भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 258

विनय-पत्रिका २४७ जोइ जोइ कूप खनैगो पर कहँ, सो सठ फिरि तेहि कूप परै । सपनेहुँ सुख न संत-द्रोही कहँ, सुरतरु सोउ विष-फरनि फरै ॥५॥ हैं काके द्वै सीस ईस के, जो हठि जनकी सीवँ चरै । तुलसिदास रघुवीर-बाहुबल, सदा अभय, काहू न डरै ॥६॥ शब्दार्थ—सरै = पूरा पड़ सकता है, हो सकता है। मीचु = मौत। अबुध = मूर्ख। खनैगो = खोदेगा। फरनि = फलोंसे। सीव = सीमा। भावार्थ—यदि कृपालु रघुनाथजीकी कृपा रहे, तो दूसरोंके बैर करनेसे क्या बिगड़ सकता है ? यदि कोई करोड़ों उपाय करे, तब भी भक्तका बाल बाँका नहीं होता ॥१॥ जो नीच किसी साधुकी मौत देखता है, वह पामर स्वयं उस मौतसे मरता है। वेदोंमें विदित भक्त प्रह्लादकी कथा सुनकर, भक्ति-पथपर कौन नहीं पैर रखेगा ? ॥२॥ भगवान्ने गजेन्द्रका उद्धार किया, विभीषणको राजगद्दी- पर बिठाया और ध्रुवको ऐसा अविचल पद दे दिया जो कभी टल नहीं सकता। अम्बरीषके शापकी सुध करके आज भी महामुनि (दुर्वासा) ग्लानिसे गले जाते हैं ॥३॥ दुर्योधनने (पाण्डवोंके अहितके लिए) क्या-क्या नहीं किया, वह मूर्ख अपने ही घमण्डमें जलता रहा। किन्तु ईश्वरकी कृपासे सौभाग्य, विजय और यशने पाण्डवोंको ही हठपूर्वक वर लिया, अर्थात् सौभाग्य, विजय और यश पाण्डवोंको ही प्राप्त हुआ ॥४॥ जो कोई दूसरेके लिए कुआँ खोदेगा, वह शठ स्वयं घूम-फिरकर उसी कुएँमें गिरेगा। सन्त-द्रोहीको स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता। ऐसे आदमीके लिए तो जो कल्पवृक्ष है, वह भी जहरीले फल फलेगा ॥५॥ किसके दो सिर हैं जो जबर्दस्ती भगवान्‌के भक्तकी सीमाको लाँघेगा ? तुलसीदास तो श्री रघुवीरके बाहु-बलके भरोसे सदा निर्भय है, वह किसीसे नहीं डरता ॥६॥ विशेष १—प्रह्लाद, गजराज, ध्रुव और अम्बरीष, दुर्वासाकी कथा पीछे क्रमशः ९३, ८३, ८६ और ९८ पदोंके विशेषमें लिखी जा चुकी है। २—'पांडुतनै'—यह पाठ काशी-नागरी-प्रचारिणी सभाकी प्रतिमें है। अन्यान्य प्रतियोंमें 'पांडवने' पाठ है। गीता प्रेसकी प्रतिमें 'पांडवनै' पाठ है।