विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाप, ताप, और मायाका नाश कर देती है, तुलसीदास रातदिन आपके उसी कर-कमलकी छाया चाहता है ॥५॥ [ १३९ ] दीन दयालु, दुरित-दारिद-दुख दुनी दुसह तिहुँ ताप तई है। देव दुवार पुकारत आरत, सबकी सब सुख हानि भई है ॥१॥ प्रभु के बचन, वेद-बुध-सम्मत, मम मूरति महिदेव मई है। तिनकी मति रिस-राग-मोह-मद, लोभ लालची लीलि लई है ॥२॥ राज-समाज कुसाज कोटि कछु कलपित कलुष कुचाल नई है। नीति, प्रतीति, प्रीति परमिति पति हेतुवाद हठि हेर हई है ॥३॥ आश्रम-बरन-धरम-विरहित जग, लोक-वेद-मरजाद गई है। प्रजा पतित, पाखंड-पापरत, अपने अपने रंग रई है ॥४॥ सांति, सत्य, सुभरीति गई घटि, बढ़ी कुरीति, कपट-कलई है। सीदत साधु, साधुता सोचति, खल विलसत, हुलसति खलई है ॥५॥ परमारथ स्वारथ, साधन भये अफल, सकल नहिं सिद्धि सई है। कामधेनु-धरनी कलि-गोमर विवस विकल जामति न बई है ॥६॥ कलि-करनी वरनिये कहाँ लौं, करत फिरत बिनु टहल टई है। तापर दाँत पीसि कर मींजत, को जानै चित कहा ठई है ॥७॥ त्यों त्यों नीच चढ़त सिर ऊपर, ज्यों ज्यों सील वस ढील दई है। सरुष बरजि तरजिये तरजनी, कुम्हिलैहैं कुम्हड़े की जई है ॥८॥ दीजै दादि देखि ना तौ बलि, मही मोद-मंगल रितई है। भरे भाग अनुराग लोग कहैं, राम कृपा-चितवनि चितई है ॥९॥ विनती सुनि सानंद हेरि हँसि, करुना-वारि भूमि भिजई है। राम-राज भयो काज, सगुन सुभ, राजा राम जगत बिजई है ॥१०॥ समरथ बड़ो, सुजान सुसाहब, सुकृत-सैन हारत जितई है। सुजन सुभाव सराहत सादर, अनायास साँसति बितई है ॥११॥ उथपे थपन, उजारि बसावन, गई बहोरि विरद सदई है। तुलसी प्रभु आरत-आरतिहर, अभय बाँह केहि केहि न दई है ॥१२॥