीं। उसीके लिए गोस्वामीजीने लिखा है, 'छिन एक बोलि न आवई', इसका अर्थ है, एक क्षणतक बोल नहीं आता (रोता भी नहीं)। ३—'कौमार···सकै'—इसका अर्थ भी उक्त टीकाकारने किया है, 'कुमारा-