भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 248, कुल 475 में से

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पृष्ठ 248

विनय-पत्रिका २३७ अजहूँ विंचारु, विकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं । भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुर-नायकं ॥ बिनु हेतु करुनाकर, उदार, अपार-माया-तारनं। कैवल्य-पति, जगपति, रमापति, प्रानपति, गतिकारनं ॥ १० रघुपति-भगति सुलभ, सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी बिनु सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिलैं द्रवै जब सोई ॥ जब द्रवैं दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये। जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ॥ जिनके मिले दुख-सुख समान, अमानतादिक गुन भये। मद-मोह-लोभ-विषाद-क्रोध सुबोध तें सहजहिं गये ॥ ११ सेवत साधु द्वैत-भय भागै । श्री रघुवीर-चरन लौ लागै ॥ देह-जनित विकार सब त्यागै। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै ॥ अनुराग सो निज रूप जो जगतें बिलच्छन देखिये। संतोष, सम, सीतल सदा दम, देहवंत न लेखिये ॥ निरमल, निरामय, एक रस, तेहि हरष-सोक न व्यापई। त्रैलोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी भई ॥ १२ जो तेहि पंथ चलै मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई ॥ जो मारग श्रुति-साधु दिखावैं। तेहि पथ चलत सबै सुख पावैं ॥ पावै सदा सुख हरि-कृपा, संसार आसा तजि रहै। सपनेहुँ नहीं दुख द्वैत-दरसन, बात कोटिक को कहै ॥ द्विज, देव, गुरु, हरि संत बिनु संसार-पार न पाइये। यह जानि तुलसीदास त्रास हरन रमापति गाइये ॥ शब्दार्थ—विलगान्यो = अलग हुआ। जरा = बुढ़ापा। मज्जसि = स्नान कर रहा है। संसृति = संसार। हेठ = नीचे। शोनित = रक्त। पुरीष = मल, विष्ठा। कर्दमावृत = कीचसे ढँका हुआ। निकाय = समूह। सिसु = बालक। व्यतिरेक = अतिरिक्त, सिवा। रात्यो = फँस

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