विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० विनय-पत्रिका शब्दार्थ - दुरित = पाप । दुनी = संसार । तई = तप्त । महिदेव = पृथिवीके देवता, ब्राह्मण । रिस = क्रोध । प्रतीति = वेद-शास्त्रके वचन । परमिति = परम्पराकी रीति । पति = प्रतिष्ठा । हेतुवाद = नास्तिकवाद । हई = नाश, हानि । सीदत = कष्ट पाते हैं । सुई = सच्ची । गोमर = गाय मारनेवाला, कसाई । बई = बोया जाता है। टहल = सेवा । टई = काम । ठई = ठहरी है। त्रई = जन्मी, बतिया । दादि = इन्साफ । रितई = खाली । हेरि = देखकर । भिजई = भिगो दिया । भावार्थ - हे दीनदयालु ! पाप, दरिद्रताके दुःख और तीनों दुःसह तापोंसे संसार तप्त है। हे देवाधिदेव ! यह आर्त्त आपके द्वारपर पुकार रहा है, क्योंकि सबलोगोंके सब सुखोंकी हानि हो गयी है, अर्थात् सबलोग दुःखी हैं ॥१॥ हे प्रभो ! वेदों और पंडितोंकी राय है, तथा आपका भी यह वचन है कि मेरी मूर्त्ति ब्राह्मणमयी है, अर्थात् ब्राह्मण मेरी ही प्रतिमूर्त्ति हैं। किन्तु उनकी (ब्राह्मणों की) लालची बुद्धिको क्रोध, राग, मोह, मद और लोभने निगल लिया है ॥२॥ राज-समाज (क्षत्रिय-वंश) कटु फल देनेवाली करोड़ों बुरी बातों (लूटना, पीटना, सताना आदि) से भरा है। वह नित्य-प्रति पापपूर्ण नयी-नयी कुचालें चल रहा है। नास्तिकवादने हठपूर्वक राजनीति, वेद-शास्त्र, श्रद्धा, परम्परा- की रीति (वर्णाश्रमकी मर्यादा) की प्रतिष्ठाको ढूँढ़-ढूँढ़कर नाश कर डाला है ॥३॥ आश्रम-धर्म और वर्ण-धर्मसे यह संसार रहित हो गया है और लोक तथा वेदकी मर्यादा नष्ट हो गयी है। प्रजा पतित होकर पाखंड और पापमें रत है। सबलोग अपने-अपने रंगमें रँगे हैं ॥४॥ शान्ति, सत्य और कल्याणका ह्रास हो गया और कुरीतियाँ बढ़ गयी हैं जिनपर कि छल या कपटकी कलई की हुई है। साधु कष्ट पाते हैं और साधुता सोचमें पड़ी है। दुष्ट विलास कर रहे हैं और दुष्टता आनन्दमें है ॥५॥ परमार्थके स्वार्थमें परिणत हो जानेके कारण उसकी साधना निष्फल होने लगी है और सब सिद्धियाँ भी अब सही नहीं उतरतीं । कामधेनुरूपी पृथिवी कलिरूपी कसाईके हाथमें विवश पड़ी है। वह इस प्रकार व्याकुल है कि जो कुछ भी बोया जाता है, वह जमता (उगता) ही नहीं ॥६॥ कलियुगकी करनीका वर्णन कहाँतक किया जाय, यह बिना कामका सब काम करता फिरता है। इतनेपर भी दाँत पीस पीसकर हाथ मल रहा है (सोच रहा है कि अभी तो मैंने कुछ किया ही नहीं) । कौन जानता है कि इसने अपने दिलमें क्या ठान रखी है, अर्थात् इसने क्या करना स्थिर किया है ॥७॥