भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 253, कुल 475 में से

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पृष्ठ 253

२४२ विनय-पत्रिका उत्पन्न होनेवाले सब विकारोंको छोड़ दे, तब जाकर अपने स्वरूपमें प्रेम होता है। जिसे अपने स्वरूपमें अनुराग है, वह संसारमें विलक्षण दिखाई देता है। उसे सदा सन्तोष, समता और शान्ति रहती है तथा उसके मन एवं इन्द्रियोंका निग्रह स्वाभाविक ही हो जाता है। फिर तो वह देहधारी समझा ही नहीं जाता; वह विशुद्ध, नीरोग, आधि-व्याधि-रहित, एकरस हो जाता है; उसे हर्ष और शोक नहीं व्यापता। जिसकी सदैव ऐसी दशा हो गयी, वह तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है। १२ जो मनुष्य इस मार्गपर मन लगाकर चलता है, उसकी सहायता प्रभुजी क्यों न करेंगे? जिस मार्गको वेदों और संतोंने दिखाया है, उस मार्गपर चलने- से सब लोग सुख पाते हैं। वे ईश्वरकी कृपासे नित्यानन्द प्राप्त करते हैं, और सांसारिक भावनाओंको छोड़ देते हैं। (मूल बात यह है कि) उसे स्वप्नमें भी द्वैतके दुःखका दर्शन नहीं होता, करोड़ों बातें कौन कहे। ब्राह्मण, देवता, गुरु, हरि और संतोंके बिना संसार-सागरको पार करना असम्भव है। यही समझकर तुलसीदास भव-भयहारी लक्ष्मीनारायण भगवान्‌के गुण गाता है। विशेष १—'जिय'—जीव और ईश्वर क्या हैं, इस विषयमें अद्वैतवादमें कई मत हैं। उनमें प्रत्येकके मतकी परिभाषा नीचे लिखी जाती है। इससे पाठक- गण समझ सकेंगे कि अद्वैतके ही अन्तर्गत भिन्न-भिन्न आचार्योंके विचारमें कितना सूक्ष्म अन्तर है। अवच्छेदवाद—जब शुद्ध चेतन ब्रह्मके साथ मायाका विशेषण लगता है, तो वह ईश्वर कहलाता है, और जब उसके साथ अविद्याका विशेषण लगता है, तो वह जीव कहलाता है। किन्तु अवच्छेदवादके दूसरे मतके अनुसार, जब चेतनका विशेषण अन्तःकरण होता है, तो वह जीव है, और जब अन्तःकरण उसका विशेषण नहीं है, तो वह ईश्वर है। अवच्छेदका अर्थ है, पृथक् करना, सीमा बाँधना। आभासवाद—इस सिद्धान्तमें शुद्ध चेतनाका जो आभास माया, अविद्या,

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