भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 249

२३८ विनय-पत्रिका गया । आवर्त्त = गढ़ा, जन्म-मरणके चक्करमें घूमना । विट = मल । प्रतिहत = नष्ट । गृहपाल = कुत्ता । महाभव = महाजन्म । १ भावार्थ—हे जीव ! जबसे तू परमात्मासे अलग हुआ (अर्थात्, जबतक तू परमात्माके स्वरूपमें स्थित था, तबतक तेरा जीव नाम नहीं पड़ा था; किन्तु जब- से अविद्याके आवरण द्वारा तू भगवान्‌से पृथक् हुआ), तबसे तेरा जीव नाम पड़ गया और तभीसे तूने इस शरीरको ही अपना घर समझ लिया । तूने मायाके वश होकर अपने असली सत्-चित्-आनन्दस्वरूपको भुला दिया, और उसी भ्रमके कारण तुझे (जन्म-मरणरूप) भयंकर दुःख हुआ । जो भयंकर और असह्य दुःख तुझे भोगना पड़ा, उसमें स्वप्नमें भी सुखका लेशमात्र न रहा । तू हठपूर्वक उस मार्गसे चलता रहा, जिसमें संसारके शूल (गर्भवास) और अनेक शोक भरे पड़े हैं । रे मन्दबुद्धि ! बहुत-सी योनियोंके जन्म और बुढ़ापेकी विपत्तियाँ तुझे झेलनी पड़ीं, फिर भी तूने श्रीरामजीको न पहचाना । रे मूढ़ ! विचारकर देख, श्रीरामजीके बिना तुझे और कहीं शान्ति मिली ? २ रे जीव ! तेरा निवास आनन्दके समुद्रमें है, अर्थात् तू आनन्दस्वरूप परब्रह्मसे भिन्न नहीं है । तू बिना जाने (अज्ञानवश) क्यों प्यासा मर रहा है ? तूने मृग-तृष्णाके जल-(इन्द्रिय-विषयों) को सत्य मान लिया, और उसीमें सुख मानकर मग्न हो गया । वहीं तू डूबकर (विषयोंका ध्यान कर) नहा रहा है, और उसीको पी रहा है, जहाँ तीनों कालमें जल (सुख) नहीं अर्थात् विषयोंमें न तो कभी सुख था, न है, और न रहेगा । रे खल ! अब तू अपने सहज अनुभव-रूपको भूलकर वहीं (जहाँ त्रिकालमें जल नहीं) आ पड़ा है । अर्थात् अपने सच्चिदानन्दरूपको भूलकर अब तू अपनेको शरीररूप मान रहा है । तूने विशुद्ध, अविनाशी, षट्-विकार-(जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय, नाश) रहित परम सुखको त्याग दिया । तेरी वही दशा है जैसे कोई राजा व्यर्थ ही स्वप्नमें राज छोड़कर कारागृहमें पड़ा हो । ३ तूने अपनी कर्मरूपी डोरीको मजबूत कर ली और अपने हाथोंसे (अज्ञानसे)