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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 252, कुल 475 में से

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पृष्ठ 252

विनय-पत्रिका २४१ कुत्तेसे भी बढ़कर तेरा निरादर होने लगा, अन्न-जल भी (समयसे) नहीं मिलता। ऐसी दशामें भी तुझे उससे विराग नहीं हो रहा है और तू तृष्णाकी तरंगोंको बढ़ाता जा रहा है। ९ तेरे महान् संसार, अथवा अनेक जन्मों और अनेक योनियोंकी बातें कौन कह सकता है ? यह तो एक जन्मकी कुछ बातें गिनायी गयी हैं। सदैव चार खानों-(अंडज, जैसे पक्षी आदि; पिंडज, जो गर्भसे उत्पन्न होते हैं जैसे मनुष्य, पशु आदि; स्वेदज, जैसे खटमल जुएँ आदि; उद्भिज्ज, जैसे वृक्ष आदि) में जन्म ग्रहण करना या घूमना पड़ता है। अब भी तू मनमें विचार नहीं कर रहा है। अब भी तू विचार कर और विकारोंको छोड़कर भक्तोंको आनन्द देनेवाले श्रीरामजीको भज। दुस्तर संसार-सागरके लिए जलयान (नाव) रूपी चक्र सुदर्शनधारी देवाधिदेव भगवान् रामचन्द्रजीका भजन कर। वह अकारण ही करुणा करनेवाले, उदार और अपार मायासे उद्धार करनेवाले हैं। वह कैवल्यके स्वामी अर्थात् मोक्ष-दाता, जगत्के स्वामी, लक्ष्मीजीके पति, प्राणनाथ और सुगतिके कारण हैं। १० श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुलभ और सुखदायिनी है। वह तीनों तापों, शोक और भयको हरनेवाली है। किन्तु वह भक्ति बिना सत्संगके पैदा नहीं होती, और संतजन तब मिलते हैं जब वह (श्रीरामजी) द्रवित होते हैं। जब दीनदयालु राघव कृपा करते हैं, तब ऐसे साधु-महात्माओंकी संगति प्राप्त होती है, जिनके दर्शनसे, स्पर्शसे और समागम आदिसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं, जिनके मिलनेसे सुख और दुःख समान प्रतीत होने लगते हैं तथा अमानता आदि सद्गुण पैदा हो जाते हैं। फिर तो सुबोध अर्थात् आत्मज्ञान हो जाता है और उसके प्रभावसे मद, मोह, लोभ, शोक, क्रोध आदि सहजहीमें दूर हो जाते हैं। सारांश, सत्संगके प्रभावसे जीवन ही धन्य हो जाता है। ११ साधु-सेवा करते ही द्वैतका भय भाग जाता है ('सर्वं खल्विदं ब्रह्म' भान हो जाता है), और श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें ध्यान लग जाता है। जब शरीरसे १६

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