विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका २३९ कसकर गाँठ लगा दी। अभागे ! इसीसे तू परतंत्र पड़ा हुआ है। उसका फल गर्भवासका दुःख है जोकि तेरे आगे है। आगे (गर्भवासमें) जो अनेक दुःखोंके समूह हैं, वे माताके पेटमें पड़े हुए प्राणीको ज्ञात हैं, (गर्भमें) सिर तो नीचे रहता है और पैर ऊपर। इस संकटकालमें कोई बात भी नहीं पूछता। रक्त, विष्ठा, मूत्र, मल, कृमि और कीचसे ढँका हुआ (गर्भमें) सोता है। उस समय तेरा शरीर तो कोमल रहता है, पर वेदना (पीड़ा) अत्यधिक सहनी पड़ती है। इससे तू सिर धुन-धुनकर रोता है। ४ जहाँ-जहाँ तू अपने कर्म-जालमें घिरा, वहाँ-तहाँ भगवान् तेरे साथ रहे। प्रभुने हर प्रकारसे तेरा पालन-पोषण किया, और उस परम कृपालुने तुझे ज्ञान भी दिया। जब परमात्माने ज्ञान और विवेक दिया, तब तुझे पिछले अनेक जन्मोंका स्मरण हुआ। फिर तो कहने लगा कि 'मैं उस ईश्वरकी शरणमें हूँ जिसकी यह त्रिगुणात्मिका माया अत्यन्त दुस्तर है। जिस (माया) ने जीव- समुदायको अपने वशमें कर रखा है, जिसने जीवोंको रसहीन (आनन्द-रहित) बना रखा है और जो दिनपर दिन अत्यन्त नयी दिखाई देती है, उस मायासे हे लक्ष्मीनारायण ! मेरी शीघ्र रक्षा कीजिये; क्योंकि आपनेही तो इस विपत्तिकालमें (गर्भमें) बुद्धि दी है।' ५ फिर तू अपने मनमें बहुत तरहकी ग्लानि मानकर कहने लगा कि अब मैं संसारमें जाकर या जन्म लेकर चक्रपाणि भगवान्का भजन करूँगा। ऐसा विचारकर ज्यों ही तूने चुप्पी साधी, त्यों ही प्रसवकालकी वायुने तुझ अपराधीको प्रेरित किया। उस परम प्रचंड वायुके प्रेरणा करनेपर तुझे अनेक तरहके कष्ट सहन करने पड़े। फिर क्या था, तेरा वह ज्ञान, ध्यान, वैराग्य और अनुभव (सब जन्मकालकी) यातनाकी आगमें जल-भुन गया, अर्थात् असह्य कष्टमें तू सब भूल गया। (जन्म होनेपर) अत्यन्त कष्टके कारण व्याकुल होने, तथा थोड़ा बल रहनेके कारण एक क्षणतक बोल नहीं आया। उस समयके तेरे तीव्र कष्टको किसीने न जाना, उलटा सब लोग हर्षित होकर गाने लगे।