भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 259

२४८ विनय-पत्रिका इसपर उक्त प्रतिके टीकाकारने टिप्पणी लिखी है—'पांडवनै' पाठ ही शुद्ध है। पांडुतनै पाठ कर देनेवालोंने भूल की है। अवधीमें पांडवका बहुवचन कर्म- कारकका शुद्ध रूप है 'पांडवनहिं' या 'पांडवनै' । 'पांडवन्हि' भी लाघवसे बनता है, परन्तु यहाँ एक मात्रा उससे अधिक होनी चाहिये थी।' [१३८] कबहुँ सो कर-सरोज रघुनायक ! धरिहौ नाथ सीस मेरे। जेहि कर अभय किये जन आरत, बारक बिवस नाम टेरे ॥१॥ जेहि कर-कमल कठोर संभुधनु भंजि जनक-संसय मेट्यो। जेहि कर-कमल उठाइ बंधु ज्यों, परम प्रीति केवट भेंट्यो ॥२॥ जेहि कर-कमल कृपालु गीध कहँ, पिंड देइ निज धाम दियो। जेहि कर वालि बिदारि दास-हित, कपि कुल-पति सुग्रीव कियो ॥३॥ आयो सरन सभीत विभीषन, जेहि कर-कमल तिलक कीन्हों। जेहि कर गहि सर चाप असुर हति, अभय दान देवन्ह दीन्हों ॥४॥ सीतल सुखद छाँह जेहि करकी, मेटति पाप, ताप, माया। निसि-बासर तेहि कर-सरोज की, चाहत तुलसिदास छाया ॥५॥ शब्दार्थ—बारक = एक बार । हति = मारकर । भावार्थ—हे रघुकुल-नायक ! हे नाथ ! क्या आप कभी अपने उस कर- कमलको मेरे मस्तकपर रखेंगे, जिस हाथसे, विवश होकर एक बार पुकारते ही आपने आर्त्त जनोंको अभय कर दिया था ? ॥१॥ आपने जिस हस्त-कमलसे शिवजीके कठोर धनुषको तोड़कर महाराज जनकका संशय दूर किया था, और जिस कर-कमलसे केवट निषादको भाईकी तरह उठाकर बड़े प्रेमसे सीनेसे लगाया था ॥२॥ हे कृपालु ! आपने जिस कर-कमलसे जटायु गीधको पिण्डदान देकर उसे अपने साकेत धाममें भेज दिया था, और जिस हाथसे अपने सेवककी भलाईके लिए बालिको मारकर, सुग्रीवको वानर-वंशका राजा बनाया था ॥३॥ आपने जिस कर-कमलसे भयभीत होकर शरणमें आये हुए विभीषणका राज्या- भिषेक किया था, तथा जिस हाथसे 'धनुष-बाण लेकर, असुरोंको मारकर देवताओंको अभय दान दिया था ॥४॥ जिस हाथकी शीतल और सुखद छाया